पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त सियासी दलों को मिलने वाले बड़े चंदे में पारदर्शिता न होने पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। चुनाव आयोग के सीमित हक, कर छूट प्रणाली व इलेक्टोरल बॉन्ड आदि के चलते संदेह और बढ़ा। ऐसे में कोर्ट की निगरानी में जांच व अनिवार्य ऑडिट जरूरी हैं। चुनाव आयोग को संदिग्ध दलों को हटाना चाहिए।
बीबीसी की हालिया खोजी खबर में छह पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) को मिले भारी-भरकम चंदे के बारे में जांच ने भारतीय राजनीति का जाना-पहचाना लेकिन दिलचस्प पहलू उजागर किया है। ये वह बुराई है जो चंहु ओर व्याप्त है। सियासी दल और उन्हें फायदा देने वाले लोग इस गठजोड़ से फलते-फूलते हैं, भले यह निंदनीय, गैर-कानूनी व परेशानीजनक लगे।
इससे पहले, 18 जुलाई, 2025 को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें पाया गया कि वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की घोषित आय में 223 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट कहती है, उक्त श्रेणी में आते 2764 दलों में से केवल 739 ने ही उस साल के अपने वित्तीय रिकॉर्ड चुनाव आयोग को सौंपे थे, जो कानून अनुसार राजनीतिक पार्टियों के भविष्य व भाग्य का एकमात्र विधाता है। ‘चुनाव प्रणाली को साफ-सुथरा बनाना’ शीर्षक से एक प्रेस नोट में, चुनाव आयोग ने (9 अगस्त 2025) कहा कि उसने ‘चुनाव प्रणाली साफ-सुथरी बनाने की व्यापक और सतत रणनीति के तहत’ 2854 पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त सियासी दलों में से 334 को सूची से हटा दिया। देखना दिलचस्प होगा कि क्या जिन छह पार्टियों की चर्चा हो रही है, वे चुनाव आयोग की इस ‘सतत रणनीति’ का हिस्सा हैं या नहीं।
16 अक्तूबर, 1994 को, चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के तहत एक आदेश में, मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने ‘देश के करीब सभी सियासी दलों —चाहे वे मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियां थीं या पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त दल— में व्याप्त खराब कार्यप्रणाली’ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा :’मुझे अभी तक एक भी ऐसी पार्टी नहीं मिली जो अपना कामकाज उसके अपने संविधान या नियमों-विनियमों में दिए प्रावधानों मुताबिक चला रही हो’। उस आदेश के जरिए, उन्होंने सभी दलों को अपना कामकाज ठीक करने के लिए ‘नोटिस’ दिया था और घोषणा की कि चुनाव आयोग ‘मूक दर्शक’ बनकर नहीं रहेगा। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29-ए के तहत पंजीकरण उपरांत केंद्रीय चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों में अनुच्छेद 3 (भाग 23वां) कहता है कि पंजीकरण के इच्छुक दल को अपने संविधान में बताना होगा कि वह पंजीकरण के 5 साल के भीतर चुनाव लड़ेगा व अगर कोई दल ‘6 साल लगातार चुनाव नहीं लड़े’ तो वह ‘मान्यता प्राप्त दलों’ की सूची से हटा दिया जाएगा।’
‘सूची से हटाने’ (डीलिस्टिंग) का मतलब पंजीकरण रद्द करना नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग के पास ऐसा करने का हक नहीं है। इस तरह, पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दल भले ही ‘मान्यता प्राप्त’ न भी हों, फिर भी वे धारा 29-बी के तहत चंदा पाने और धारा 29-सी के तहत आयकर छूट के हकदार रहते हैं। ‘मान्यता’ का मामला ‘चुनाव चिन्ह आदेश’ के आदेश नं. 6 से तय होता है, जो चिन्ह आवंटित करने के उद्देश्य से ‘मान्यता प्राप्त’ और ‘गैर मान्यता प्राप्त’ राजनीतिक दलों’ में अंतर करता है व उनके वर्गीकरण के नियम तय करता है।
इसलिए, चाहे कोई दल सूची से हटा दिया गया हो या ‘अमान्यता प्राप्त’ श्रेणी में आता हो, उसे चंदा पाने का हक रहता है। जांच का विषय है कि क्या ऐसे चंदे पर आयकर छूट मिलती रही, क्योंकि सूची से हटाने का मकसद ही उन्हें अयोग्य ठहराना है।
‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव संस्था’ में वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता वेंकटेश नायक की रिपोर्ट के अनुसार, 22 दलों के पास 2024 के आम चुनावों के दौरान कुल 18,742.31 करोड़ रुपये की रकम थी। इसमें चुनाव की घोषणा के समय उनके पास मौजूद फंड और चुनाव की घोषणा से लेकर चुनाव खत्म होने के बीच जुटाया 7,416.31 करोड़ रुपये का चंदा शामिल था। केंद्रीय चुनाव आयोग को सौंपे गए हिसाब-किताब के मुताबिक, चुनाव उपरांत इन दलों के हाथ में 14,848.46 करोड़ रुपये था (नकदी, बैंक खातों और एफडी में रखा पैसा शामिल) जोकि चुनाव संबंधित खर्चों पर 3,861.57 रुपये लगने के बाद बचा था।
अध्ययन में पाया गया कि बीते दशक में, राजनीतिक चंदे पर कर छूट के कारण सरकारी खजाने को 11,813 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस मामले में निजी दानदाताओं और हिंदू अविभाजित परिवारों ने सियासी दलों को चंदा देने में कॉर्पोरेट्स को पीछे छोड़ दिया। वित्त वर्ष 2022-23 में, व्यक्तिगत दानदाताओं ने 2,275.85 करोड़ रुपये छूट का दावा पेश किया, जो कॉर्पोरेट द्वारा किए 514.4 करोड़ रुपये और फर्मों/एसोसिएशन के 115.71 करोड़ रुपये के दावों से कहीं ज़्यादा था। राजनीतिक दलोंं को मिला घोषित चंदा 2015-16 में 714 करोड़ रुपये (43 दल) से बढ़कर 2023-24 में 7,203 करोड़ रुपये (27 दल) हो गया। तथापि, कुल चंदा रकम (नौ वर्षों में 28,287 करोड़ ररुपये) में से केवल 41.76 प्रतिशत पर ही कर छूट का दावा किया, जिससे शेष 58 फीसदी बारे सवाल उठते हैं। नायक हैरान हैं कि ‘कर छूट की इच्छा रखे बिना चंदा देने को उन्हें क्या चीज़ प्रेरित करती है? पारदर्शिता की कमी के कारण जवाब अस्पष्ट है।’
‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ के नाम पर 2018 में सत्ताधारी दल जो सुधार लाया था, उसने गोपनीयता की मोटी परत चढ़ा दी, जिससे दलों को चंदे का पूरा परिदृश्य धुंधला कर डाला। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया, लेकिन बाद में सामने आई चंदा संबंधी जानकारी ने ऐसे प्रश्न खड़े किए जिनका जवाब अभी तक नहीं मिला। अधिकांश पंजीकृत किंतु अमान्यता प्राप्त दल इलेक्टोरल बॉन्ड पाने के योग्य ही नहीं थे क्योंकि यह सुविधा उन दलों तक सीमित थी जिन्होंने हालिया लोकसभा या विधानसभा चुनावों में न्यूनतम 1 फीसदी वोट अंश पाया। तो फिर ये चंदा किसने व क्यों दिया?
राजनीतिक दलों को पारदर्शिता बरतने में बहुत कम रुचि है। वे केंद्रीय सूचना आयोग के 2013 के उस आदेश को टालने को एकजुट हो गए, जिसके तहत उन्हें ‘सूचना अधिकार अधिनियम’ के दायरे में लाया गया था। आयकर विभाग भी शायद सियासी दलों के खातों की जांच-पड़ताल को उतनी प्राथमिकता नहीं देता, जितनी आम करदाता के खातों को देता है। चुनाव आयोग के पास ऐसा करने के लिए न तो हक हैं, न इच्छाशक्ति और न ही संसाधन।
अतएव, यह सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह इलेक्टोरल बॉन्ड और कथित ‘लेन-देन’ मामले की पड़ताल अदालती निगरानी में करने का आदेश दे। इसमें उन ‘छोटे’ दलों का मामला भी शामिल हो जिन्हें भारी चंदा मिला और उन्होंने खर्चा दिखाया, जबकि चुनावी प्रक्रिया में सरगर्म नहीं दिखे। अनुच्छेद 324 के तहत, चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को आदेश दे कि वे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या उसके द्वारा नामित व्यक्ति से अपने खाते ऑडिट करवाएं। वह चुनावों के दौरान दलों के खर्च पर सीमा लगाने पर भी विचार करे। चंदे पर कर छूट को खर्च सीमा से जोड़ा जाए। शेष तमाम किस्म के चंदा, जिनसे दल समृद्ध होते हैं, उन पर पूरा कर लगना चाहिए।
जो पंजीकृत किंतु अमान्यताप्राप्त दल निर्धारित दिशा निर्देशों के अनुसार चुनाव नहीं लड़ते, उन्हें ‘सूची से हटाने’ के लिए चुनाव आयोग एक स्वचालित प्रक्रिया विकसित करे, और केंद्रीय डिजिटल पोर्टल बनाए, जिस पर सभी पंजीकृत दल अपना-अपना वित्तीय डेटा अपलोड कर सकें।
केंद्रीय चुनाव आयोग को अपनी ऊर्जा असली मतदाताओं को मतदाता सूची से निकाल बाहर कर ‘शुद्धीकरण’ करने के बजाय चुनावी माहौल ‘साफ़-सुथरा’ बनाने में लगानी चाहिए। तब तक, ‘हम भारत के लोग’ नेपाल की सुरंगों में फंसे लोगों की तरह ‘हुनुहुंचा’ (हम यहां हैं) चीखते रह जाएंगे।
लेखक पूर्व केंद्रीय चुनाव आयुक्त हैं।

