सड़कों पर गड्ढे, होर्डिंग्स में विकास

तिरछी नज़र

सड़कों पर गड्ढे, होर्डिंग्स में विकास

सौरभ जैन

सौरभ जैन

भारतीय राजनीति में विकास पुरुष की अवधारणा का विशेष महत्व होता है। कोई पुरुष तब तक नेता नहीं बन पाता, जब तक वो विकास पुरुष न बन जाए। इसी परंपरा के चलते राजनीति में आया हर पुरुष पहले विकास पुरुष बनता है। नुक्कड़, गली, चौराहे पर लगे बैनर उसके विकास पुरुष होने को सर्टिफाइड करते हैं। एक प्रमाणित विकास पुरुष ‘क्षेत्र में विकास की गंगा बहाने वाले’ इस पंक्ति को अपने होर्डिंग का ध्येय वाक्य बना लेते हैं। यह पंक्ति कॉपीराइट से मुक्त होती है, इसलिए सभी विकास पुरुष अपने बैनरों पर विकास की गंगा बहाते पाए जाते हैं। विकास पुरुष और विकास दोनों ही होर्डिंग्स में नजर आते हैं। जबकि धरातल की वस्तुस्थिति बारिश में गड्ढों वाली सड़क में पानी भरे जलकुंड की होती है। यहां मोटरसाइकिल का पहिया गड्ढे में और वहां सवार गुलाटी खाते हुए सड़क किनारे लगे होर्डिंग के नीचे जा पहुंचता है।

विकास पुरुष होना राजनीति में स्टेटस सिंबल है। डायनासोर विलुप्त ही इसलिए हुए क्योंकि वे बदलती हुई परिस्थिति के अनुरूप खुद को ढाल नहीं पाए। नेताओं को उनकी प्रजाति में सम्मिलित नहीं होना है, इसलिए वे विकास पुरुष के लेबल के साथ अपना अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं। विकास पुरुषों को देख कर तो हमें यूं लगने लगा है मानो विकास कोई देखने की नहीं बल्कि सुनने की चीज होती है। विकास पुरुषों के मुखारविंद से बहने वाली विकास की गंगा में जनता भविष्य की संभावनाओं के गोते ही लगाती रहती है। विकास पुरुष भाषणों में विकास को कैद किये हुए हैं। हम मूर्ख यहां वहां खोजने का दुस्साहस करते हैं। जबकि हकीकत में विकास तो अभौतिक होता है, होता है पर दिखता नहीं है।

वैसे हमारे देश में प्रत्येक पद की शक्ति होती है। पद के कद के अनुसार शक्तियों में भिन्नता पाई जाती है। पार्षद वार्ड में भटकने निकले तो नालियां साफ हो जाती हैं। कोई विधायक भूलवश किसी गांव का दौरा कर ले तो बंद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का ताला खुल जाता है। सांसद अपने ही क्षेत्र के किसी सरकारी दफ्तर में जा पहुंचे तो वहां झाड़ू भी लग जाती है। मंत्रीजी के आने की सूचना जर्जर सड़कों पर डामर का लेपन करवा देती है। बात अगर मुख्यमंत्री के आने की हो तो स्कूल का भवन, पानी की टंकी, शहीद की मूर्ति जैसी सौगातें जनता को मिलती हैं। केंद्र का कोई बड़ा नेता आए तो ट्रेन का स्टॉपेज उस क्षेत्र के नाम हो जाता है। विकास का स्वरूप नेताओं के कद पर निर्भर होता है। लेकिन जब दूसरे देश का नेता आता है तब तो भईया विकास टशन में होता है। शहरी लोग तो इनके आने से खुश होते ही हैं, अब गांव में रहने वाले लोग भी इस उम्मीद से हैं कि कोई विकास पुरुष उनके गांव में भी विकास लेकर आएगा।

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