बैंकों के लाइलाज रोग का उपचार निजीकरण

बैंकों के लाइलाज रोग का उपचार निजीकरण

भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला

पिछले तीस महीनों में असफल होने वाले प्राइवेट बैंकों में यस बैंक और पीएमसी बैंक के बाद तीसरे नम्बर पर लक्ष्मी विलास बैंक है। इस बैंक के संकट में आने के साथ ही सार्वजनिक बैंकों के कर्मचारियों ने मांग की है कि लक्ष्मी विलास बैंक का विलय किसी सार्वजनिक बैंक के साथ किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि प्राइवेट बैंकों में धांधलेबाजी होती है और जनता की गाढ़ी कमाई के साथ खिलवाड़ किया जाता है। लेकिन सार्वजनिक और प्राइवेट बैंकों के बीच एक मौलिक अंतर है। सार्वजनिक बैंकों के सभी शेयर भारत सरकार के पास होते हैं। इनके शीर्ष अधिकारी या चीफ एग्जीक्यूटिव आफिसर का बैंक पर कोई मालिकाना हक नहीं होता। ऐसे में बैंक अधिकारी के लिए संभव है कि उसकी निगाह बैंक के लाभ पर न होकर अपनी कमाई पर हो।

जैसे यदि किसी सार्वजनिक बैंक के मुख्य अधिकारी ने किसी डूबती हुई कंपनी को भारी ऋण दिया और उसमें एक रकम घूस के रूप में प्राप्त कर ली तो मुख्य अधिकारी को लाभ होगा लेकिन बैंक को घाटा होगा। इतना सही है कि यदि देश का वित्त मंत्री सजग हो तो घाटे में जाने वाले बैंक के मुख्य अधिकारियों पर कदम उठाए जा सकते हैं लेकिन देखा गया है कि यह सख्ती केवल उन्हें पदच्युत करने अथवा स्थानांतरित करने तक सीमित हो जाती है। मुख्याधिकारी के लिए यह संभव है कि एक बैंक में घाटा होने के बाद वह दूसरे पद पर पुनः लाभ कमाए। मूल बात है कि सार्वजनिक बैंक के मुख्य अधिकारी और मालिक (सरकार) के स्वार्थ अलग-अलग होते हैं।

तुलना में प्राइवेट बैंकों में मुख्याधिकारी और मालिक के बीच गहरा समन्वय होता है। जैसे किसी प्राइवेट बैंक के मुख्याधिकारी द्वारा घटिया लोन दिए गये और बैंक को घाटा लगा तो बैंक के मालिक को भी घाटा हाेगा जबकि सार्वजनिक बैंक में ऐसा नहीं है। प्राइवेट बैंक को घाटा होने के साथ उस बैंक के शेयर की कीमत गिरेगी और मालिक की साख भी तदनुसार कम होगी। इसलिए मूल रूप से प्राइवेट बैंक के मुख्याधिकारी का प्रयास रहता है कि वह बैंक को लगातार अच्छी दिशा में ले चले ताकि उसकी स्वयं की नौकरी और उसके मालिक दोनों के हित सधते रहें।

इसके बावजूद सभी बैंकों द्वारा घटिया लोन दे दिए जाते हैं। जैसे लक्ष्मी विलास बैंक द्वारा कैफे काफी डे, नीरव मोदी और जेट एयरवेज जैसी कम्पनियों को ऋण दिए गये जो कि आज खटाई में पड़ गये हैं। यह कह पाना कठिन है कि ये ऋण गलतफहमी में या फिर भली प्रकार सोच-विचार के दिए गये या फिर इसमें गड़बड़ी की गयी। बहरहाल, यह सही है कि ऐसे ऋण देने से प्राइवेट बैंक को घाटा होता है और वह घाटा शीघ्र ही बाजार और समाज के सामने आ जाता है और बैंक की साख प्रभावित होती है।

तुलना में यदि सरकारी बैंकों द्वारा भी इसी प्रकार के घटिया लोन दिए गये तो उनका पर्दाफाश नहीं हो पाता है। बैंकों को घाटा लगता रहता है और सरकार द्वारा उनके घाटे की भरपाई करने के लिए इनमें उत्तरोत्तर अधिक पूंजी का निवेश करती रहती है। हाल ही में वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों में बीस हजार करोड़ रुपये की पूंजी बढ़ाने का निर्णय लिया है। यानी प्राइवेट और सरकारी दोनों ही बैंकों द्वारा घटिया लोन दिए जाते हैं। दोनों में ही शीर्ष अधिकारी की मिलीभगत होती है अथवा हो सकती है। लेकिन यदि सरकारी बैंक द्वारा दिया गया ऋण घाटे में पड़ जाए तो बैंक डूबता नहीं है बल्कि उस घाटे की भरपाई करने के लिए केन्द्र सरकार उस बैंक में पूंजी डालकर उसमें जान फूंक देती है। यदि प्राइवेट बैंक घाटाग्रस्त होता है तो उसकी खटिया खड़ी हो जाती है, वह डूब जाता है और अपने मालिक को भी ले डूबता है। दोनों के इस अंतर को देखते हुए प्राइवेट बैंक ही बेहतर हैं क्योंकि घाटा तो दोनों में लगता है। अंतर सिर्फ इतना है कि सार्वजनिक बैंक में लगी कैंसर की बीमारी अंदर-अंदर फैलती रहती है और ऊपर से कीमोथेरैपी चलती रहती है जबकि प्राइवेट बैंकों में इस रोग का पर्दाफाश शीघ्र हो जाता है और उसका पक्का उपचार किया जाता है, चाहे उस बैंक को जबरन दूसरे बैंक में विलय करने जैसा कदम ही क्यों न उठाना पड़े।

इस सन्दर्भ में हमें विचार करना चाहिए कि सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी ने किस उद्देश्य से प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था? उनका मानना था कि प्राइवेट बैंकों द्वारा केवल शहर में पूंजीपतियों को ऋण दिए जाते हैं और ग्रामीण क्षेत्र बैंक की सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने इसी उद्देश्य से प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और वास्तव में इसके सार्थक परिणाम आये हैं। राष्ट्रीयकरण के बाद राष्ट्रीय बैंकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में शाखाएं खोली गयीं और सेवायें उपलब्ध करायी गयीं, लेकिन यह कार्य तो निजी बैंकों द्वारा भी कराया जा सकता था। रिजर्व बैंक ने व्यवस्था कर रखी है कि प्राइवेट और राष्ट्रीय सभी बैंक प्राथमिक क्षेत्र, जिसमें कृषि, घरेलू उद्योग, स्माल स्केल इंडस्ट्री इत्यादि शामिल हैं, अपने कुल ऋण का एक निर्धारित हिस्सा इन क्षेत्रों को देंगे। रिजर्व बैंक के पास अधिकार हैं कि वह निजी बैंकों को आदेश दे सकता है कि वे किन ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएं खोलकर अपनी सेवायें उपलब्ध कराएं।

दुर्भाग्यवश इंदिरा गांधी ने प्राइवेट बैंकों को इस प्रकार के दिशानिर्देश देने के स्थान पर उनका राष्ट्रीयकरण कर दिया जो हितकर होने के स्थान पर अहितकर साबित हुआ। यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवायें उपलब्ध कराई गयीं लेकिन इस कदम का देश को भारी मूल्य अदा करना पड़ रहा है। प्रति वर्ष बजट में हजारों करोड़ रुपये जनता से टैक्स वसूलकर इन सार्वजनिक बैंकों को जीवित रखने के लिए घाटा पूर्ति के लिए दिया जा रहा है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों को सेवायें तो अवश्य उपलब्ध कराई गई हैं परन्तु सरकारी बैंक के घाटे की भरपाई करने के लिए उसी गरीब जनता पर निरन्तर टैक्स आरोपित किया जा रहा है और उस वसूली से बैंकों की अकुशल नौकरशाही को पोषित किया जा रहा है।

समय आ गया है कि लक्ष्मी विलास जैसे बैंकों की समस्या का पर्दाफाश होने से हमको विषय की वास्तविकता से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए और समझना चाहिए कि सार्वजनिक और प्राइवेट दोनों बैकों में लगभग एक जैसी ही समस्याएं हैं। अंतर मात्र इतना ही है कि प्राइवेट बैंकों का पर्दाफाश हो जाता है और उस पर कार्रवाई हो जाती है जबकि सार्वजनिक बैंक में वही समस्या परदे के पीछे छुपी रहती है और जनता पर टैक्स लगाकर इन बैंकों को लगातार जीवित रखा जाता है।

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।

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