राव तुलाराम 1857 की क्रांति के समय अहीरवाल क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के प्रमुख नेतृत्वकर्ता बनकर उभरे।
अहीरवाल की धरती वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की गौरवशाली परंपरा की साक्षी रही है। इसी वीरभूमि ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे महान योद्धा को जन्म दिया, जिसने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। वह वीर थे रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम। 1857 का संग्राम भारतीय इतिहास की उन अहम घटनाओं में से है, जिसने अंग्रेजी शासन की नींव को गहरी चुनौती दी। तत्कालीन संघर्ष अपने अंतिम उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसने भारतीय समाज में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना मजबूत की।
राजा राव तुलाराम का जन्म 9 दिसंबर, 1825 को रेवाड़ी के राजपरिवार में हुआ था। उनके पिता राव राजा पूर्ण सिंह और माता ज्ञान कुंवर थीं। पिता के निधन के बाद मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्हें रेवाड़ी की राजगद्दी संभालनी पड़ी। समय के साथ उन्होंने अपनी राजनीतिक समझ, संगठन क्षमता और सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया। 1857 की क्रांति के समय वे अहीरवाल क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के प्रमुख नेतृत्वकर्ता बनकर उभरे। जब मेरठ से उठी क्रांति की लपटें दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचीं, तो उसका प्रभाव अहीरवाल पर भी पड़ा। दिल्ली में बहादुरशाह जफर को क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान का बादशाह घोषित किया। अंग्रेजों को गुड़गांव और आसपास के क्षेत्रों से पीछे हटना पड़ा। राव तुलाराम ने इस अवसर को अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध में बदल दिया। रेवाड़ी तथा आसपास के क्षेत्रों में उनका प्रभाव स्थापित हुआ और अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।
अंग्रेजों ने राव तुलाराम की शक्ति को समाप्त करने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया। इसी संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बना नसीबपुर का युद्ध। 16 नवंबर 1857 को नसीबपुर, नारनौल के मैदान में राव तुलाराम की सेना और अंग्रेजी सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। ब्रिटिश सेना के कमांडर कर्नल जॉन ग्रांट गेरार्ड और कैप्टन वालेस मारे गए, जबकि कई ब्रिटिश अधिकारी घायल हुए। राव तुलाराम की सेना ने अंग्रेजी सेना को कड़ी चुनौती दी।
इस संघर्ष में राव तुलाराम के अनेक वीर सेनानायक और सैनिक शहीद हुए। राव किशन सिंह, राव रामलाल और शहजादा मोहम्मद आजम सहित अनेक योद्धाओं ने मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
नसीबपुर का यह युद्ध अहीरवाल के इतिहास में आज भी वीरता और बलिदान के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है।
लेखिका हरियाणा सरकार में मंत्री हैं।

