तिरछी नज़र

फॉग में कवि, स्मॉग में कविता

फॉग में कवि, स्मॉग में कविता

सौरभ जैन

सौरभ जैन

जब से उन्होंने मंचीय दुनिया में कदम रखा है तब से संता-बंता के चुटकुले भी उनकी कविता से पीछे रहने लगे हैं। कविता सुनाने से पहले मंच की परिस्थिति, मुख्य अतिथि की स्थिति, आयोजक व प्रायोजक की भावनाओं का वे पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन इतने बड़े मुद्दे पर उनका मौन रहना उनके भाग्य पर प्रश्न खड़े कर रहा था। हे! ख्याति प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय कवि इस मुद्दे पर तुम मौन क्यों हो? मुद्दे के समर्थन में हो या विरोध में? चाहे जो भी हो, शब्दों की खामोशी को तोड़ दो, कविता न सही ऐसे सामान्य ही बोल दो! कवितामयी अंदाज में हमने उनसे पूछ लिया। उनका जवाब था-कौन सा मुद्दा? जिस मुद्दे को न्यायालय ने राष्ट्रीय मुद्दे की संज्ञा दी हो, इनके लिए वह मोहल्ले की टपरी पर चर्चा तक का विषय भी न था।

कड़कड़ाती सर्दी में सड़कों पर ठिठुर लोग रहे हैं और स्याही कलम की जम गई है। एक ओर आवाज उठ रही है तो दूसरी ओर विचारों में बर्फ की परतें चढ़ चुकी हैं। किसान और कवि दोनों के ही कान पर टोपा तो है, लेकिन कवियों ने आंखों पर ढक्कन भी लगा लिए हैं। ठंड में कवि ‘फॉग’ में नजर नहीं आ रहे और कविता ‘स्मॉग’ से प्रदूषित हो चुकी है। न्याय देवी की मूर्ति की आंखों पर बंधी पट्टी अब कवियों की आंखों की शोभा बढ़ा रही है। अजी! अमुक देश के कतिपय कवियों ने तो रोटी खाना ही छोड़ दिया है। राग दरबारी की धुन गुनगुनाते हुए पाचन शक्ति नोटों को पचाने में सफल जो हुई है।

लॉकडाउन की दर्दभरी मंदी के बाद स्टार्ट ‘कवि बाजार’ में वे आयोजक व प्रायोजक को जरा भी निराश नहीं करना चाहते। मंच की मांग तो ‘किसानों की वेदना’ की है मगर पूर्ति ‘किसानी के स्वर्ण युग’ की हो रही है। उन्होंने तो किसानों के दर्द पर कविता लिखने के लिए कलम भी उठाई कि ‘सरकारी’ कवि सम्मेलन के लिए उन्हें सूत्रधार का फोन आ गया। फिर कलम मेज पर आराम करने लगी और कवि कुर्ता प्रेस करने भिड़ गया। उन्होंने पुरस्कार के लिए प्रविष्टि भी भेजी है। उनका स्टैंड जानने के लिए पुरस्कार की घोषणा तक इंतजार करना होगा। पुरस्कार मिला तो कवि किसानों के खिलाफ और न मिला तो किसानों के साथ खड़ा दिखेगा। कवि सच लिखेगा या कवि सच को छिपाने के लिए लिखेगा, इन दोनों ही बातों में कविता उलझी पड़ी है।

मोबाइल नम्बर पोर्टेबिलिटी से जैसे सिम पोर्ट हो जाती है, नम्बर वही कम्पनी नयी। वैसे ही मंच पर लिफाफे के वजन से कवि की अंतरात्मा भी पोर्ट होने लगी है, कवि वही, विचारधारा नयी। हाइड्रोजन के दो अणु में ऑक्सीजन का एक अणु मिलाने से सिर्फ पानी ही बनता है मगर कवि मंचों पर कविता में ‘भक्ति’ रस मिलाने से वजनदार लिफाफा बन रहा है। कवि खामख्वाह ही पार्टी प्रवक्ताओं का भविष्य बर्बाद करने पर तुले हैं। अब रायता समेटने की जिम्मेदारी न्यूज एंकरों की ही नहीं है बल्कि इसमें कवियों की भागीदारी भी जुड़ चुकी है।

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