Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

पंजाब में नशे के खिलाफ मिशन अधूरा रहा

2017 में STF का गठन कर कार्रवाई शुरू की, 62 हजार से अधिक आरोपी गिरफ्तार हुए; नशे के खिलाफ लड़ाई को संस्थागत निरंतरता और युवाओं के लिए बेहतर अवसर जरूरी

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

पंजाब की नशे की समस्या इतनी गंभीर है कि इसे राजनीतिक नारों या अलग-अलग सरकारों के परस्पर दावों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसने परिवारों को तबाह किया है, युवाओं का भविष्य प्रभावित किया है और राज्य की क्षमता व विश्वसनीयता की परीक्षा ली है। इसलिए सरकारों का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने क्या वादे किए, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उन्होंने वास्तव में क्या किया, क्या काम किया और उतना ही महत्वपूर्ण यह भी कि वे कहां पीछे रह गईं।

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले मैंने सार्वजनिक रूप से एक असाधारण रूप से मजबूत संकल्प लिया था—पंजाब में नशे के कारोबार की रीढ़ तोड़ने का। मैं जानता था कि पंजाब की जनता के लिए इस वादे का क्या महत्व है और मैंने इसे अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी माना।

Advertisement

हमने तुरंत कार्रवाई की। मार्च 2017 में सत्ता संभालने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में ही मेरी सरकार ने नशे के कारोबार के खिलाफ बड़े अभियान की शुरुआत की। इसके तुरंत बाद हमने विशेष कार्य बल (एसटीएफ) का गठन किया। उस समय केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात और छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों का अनुभव रखने वाले अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हरप्रीत सिंह सिद्धू पंजाब लौटे और एसटीएफ का नेतृत्व संभाला।

Advertisement

शुरुआत में एसटीएफ को सीधे मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह बनाया गया। उद्देश्य स्पष्ट था—एक ऐसी विशेषज्ञ टीम तैयार करना, जिसके पास नशे के नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार और स्वतंत्रता हो तथा जो सबूत जहां ले जाएं, वहां तक पहुंच सके। मेरा निर्देश भी स्पष्ट था—न तो किसी को निशाना बनाने के लिए अभियान चलाया जाए और न ही किसी को संरक्षण दिया जाए। सबूतों के आधार पर कार्रवाई हो।

यह सिद्धांत महत्वपूर्ण था। नशे के खिलाफ अभियान राजनीतिक हिसाब चुकता करने का माध्यम नहीं बन सकता था। इसी तरह राजनीतिक प्रभाव, सरकारी पद, पुलिस की वर्दी या व्यक्तिगत संबंध किसी को भी कानून से सुरक्षा नहीं दे सकते थे।

शुरुआती जांच ने इस संकल्प की परीक्षा ली। जून 2017 में एसटीएफ ने नशे की तस्करी के एक मामले में पंजाब पुलिस के इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह को गिरफ्तार किया। जुलाई 2019 के अंत तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2017 से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ नशे से जुड़े 66 मामले दर्ज किए गए थे और 88 पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया था। तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने सार्वजनिक रूप से इस नीति को शून्य सहनशीलता की नीति बताया था, साथ ही पर्याप्त सबूत की आवश्यकता और किसी को गलत तरीके से निशाना बनाए जाने से बचने पर भी जोर दिया था। लेकिन कार्रवाई नशे की समस्या का केवल एक हिस्सा थी। पंजाब को कई वर्षों में विकसित हुए नशे के एक पूरे अर्थतंत्र की विरासत मिली थी। इसमें संगठित तस्करी, सीमा पार से नशे की आवाजाही, स्थानीय वितरण नेटवर्क, दवाओं का दुरुपयोग और, उतना ही महत्वपूर्ण, बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल थे जो पहले से ही ओपिओइड की लत से जूझ रहे थे।

तस्करों को गिरफ्तार करने से आपूर्ति बाधित हो सकती थी। लेकिन केवल इससे नशे की लत का इलाज नहीं किया जा सकता था, किसी युवा को इस चक्र में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता था और न ही नशा छोड़ने की कोशिश कर रहे व्यक्ति का पुनर्वास किया जा सकता था। इसलिए हमारी रणनीति तीन परस्पर जुड़े स्तंभों पर विकसित हुई—प्रवर्तन, नशामुक्ति और रोकथाम। इन्हीं को मिलाकर सरकार की नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के खिलाफ व्यापक कार्रवाई (CADA) की आधारशिला तैयार हुई।

उपचार की क्षमता में काफी विस्तार किया गया। 2021 तक पंजाब में सरकार द्वारा संचालित 202 आउटपेशेंट ओपिओइड असिस्टेड ट्रीटमेंट (OOAT) केंद्र थे, जिनमें जेलों में स्थित 11 केंद्र भी शामिल थे। इसके अलावा 54 सरकारी तथा 224 निजी नशामुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र भी थे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार उपचार केंद्रों में कुल मरीज पंजीकरण की संख्या सात लाख से अधिक थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि सात लाख लोगों का स्थायी रूप से इलाज हो गया था। यह केवल यह दर्शाता था कि उपचार तक पहुंच का दायरा कितना बढ़ा था।

रोकथाम की मुहिम को स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों तक ले जाया गया। बडी कार्यक्रम के तहत 9.51 लाख समूह बनाए गए और 43.5 लाख से अधिक छात्रों को इससे जोड़ा गया।

ड्रग एब्यूज प्रिवेंशन ऑफिसर पहल के तहत करीब 6.28 लाख स्वयंसेवकों का पंजीकरण किया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन स्वयंसेवकों ने 11.33 लाख से अधिक लोगों तक पहुंच बनाई।

नशे की तस्करी की आर्थिक बुनियाद पर भी प्रहार करना जरूरी था। 2021 तक कानून के तहत अधिकारियों ने नशे की तस्करी से जुड़ी 212 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्तियां फ्रीज की थीं। सितंबर 2021 तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार हमारे कार्यकाल के दौरान नशे से जुड़े मामलों में गिरफ्तारियों की संख्या 62,744 थी।ये आंकड़े कार्रवाई के पैमाने को दर्शाते थे, लेकिन अपने आप में यह साबित नहीं करते थे कि नशे की समस्या खत्म हो गई थी।

फिर प्रयास कहां पीछे रह गया? यह सवाल ईमानदारी से पूछा जाना चाहिए। एसटीएफ ने सही दिशा में शुरुआत की, लेकिन संस्थागत व्यवस्था अपनी शुरुआती गति को लगातार कायम नहीं रख सकी। इसके कमान ढांचे में बदलाव हुए। मार्च 2018 में एसटीएफ प्रमुख को मुख्यमंत्री को सीधे रिपोर्ट करने के बजाय पुलिस महानिदेशक के अधीन कर दिया गया। सितंबर 2018 में सिद्धू को एसटीएफ से हटा दिया गया और जुलाई 2019 में उन्हें फिर वापस लाया गया।

उस समय की रिपोर्टों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के बीच मतभेदों का भी उल्लेख हुआ था। ये महज प्रशासनिक बारीकियां नहीं थीं। कोई भी विशेष नशा विरोधी बल अकेले सफल नहीं हो सकता। इसके लिए जिला पुलिस, खुफिया एजेंसियों, अभियोजन, जेलों, स्वास्थ्य सेवाओं, वित्तीय जांच एजेंसियों, सीमा से जुड़ी एजेंसियों और नागरिक प्रशासन को एक संस्थागत श्रृंखला के रूप में काम करना जरूरी है। आपसी खींचतान, विभागीय अलगाव और अलग-अलग कमान व्यवस्था धीरे-धीरे उस बल की क्षमता को कमजोर कर सकती है, जिसे स्पष्ट उद्देश्य के साथ बनाया गया हो।

कोविड-19 महामारी ने भी CADA की पहलों के क्रियान्वयन को प्रभावित किया और सरकारी एजेंसियों की पहुंच तथा जमीनी स्तर पर गतिविधियों को सीमित किया।मुख्यमंत्री के रूप में मैं इन कमियों की जिम्मेदारी किसी और पर नहीं डाल सकता। वह मेरी सरकार थी। यह सुनिश्चित करना भी मेरी जिम्मेदारी थी कि सरकार के अलग-अलग अंग मिलकर काम करें। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे लगता है कि एसटीएफ को अधिक मजबूत संस्थागत निरंतरता, आंतरिक खींचतान से अधिक सुरक्षा और विभागों के बीच समन्वय की ज्यादा टिकाऊ व्यवस्था की जरूरत थी।

एक और पहलू था, जिसे हमने धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से पहचाना—पंजाब के युवाओं की आकांक्षाओं को नशे की समस्या से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारी सरकार ने घर-घर रोजगार और कारोबार मिशन, सीधे सरकारी भर्ती, रोजगार मेले, कौशल विकास और स्वरोजगार के लिए सहायता के माध्यम से रोजगार के अवसर पैदा करने का प्रयास किया। सितंबर 2021 तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार हमारे कार्यकाल के दौरान रोजगार और स्वरोजगार के करीब 19.29 लाख अवसर उपलब्ध कराए गए। इनमें 62,748 सरकारी नौकरियां, 7,37,963 निजी क्षेत्र की नौकरियां और करीब 10.93 लाख स्वरोजगार के अवसर शामिल थे।

नागरिक समाज संगठनों और निजी संस्थानों ने भी इस प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इससे भी बड़ा सबक इन आंकड़ों से आगे है। पंजाब को ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था की जरूरत है, जो एक युवा को शिक्षा से लेकर कौशल, अप्रेंटिसशिप, रोजगार या उद्यमिता तक पहुंचाए। रोकथाम का मतलब केवल युवाओं को यह बताना नहीं हो सकता कि उन्हें क्या नहीं करना है। सार्वजनिक नीति को उन्हें ऐसा कुछ भी देना होगा, जिसकी ओर वे सार्थक भविष्य की उम्मीद के साथ देख सकें।

केवल गिरफ्तारियां सफलता का पर्याप्त पैमाना नहीं हैं। सड़क पर नशा बेचने वाला व्यक्ति एक लंबे नेटवर्क की केवल दिखाई देने वाली कड़ी है। वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए—आपूर्तिकर्ता, नेटवर्क संचालक, वित्तपोषक और संरक्षण देने वाले लोगों की पहचान करना; पैसे के स्रोत का पता लगाना; दोषसिद्धि सुनिश्चित करना; आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करना; नए लोगों को नशे की लत में जाने से रोकना; पहले से नशे की गिरफ्त में आए लोगों का इलाज करना और उनका समाज में पुनर्वास करना।

2017 में मेरी प्रतिबद्धता वास्तविक थी। एसटीएफ का गठन भी वास्तविक था। इसके बाद CADA के तहत प्रवर्तन, नशामुक्ति और रोकथाम के क्षेत्रों में काफी काम हुआ। मिशन फिर भी अधूरा रहा। हालांकि 2017 से 2021 तक मेरी दूसरी सरकार के दौरान हमने निम्नलिखित उपलब्धियां हासिल कीं। मैं इतिहास को नए तरीके से लिखने के बजाय इस तथ्य को स्वीकार करना पसंद करूंगा।

मेरी दूसरी सरकार के दौरान पंजाब पुलिस ने NDPS अधिनियम के तहत 48,107 मामले दर्ज किए और 62,538 नशा तस्करों/आपूर्तिकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इस दौरान 2,216 किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई, जिसका अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य करीब 11,000 करोड़ रुपये आंका गया था। इसी अवधि में पंजाब पुलिस ने नशा तस्करों/आपूर्तिकर्ताओं की 214 करोड़ रुपये मूल्य की अवैध रूप से अर्जित संपत्तियां फ्रीज कीं। इस दौरान पंजाब पुलिस ने NDPS अधिनियम के तहत व्यावसायिक मात्रा से जुड़े 5,995 मामले दर्ज किए और 10,474 लोगों को गिरफ्तार किया।

जुलाई 2021 तक 424 से अधिक ‘बड़ी मछलियों’ को गिरफ्तार किया गया था, जिनके पास 2 किलोग्राम या उससे अधिक हेरोइन बरामद हुई थी। NDPS अधिनियम के मामलों में दोषसिद्धि की दर 2018 में 59 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 64 प्रतिशत, 2020 में 66 प्रतिशत और 2021 में 77 प्रतिशत हो गई। पंजाब को एक और घोषणा की जरूरत नहीं है कि नशे की समस्या खत्म हो गई है। उसे ऐसी संस्थाओं की जरूरत है, जो सरकारों, व्यक्तियों या राजनीतिक सुविधा से परे साल-दर-साल इस लड़ाई को जारी रखने में सक्षम हों। न किसी को निशाना बनाने के लिए अभियान। न किसी को संरक्षण। सबूतों के आधार पर कार्रवाई। नेटवर्क को तोड़ना, पीड़ित का इलाज करना और पंजाब के युवाओं को भविष्य देना। यही पंजाब का अधूरा एजेंडा है।

Advertisement
×