विषमता की खाई

विकास के दावों के बीच गरीबी का दंश

विकास के दावों के बीच गरीबी का दंश

लक्ष्मीकांता चावला

भारत की स्वतंत्रता के बाद देश एकदम विभाजन की पीड़ा के साथ बेहद मुश्किल स्थिति में था। पहले दो दशक तो उसे संभालने-बसाने, रोटी का प्रबंध करने तथा शरणार्थियों को छत देने में ही लग गए। इसके बाद कभी हमने सुना गरीबी मिटाएंगे, कभी यह सुना कि देश का बहुत विकास हो रहा है या देश विकसित हो गया है, पर सत्य क्या है, इसे वही जानते हैं जो ठंडी सर्द रातों में किसी फुटपाथ पर सोते और वहीं जीवन व्यतीत कर देते हैं। 

यह ठीक है कि देश में पिछले 74 वर्षों में बहुत विकास हुआ। हम विश्व पटल पर छा गए। रक्षा के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हैं और अब कोरोना से लड़ने और कोरोना वैक्सीन बनाकर दुनिया को यह संजीवनी बांटने में भी हम सक्षम हो गए। यह एक नया कीर्तिमान है, पर हमारी विडंबना यह है कि अभी भी देश में करोड़ों लोग भूखे, नीली छत के नीचे पड़े हैं, फिर भी सत्तापक्ष का कोई भी वक्ता-प्रवक्ता पिछली आधी शताब्दी से देश की जनता को विश्वास दिलाता है कि भारत पूरी तरह विकसित हो गया। अब रोटी-कपड़े का कोई संकट नहीं। रोजगार भी मिलता है और भूखे पेट सोने के लिए हिंदुस्तान में कोई भी विवश नहीं। 

यद्यपि सरकारी तंत्र समय-समय पर यह जानकारी भी देता रहता है कि आज भी देश के करोड़ों लोग भूखे पेट आकाश के नीचे फुटपाथ पर या कहीं भी सड़क के किनारे सोते हैं। सर्दी-गर्मी का कहर भी सहन करते हैं। भारत सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि कोरोना लॉकडाउन के दिनों में अस्सी करोड़ गरीबों को मुफ्त अनाज दिया गया अर्थात‍् अस्सी करोड़ भारतीय अभी भी बहुत गरीब हैं। अभी ताजा घटना है। गुजरात के सूरत महानगर में फुटपाथ पर सोये राजस्थान से मजदूरी करने गए 15 मजदूर बेकाबू ट्रक से कुचले गए। इस घटना ने देश के विकास की पोल तो खोल ही दी, यह भी बता दिया कि आज भी पेट की आग बुझाने के लिए देश के लाखों लोग एक प्रांत से दूसरे प्रांत में रोटी जुटाने के लिए जाते हैं। 

इसी विकास का वीभत्स दृश्य लॉकडाउन के दिनों में भी दिखा, जब भूख और बेकारी से सताए हजारों लोग सिर पर बोझ, गोद में बच्चे उठाए पैदल ही अपने-अपने गांवों की तरफ चले। कितना हृदयविदारक दृश्य रहा होगा जब भूख और थकान से हारकर रेल ट्रैक पर ही लोग सो गए और 16 लोग रेलगाड़ी के नीचे कुचले गए। जिन्होंने यह देखा और जिन्हें सहना पड़ा, वे ही वास्तव में इसकी पीड़ा समझते हैं। 

देश का बचपन भी भूख से त्रस्त है। अभी ताजा समाचार है। जालंधर में बिहार से लाए चालीस बच्चे पकड़े गए, जो किसी फार्म हाउस में मजदूरी करते हैं। अपराधी बच्चों को लाने वाला है तो साथ ही वे रईस भी तो हैं जो जानते हुए भी इन बच्चों को काम पर लगाते हैं। वेतन कितना देते होंगे, इसकी तो चर्चा ही व्यर्थ है। वर्षों पहले हम स्कूलों-कालेजों में भाषणों के नाम पर एक ही बात कहते थे, जिस देश का बचपन भूखा है, उस देश की जवानी क्या होगी, पर बचपन तो आज तक भी भूखा है। पूरे देश के चौक-चौराहों में दर्जनों बच्चे भीख मांगने वाले या थोड़ा सामान बेचकर रोटी कमाने वाले मिल जाते हैं। 

सरकारों से बार-बार पूछा कि ये बच्चे कहां से आ गए? क्या यह सच नहीं कि देश में लापता बच्चों की भी संख्या लाखों में है, जो आज तक परिवार को मिले नहीं। वह मानव तस्करी का शिकार हो गए। उनके अंग निकाल कर बेचे गए या बेटियां वेश्यावृत्ति में धकेल दी गईं। आवश्यक यह है कि चुनाव के दिनों में वोट बटोरने के लिए केवल लुभावने नारे, मुफ्तखोरी के सब्जबाग न दिखाए जाएं। इन नारों के जंजाल में फंसे आमजन, अति गरीब व्यक्ति कुछ दिन चुनावों में प्राप्त आश्वासनों एवं थोड़े नोटों से चार दिन तो चांदनी मना लेंगे, उसके बाद वही भूख, फुटपाथ और शोषण की चक्की में पिसते रहेंगे। वैसे यह तभी संभव है जब देश के सभी राजनीतिक दलों के नेता, सत्तापति स्वयं सरकारी साधनों का अपने सुख के लिए दुरुपयोग न करें। जनता के लिए सदुपयोग करें।

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