कानूनी प्रक्रिया से ही हो दंडात्मक कार्रवाई

कानूनी प्रक्रिया से ही हो दंडात्मक कार्रवाई

राजेश रामचंद्रन

राजेश रामचंद्रन

बुलडोज़र अब प्रतीक बन गया है दमन के पर्याय जैसे अलोकतांत्रिक व्यवहार का। लगता है उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस मशीन को अपना राजकीय चिन्ह और सरकारी मुहर बनाने की ठान ली है। जब यह दैत्य एक वर्ग विशेष के गली-मोहल्ले में प्रदर्शनकारियों के घर और चूल्हे गिराने के लिए दनदनाता है तो एक नई किस्म का फौरी और बिना संस्थागत मुकदमा-सुनवाई वाला दुराग्रह से प्रेरित दंड नजर आता है। हमारा संविधान सरकारों को सख्ती बरतने का एकाधिकार देता है लेकिन केवल तभी जब यह नागरिकों के जान-माल बचाने की खातिर हो, और इसकी भी एक बाकायदा कानून सम्मत प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्यवश, सरकार न्याय प्रक्रिया को ताक पर रखकर अपने ही नागरिकों की जायदाद पर दमनात्मक कार्रवाई बरपा रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार की प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध इस अनुचित प्रतिकर्म वाली नीति के विरुद्ध जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा दायर एक याचिका को स्वीकार कर सर्वोच्च न्यायालय ने दखल देकर सही किया है और कहा-‘कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बगैर निर्माण ढहाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी।’ अलबत्ता यह आदेश इस किस्म की तमाम अन्य कार्रवाइयों पर एकमुश्त रोक लगाने से जरा पहले रुक गया है, जिसे पाना याचिकाकर्ताओं का हक है ताकि एक बाकायदा चुनकर आई सरकार द्वारा कानूनी प्रक्रिया की अलफ उल्लंघना पर रोक लग सके। बिडंबना कि इसी सरकार को कानून की प्रक्रिया बनाए रखने का जनादेश दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने जिस बृहद तात्विक प्रश्न को छेड़ दिया है, वह यह है कि जो सरकार खुद कानून की प्रक्रिया को ताक पर रखे उसके प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी हो। यथा, जब-जब विरोध प्रदर्शन की तीव्रता बढ़े तो क्या उसी अनुपात में प्रतिक्रमात्मक उपाय भी बढ़ेंगे, और इससे हिंसा का न थमने वाला चक्र शुरू हो जाएगा, जो आगे एक वर्ग विशेष को और ज्यादा हाशिये पर धकेलेगा और प्रदर्शनों का अपराधीकरण होगा।

बदतर यह कि शासकों द्वारा ऐसे कारनामे दंड-भय से मुक्त होकर किए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें यकीन है कि अपनी ‘सल्तनत’ बनने तक वे सत्ता में बनेंगे। क्या हो अगर कभी भविष्य में अखिलेश यादव या मायावती की सरकार उन्हीं बुलडोज़रों को अपने राजनीतिक विरोधियों के घरों पर चढ़ाए? आखिरकार, देशभर में सबसे खराब अमल भवन निर्माण नियम संहिता पर होता आया है। हमारे समाज के भ्रष्टाचार का सबसे बढ़िया और प्रत्यक्ष नमूना स्थानीय निकाय विभागों द्वारा भवन निर्माण संहिता का अक्षरशः पालन न करवाने में दिखता है। यह नागरिकों द्वारा नियमों का पालन करने की मंशा से ज्यादा घटिया प्रशासनिक निजाम का अक्स है। कहीं भी, किसी भी भवन में की गई निर्माण नियमों की उल्लंघना रिश्वत देकर और अगर बड़े पैमाने पर की गई हो तो वोट-बैंक की सौदेबाजी से नियमित कर दी जाती है। तब फिर क्यों नहीं बुलडोज़र भारत के सबसे आलीशान किंतु अवैध कालोनियाें, जैसे कि दिल्ली के पॉश फार्म इलाके पर जा चढ़ता।

जाहिर है, यहां मसला नियम उल्लंघना का नहीं बल्कि उल्लघंनकर्ता कौन है, इसका है, जिसके घर के दरवाजे पर एक दिन नोटिस चिपकाया जाता है तो अगले ही रोज बुलडोजर से ढहा दिया जाता है। और जब एक वर्ग विशेष को इस तरह निशाना बनाकर कार्रवाई हो, सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल पैदा होते हैं। ऐसे में उस वर्ग विशेष के यकीन को कैसे झुठलाएं जब वह कहे कि उत्तर प्रदेश सरकार पक्षपाती है और इससे न्याय की आस नहीं? एक पक्षपाती सरकार द्वारा खास वर्ग को दबाना क्या ठीक वही नहीं है जैसी कि मुगल सम्राट औरंगज़ेब की नीतियां थीं? इसलिए औरंगज़ेब को लानत-मलामत डालने वाले क्या खुद भी उसके जैसा पक्षपाती और मजहब परस्त प्रशासन बनाने की नकल नहीं कर रहे?

यह तथ्य है कि उत्तर प्रदेश में हुए विरोध प्रदर्शनों में अधिकांश को संप्रदाय विशेष के उन कट्टरपंथी तत्वों ने हवा देकर भड़काया है, जिनका यकीन मौलाना मौदुदी का बताया निज़ाम बनाने में है– इसका मकसद भारत में सांप्रदायिक राजनीति के जरिए एकाधिकार वाली प्रतिगामी सत्ता बनाना है–और इस राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु हथियार तक उठाने में गुरेज न हो, जैसा कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा के जरिए इलाका हड़पा था। एक संप्रदाय विशेष के राजनीतिक संगठनों ने दिखावे के लिए प्रगतिशील दलित-समर्थक होने का मुखौटा लगा रखा है, केरल में पाली-पोसी इस विधा को हिंदी भाषी प्रदेशों में फैलाया गया, जो केवल ‘दूसरों’ के खिलाफ हिंसा को न्यायोचित बनाने के लिए है, फिर चाहे यह ‘बेगाने’ कोई भी हों, उस इलाके के कम गिनती वाले अल्पसंख्यक।

इसलिए पैगम्बर पर आपत्तिजनक टिप्पणी से सड़कों पर जो हिंसा बनी, वह भी सिर्फ जब खाड़ी के मुल्कों द्वारा इसे विषय बनाने के बाद, हालांकि यह अराजकता उस धर्म विशेष के चरमपंथी और सांप्रदायिक तत्वों द्वारा भी भड़काई जा सकती थी। ऐसे तत्वों की शिनाख्त होने के बाद उन पर सख्त से सख्त कानूनों के तहत मामला चले और जेल में रखा जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे और नफरत और वैमनस्य न फैलाने पाएं। लेकिन पुलिस की सुस्ती का तोड़ बुलडोजर नहीं हो सकता। केवल फौरी शक या अनुमान के आधार पर किसी को समस्या पैदा करने वाला मान लेना एक कानून-सम्मत समाज के लिए अच्छा नहीं है। हिंसा भड़काने वालों के मामलों में, सरकारी वकीलों को ठोस सबूत पेश करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि आरोपी प्रमाणों के अभाव में छूटने न पाए, और ऐसा होता है तो हो जाने देने वाला रवैया न अपनाएं। तब यह प्रक्रिया सरकार की नीयत और कार्रवाई को वैधता देती है। लेकिन प्रक्रिया का पालन न करना एक चुनी हुई सरकार और इसकी तमाम कार्रवाई को गैर-उचित बना देता है, खासकर जब यही बुलडोज़र समान संदर्भों में बहुसंख्यकों के गली-मोहल्लों का रुख न करें।

विवादित टिप्पणी, जिसने तमाम हिंसा को जन्म दिया और प्रतिक्रमवश बुलडोज़र चले, इसकी परिणति में भाजपा को अपने ही प्रवक्ता और कार्यालय पदाधिकारी को हटाना पड़ा। बीते शुक्रवार की सुबह, भारतीय समयानुसार, उक्त हिंसा प्रसंग के तीन सप्ताह बाद, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्रिंस का उक्त टिप्पणी के आलोक में निंदा करना दर्शाता है कि अमेरिका इस मुद्दे का इस्तेमाल भारत के प्रति गुस्सा दिखाने में कर रहा है। इससे पूर्व, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया था कि खाड़ी देशों में अमेरिका के सहयोगी मुल्कों का यह रवैया भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा अमेरिकी सरकार की भारतीय अल्पसंख्यकों पर आई रिपोर्ट को खारिज करने की प्रतिक्रियावश था। हो सकता है अमेरिका की नवीनतम ताड़ना भारत-रूस व्यापार संधि के संदर्भ में हो, जिसमें नई भुगतान व्यवस्था के तहत रूस से कच्चा तेल मिल सकेगा और भारत को इसकी जरूरत बेतरह है।कांग्रेस की बनिस्बत भाजपा को राजनयिक ताड़नाओं या अखबारों में पार्टी या सरकार पर हमला करते विचारकों के लेखों से जरा शर्म महसूस नहीं होती। क्योंकि इस बारे में भाजपा का यकीन है कि वह अमेरिका जिसने पूरबी पाकिस्तान में लाखों हिंदू-मुस्लिमों का नरसंहार करने वालों की मदद की थी, जब वह भारत में सांप्रदायिक सौहार्द और अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करे तो इसका मंतव्य कुछ और ही है। लेकिन महाशक्तियों की तर्ज पर ‘जिसकी शक्ति उसकी चलती’ वाले सिद्धांत की नकल करने के यत्न में, हमारी सरकार राजनयिक अनिश्चितता और घरेलू संघर्ष बनने की संभावना वाले कंटीले मैदानों में घुस रही है और यह करना प्रतिक्रम को दावत देना है।

सत्ताधारी दल के बदजुबान प्रवक्ता और सरकारी बुलडोज़र के बीच एक अजीब समानता यह है कि दोनों ही धौंस दिखाऊ, लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का मखौल उड़ाने और अवहेलना करने वाले हैं। बेशक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे लेकिन यह बहुत अहम है कि हम अपने बारे में क्या सोचते हैं। बुलडोजर चलाकर किसी का घर गिरा देने वाली धौंस और विष वमन करने वाली जो छवि हमने अपनी गढ़ ली है, क्या वह मंजूर करने लायक है?

लेखक प्रधान संपादक हैं।

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