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संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हनन के प्रश्न

हर नागरिक का अधिकार है कि वह उचित मर्यादाओं का पालन करते हुए अपनी बात कह सकता है। संसद में, और विधानसभाओं में तो सदस्यों को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि सदन में उनकी कही बात को किसी भी तरह...

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हर नागरिक का अधिकार है कि वह उचित मर्यादाओं का पालन करते हुए अपनी बात कह सकता है। संसद में, और विधानसभाओं में तो सदस्यों को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि सदन में उनकी कही बात को किसी भी तरह से अपराध नहीं माना जायेगा।

संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान हंगामा तो पहले भी होता रहा है, पर इस बार जो कुछ हुआ, वह अभूतपूर्व ही था। पहली बात तो यह हुई कि सत्ता पक्ष ने नेता विपक्ष को उनकी बात नहीं कहने दी और दूसरी यह कि किसी ‘अनहोनी’ की आशंका से लोकसभा के अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को यह आग्रह किया कि वह कार्यक्रम के अनुसार सदन में बहस का उत्तर देने न आयें। यह दोनों ही बातें हैरान करने वाली हैं, पर यह भी अपने आप में कम हैरानी की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा अध्यक्ष की सलाह मानते हुए सदन में न आने का निर्णय कर लिया। यह घटना जहां एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के हनन के रूप में याद रखी जायेगी, वहीं इस बात पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है कि हमारी संसद में देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में क्यों और कैसे पड़ गयी।

प्रधानमंत्री को सदन में न आने देने की सलाह के बारे में बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने जो कहा, वह निश्चित रूप से चिंता की बात है। उन्होंने ‘पुख्ता जानकारी’ का हवाला देते हुए कहा था कि उस दिन सदन में प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी हो सकता था। इस ‘कुछ भी’ का ब्योरा उन्होंने यह शब्द लिखे जाने तक नहीं दिया है, पर यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री की सुरक्षा की ओर था। यदि ऐसा कुछ है तो देश को यह जानने का अधिकार है कि हमारे प्रधानमंत्री को किससे और कैसा खतरा था। यही नहीं, यह बताना भी अध्यक्ष का कर्तव्य है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरा बनने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा रही है। यह सब यदि देश को नहीं बताया जा रहा है तो तरह-तरह की अफवाहें फैल सकती हैं, जो किसी भी दृष्टि से देश के हित में नहीं होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही देश की जनता को इस बारे में विश्वास में लिया जायेगा।

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संसद के भीतर प्रधानमंत्री पर इस तरह खतरे का होना जहां हमारी समूची सुरक्षा व्यवस्था को अंगूठा दिखा रहा है, वहीं सवाल संसद की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने वालों के मंतव्य पर भी उठता है। सवाल जनतांत्रिक मूल्यों में हमारी आस्था और विश्वास का है। अक्सर इस तरह की स्थिति विपक्ष के विरोध से उत्पन्न होती है, पर सदस्यों के अभिव्यक्ति के अधिकार को चुनौती इस बार सत्तारूढ़ पक्ष ने भी दी है। जिस तरह नेता विपक्ष को सदन में अपनी बात रखने से रोकने की कोशिश हुई, उन्हें एक पुस्तक का उद्धरण देने से रोका गया, वह नियमों को आधार बनाकर एक सच्चाई को उजागर होने से रोकने की कोशिश ही कही जायेगी। देश के पूर्व सेनाध्यक्ष की जिस कथित रूप से अप्रकाशित पुस्तक को लेकर सारा विवाद हुआ, वह एक उपहास बनकर रह गया है। पहले भी उस पुस्तक के कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और अब तो वह सब कुछ सोशल मीडिया के माध्यम से देश के सामने आ गया है, जिसे सत्तारूढ़ पक्ष उजागर नहीं करना चाहता था!

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अब सारी दुनिया जान गयी है कि भारत सरकार ने जनरल नरवणे की जिस पुस्तक के अंश को छपने देने की अनुमति अब तक नहीं दी है उसका रिश्ता उस एक घटना से है जिसमें जनरल ने यह लिखा था कि शत्रु देश चीन के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए उन्हें सर्वोच्च अधिकारी से आवश्यक अनुमति बार-बार प्रयास करने के बाद भी नहीं मिल पायी थी। सवाल इस घटना की सच्चाई या झूठ का नहीं है, सवाल यह है कि यदि उस दिन लोकसभा में नेता विपक्ष को इस घटना का हवाला देने दिया जाता तो क्या बिगड़ जाता? सारी जानकारी एक खुला रहस्य था, यह बात सदन में दोनों पक्षों को पता थी।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा वाली बात अपनी जगह है। उसकी तो जांच होनी ही चाहिए और जो भी दोषी है उसे उचित सज़ा भी मिलनी चाहिए। इस संदर्भ में किसी को भी किसी तरह की छूट दिया जाना प्रधानमंत्री की ही नहीं, देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करना होगा।

इस समूचे प्रकरण का एक हिस्सा जनतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों का है। जो शासन-व्यवस्था हमने अपने लिए चुनी है, उसमें संवाद का सर्वाधिक महत्व है। हमारा संविधान हर नागरिक के अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा करता है। हर नागरिक का अधिकार है कि वह उचित मर्यादाओं का पालन करते हुए अपनी बात कह सकता है। संसद में, और विधानसभाओं में तो सदस्यों को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि सदन में उनकी कही बात को किसी भी तरह से अपराध नहीं माना जायेगा। यह व्यवस्था इसलिए भी ज़रूरी थी कि निर्वाचित सदस्य अपनी बात निर्भयतापूर्वक कह सकें। ऐसे में यदि नेता विपक्ष को कोई बात कहने से रोका जाता है तो इसे जनतांत्रिक मूल्यों-परंपराओं का नकार ही कहा जायेगा। निर्वाचित सदस्यों से यह अपेक्षा अवश्य की जाती है कि वे अपनी मर्यादाओं का पालन करेंगे, पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को अपनी बात सदन में कहने का अवसर और अधिकार मिलना ही चाहिए।

वहीं, एक बात यह भी समझने की है कि मतदाता सिर्फ सरकार ही नहीं चुनता, विपक्ष का भी चुनाव करता है। यदि वह एक पक्ष को सरकार चलाने का काम सौंपता है तो दूसरे पक्ष से वह यह अपेक्षा करता है कि वह सत्तारूढ़ पक्ष के काम-काज पर समुचित निगाह रखेगा। सदस्यों को सदन में अपनी बात कहने का अवसर देने का मतलब यही है कि हर सदस्य को अपना दायित्व निभाने का अवसर मिले। महज इसलिए कि किसी की बात से हम असहमत हैं, उसे बात कहने का मौका नहीं देंगे, या उसके बोलने में रुकावट डालेंगे, यह हर दृष्टि से अनुचित और अजनतांत्रिक है।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक वाल्तेयर ने इस संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी। उनका कहना था, ‘मैं आपके विचार से असहमत हो सकता हूं, पर अपनी बात कहने के आपके अधिकार की रक्षा मैं अपने प्राण देकर भी करूंगा’। वाल्तेयर की यह सोच जनतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करने वाले हर व्यक्ति के लिए एक चुनौती है। हमें इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा। यदि हम ऐसा नहीं करते तो इसका अर्थ है हम उस व्यवस्था के मूल्यों में विश्वास नहीं करते जो हमने अपने लिए चुनी है।

उस दिन सदन में नेता प्रतिपक्ष को वह सब कहने दिया जाना चाहिए था जो वे जनरल नरवणे को उद्धृत करके कहना चाहते थे। यह उनका अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी था। उसी तरह सदन के नेता प्रधानमंत्री का भी अधिकार और कर्तव्य है कि वह प्रतिपक्ष द्वारा उठाये गये सवालों का जवाब देते। लोकसभा में ऐसा नहीं हुआ। होना चाहिए था। राज्यसभा में प्रधानमंत्री अपनी बात कह सकते थे। पर पता नहीं क्यों उन्होंने उन सवालों का जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा, जो इस समूचे संदर्भ में उठ रहे हैं। यह सब मतदाता को हल्के में लेने का ही उदाहरण है। निर्वाचित प्रतिनिधियों का दायित्व बनता है कि वह मतदाता के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारी राजनीति से ईमानदारी कहीं गायब होती जा रही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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