गत 90 वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने, संसदीय व निर्वाचन गतिविधियों, विकास योजनाओं और सरकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाने में रेडियो ने सेतु की भूमिका निभाई।
‘दिस इज ऑल इंडिया रेडियो...’ यह वाक्य केवल एक उद्घोषणा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों, संवेदनाओं और राष्ट्रीय चेतना का अभिन्न हिस्सा है। रेडियो ने भारत को केवल समाचार नहीं दिए, बल्कि उसे एक सूत्र में पिरोने, संस्कृति को संरक्षित करने, लोकतंत्र को मजबूत बनाने और संकट के समय जनविश्वास कायम रखने का कार्य किया। 8 जून 1936 को इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया था। इस संस्था ने अपनी गौरवशाली 90 वर्ष की यात्रा पूरी कर ली है।
भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत 1921 से 1924 के मध्य रेडियो क्लबों के माध्यम से शुरू हुई। 23 जुलाई, 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने बंबई और कलकत्ता से नियमित प्रसारण प्रारंभ किया। आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चल सकी।
वर्ष 1932 में भारत की अंग्रेज सरकार ने इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस नाम से प्रसारण व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। सितंबर, 1935 में एक अंग्रेज ब्रॉडकास्टर लियोनेल फ़ील्डन को लंदन से भारत बुलाकर प्रसारण नियंत्रक बनाया गया। उन्होंने 1 जनवरी, 1936 को दिल्ली के 18, अलीपुर रोड स्थित एक छोटे से भवन से इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का संचालन शुरू किया। फ़ील्डन को यह नाम आकर्षक नहीं लगता था। एक अवसर पर उन्होंने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो से अपनी समस्या साझा की। लिनलिथगो ने नया नाम सुझाया—‘ऑल इंडिया रेडियो’। 8 जून, 1936 को पहली बार यह उद्घोषणा प्रसारित हुई और भारतीय प्रसारण इतिहास का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। 90 वर्षों में आकाशवाणी भारत की संस्कृति, सभ्यता और देश की पहचान बनी, जिस पर प्रत्येक भारतीय गर्व करता है।
ऑल इंडिया रेडियो ने भारत की संगीत और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में अमूल्य योगदान दिया। रेडियो नाटक जैसी नई विधा का विकास भी इसी माध्यम से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में, विशेषकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय, भूमिगत रेडियो प्रसारणों ने जनचेतना को बल दिया।
3 जून, 1947 को भारत विभाजन की घोषणा प्रसारण भवन, दिल्ली से हुई। 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा से पंडित जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक ‘नियति से मिलन’ भाषण ऑल इंडिया रेडियो ने देश-दुनिया तक पहुंचाया। भारत विभाजन की त्रासदी के समय विस्थापित लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने और प्रशासनिक सूचनाएं और निर्देश देने में रेडियो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 12 नवंबर, 1947 को महात्मा गांधी ने प्रसारण भवन, दिल्ली आकर कुरुक्षेत्र में बसे शरणार्थियों को संबोधित किया था। 12 नवंबर को लोकसेवा प्रसारण दिवस मनाने की घोषणा तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने की थी।
स्वतंत्रता के बाद विविधताओं से भरे भारत को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य रेडियो ने किया। कृषि कार्यक्रमों ने किसानों तक वैज्ञानिक खेती की जानकारी पहुंचायी। स्वास्थ्य, टीकाकरण, बाल कल्याण, पोलियो उन्मूलन और सामाजिक जागरूकता अभियानों में भी रेडियो प्रभावी माध्यम बना। 1952 से 1962 तक सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे बी.वी. केसकर के समय में शास्त्रीय और लोकसंगीत को विशेष महत्व मिला। फिल्मी गीतों की सीमित उपस्थिति के कारण श्रोताओं का रुझान रेडियो सीलोन की ओर बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप 1957 में विविध भारती प्रसारण सेवा शुरू की गई। पंडित नरेंद्र शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका से प्रारंभ हुई इस सेवा ने ‘हवा महल’, ‘जयमाला’, ‘छायागीत’ और ‘भूले-बिसरे गीत’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम दिए। सैनिकों के लिए प्रसारित ‘जयमाला’ आज भी भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
3 अक्तूबर, 1957 को ऑल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम ‘आकाशवाणी’ रखा गया। वर्ष 1962 के चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, कारगिल संघर्ष तथा अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों का सबसे भरोसेमंद माध्यम आकाशवाणी ही रही।
आकाशवाणी को समृद्ध बनाने में लियोनेल फ़ील्डन, बुखारी बंधु, जगदीश चंद्र माथुर, पंडित नरेंद्र शर्मा, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, उपेंद्र अश्क, पंडित रवि शंकर, अनिल विश्वास, मेलविल डी मेलो, गिरिजा कुमार माथुर, दुष्यंत कुमार, जसदेव सिंह, देवकीनंदन पाण्डेय, विनोद कश्यप, सुरजीत सेन, बोरुन हलदार और अनेक प्रतिभाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
गत 90 वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने, संसदीय गतिविधियों, निर्वाचन गतिविधियों, विकास योजनाओं और सरकारी नीतियां जनता तक पहुंचाने में रेडियो ने सेतु की भूमिका निभाई। विद्यालयी शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, विज्ञान प्रसार और स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। भूकंप, बाढ़, चक्रवात और महामारी जैसी परिस्थितियों में, जब अन्य संचार माध्यम बाधित हो जाते हैं, तब भी रेडियो प्रभावी ढंग से कार्य करता है। आकाशवाणी ने एफएम गोल्ड, एफएम रेनबो जैसी सेवाओं के माध्यम से नए श्रोताओं तक पहुंच बनाई। आज प्रसारण मोबाइल ऐप, वेब स्ट्रीमिंग, डिजिटल आर्काइव और ओटीटी प्लेटफॉर्म वेव्स पर उपलब्ध हैं। जनता का विश्वस आकाशवाणी की सबसे बड़ी पूंजी है।
