संवैधानिक वैधता

उपासना स्थल कानून और मथुरा-काशी

उपासना स्थल कानून और मथुरा-काशी

अनूप भटनागर

अनूप भटनागर

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि विवाद में उच्चतम न्यायालय का फैसला आने के बाद से ही मथुरा और काशी की सुगबुगाहट शुरू है। मथुरा और काशी में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और बाबा विश्वनाथ के साथ स्थित दूसरे धार्मिक स्थलों को हटाने के लिए अदालत में मामला ले जाने की घटना इसका संकेत दे रही है।

हालांकि, मथुरा और काशी के धर्म ्थलों को लेकर अदालतों में मुकदमे दायर किये जा चुके हैं। सभी पक्ष अपने-अपने हिसाब से तथ्य, साक्ष्य और दलीलों की तैयारियां कर रहे हैं, लेकिन हमें 1991 के उपासना स्थल (विशेष उपबंध) कानून के बारे में श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में नवंबर, 2019 के 1,045 पेज के फैसले में उच्चतम न्यायालय की दो टिप्पणियों को ध्यान में रखना चाहिए।

पहली यह कि इस कानून के तहत किसी भी धार्मिक स्थल की स्थिति में परिवर्तन निषेध है और सार्वजनिक धर्मस्थल का स्वरूप नहीं बदला जायेगा। दूसरा पहलू यह है कि अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी मिलने के दिन अर्थात‍् 15 अगस्त, 1947 की स्थिति के अनुसार प्रत्येक धार्मिक स्थल का स्वरूप बनाये रखने का सकारात्मक दायित्व लागू करना है।

लेकिन अचानक ही जून, 2020 में विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ नामक संगठन ने इस कानून की धारा 4 की संवैधानिक वैधता को उच्चतम न्यायालय में इस साल जून में चुनौती दे दी। यह मामला अभी शीर्ष अदालत में लंबित है।

उपासना स्थल कानून, 1991 की धारा 4 धार्मिक स्थलों से संबंधित वादों की विचारणीयता के बारे में है। इस धारा में स्पष्ट है कि किसी भी धार्मिक स्थल से संबंधित यदि कोई वाद, अपील या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी न्यायालय, न्यायाधिकरण या प्राधिकरण में लंबित है तो ऐसे सभी वाद, अपील और अन्य विधिक कार्यवाही को निरस्त माना जायेगा।

उपासना स्थल कानून के इसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ ने करीब 29 साल बाद शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। इस संगठन का दावा है कि यह प्रावधान आक्रमणकारियों द्वारा 15 अगस्त, 1947 से पहले हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों में किये गये अतिक्रमणों के खिलाफ राहत प्राप्त करने के अधिकार से उन्हें वंचित करता है।तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में उपासना स्थल (विशेष उपबंध) कानून, 1991 बना जो जुलाई, 1991 से लागू है। इस कानून के तहत धार्मिक स्थलों का परिवर्तन निषिद्ध है और ऐसे धार्मिक स्थल जैसे वे 15 अगस्त, 1947 को थे, उनको उसी रूप में संरक्षित करना है। हालांकि यह कानून लागू करते समय अयोध्या विवाद को इसके दायरे से बाहर रखा गया था। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में वाराणसी की जिला जज की अदालत में मामला लंबित है। यहां अदालत को यह निर्णय करना है कि यह मामला दीवानी अदालत में लगेगा या फिर वक्फ ट्रिब्यूनल, लखनऊ में। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने पहले ही अदालत में दीवानी अदालत को चुनौती देने वाली याचिका दायर कर रखी है।

बताते हैं कि काशी विश्वनाथ विवाद भी काफी पुराना है लेकिन मौजूदा मुकदमा 1991 में शुरू हुआ था। यह मामला 1936 में भी अदालत में गया था लेकिन उस समय हिन्दू पक्ष नहीं था बल्कि मुस्लिम पक्ष ने वाद दायर कर वाराणसी की जिला अदालत से अनुरोध किया था कि पूरा ज्ञानवापी परिसर मस्जिद घोषित किया जाये, लेकिन 1937 में अदालत ने दीन मोहम्मद के इस दावे को खारिज कर दिया था लेकिन विवादित स्थल पर नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी गयी थी। दूसरी ओर, मथुरा की अदालत में श्रीकृष्ण विराजमान, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और उनके आधा दर्जन भक्तों की ओर से दायर वाद 30 सितंबर को अपर जिला जज छाया शर्मा ने खारिज कर दिया। इसके बाद, इस फैसले को अब ऊपरी अदालत में चुनौती दी गयी है। मथुरा की जिला न्यायाधीश साधना रानी ठाकुर ने भगवान श्रीकृष्ण विराजमान और स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि की अपील 16 अक्तूबर को विचारार्थ स्वीकार कर ली। इस अपील में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर शाही ईदगाह मस्जिद निर्मित होने के आधार पर इसे हटाने के लिये दायर वाद खारिज करने के अदालत के फैसले को चुनौती दी गयी है। अपील में दावा किया गया है कि 13.37 एकड़ की सारी भूमि भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की है। बहरहाल, जिला न्यायाधीश ने शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट, उ.प्र. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य को नोटिस जारी किये हैं।

अपीलतकर्ताओं का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण के अनुयायी होने के कारण उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के आलोक में वाद दायर करने का अधिकार है। इनका यह भी तर्क है कि इस जमीन को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान नाम से बनी एक सोसायटी ने एक समझौते के तहत हिन्दू देवता की संपत्ति ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह को सौंपी थी जबकि वह इसकी स्वामी नहीं थी।

अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह उ.प्र. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के प्रबंधन को इस भूमि का अतिक्रमण करके उस पर किया गया निर्माण हटाने का निर्देश दे।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कानून की धारा तीन का उल्लंघन करने की स्थिति में कानून की धारा छह में दोषी व्यक्ति के लिए तीन साल की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है। बेहतर होगा कि हम यह सुनिश्चित करें कि अब 6 दिसंबर, 1992 की पुनरावृत्ति नहीं हो और देश में सांप्रदायिक सद‍्भाव बनाये रखा जाये।

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