दरअसल, मौजूदा उमस भरी गर्मी एक चेतावनी है। जब हवा का तापमान कुछ और कहे और इंसान की त्वचा कुछ और महसूस करे, तो सार्वजनिक नीतियों को इंसान की त्वचा का साथ देना होगा। साधारण थर्मामीटर पर निर्भरता के बजाय हीट इंडेक्स आधारित नीतिगत व प्रशासनिक ढांचा तैयार करना जरूरी है।
मानसून के आगमन से पहले के दिनों में कदम बाहर निकालते ही हवा दमघोंटू महसूस होने लगती है। हवा सिर्फ गर्म नहीं है; इसमें एक ऐसा भारीपन, सघनता और ठहराव है मानो वायुमंडल का वजन बढ़ गया हो और हमारी त्वचा को दबा रहा हो। दोपहर होते-होते, सामान्य वेदर ऐप हवा का तापमान 39 या 40 डिग्री सेल्सियस दिखा सकता है, जो देखने में शायद सहनीय लगे। लेकिन शरीर को यह तापमान 49-50 डिग्री सेल्सियस के समान महसूस होता है। यह कोई वहम नहीं; ‘हीट इंडेक्स’ की वह डरावनी वास्तविक तस्वीर है जो साबित करती है कि हमारे पारंपरिक मौसम वैज्ञानिक पैमाने इंसानी शरीर के जलवायु संकट को मापने में बुनियादी रूप से विफल हो रहे हैं।
दशकों से, भारत में सार्वजनिक प्रशासन और आपातकालीन हीट प्रोटोकॉल केवल एक ही आंकड़े से संचालित हो रहे हैं: एक साधारण थर्मामीटर पर आंका जाने वाला ‘ड्राई-बल्ब’ तापमान। यदि राजस्थान के सूखे मैदानी इलाकों में पारा 45 डिग्री से. छू जाता है, तो उसे आधिकारिक तौर पर ‘लू’ (हीटवेव) घोषित कर दिया जाता है। लेकिन मौजूदा उमस भरी गर्मी कहीं अधिक कपटपूर्ण थर्मोडायनामिक सिद्धांत पर काम कर रही है।
मानसून की देरी के कारण दक्षिण-पश्चिमी हवाएं आती हैं, तो ह्यूमिडिटी 60-70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीने का वाष्पीकरण करता है। त्वचा से पसीना वाष्पीकृत होता है जो अपने साथ शरीर की आंतरिक ऊष्मा को बाहर ले जाता है। बहरहाल, जब आसपास की हवा पहले से ही नमी से पूरी तरह संतृप्त हो—एक भीगे हुए स्पंज की तरह—तो वाष्पीकरण की यह प्रक्रिया ठप हो जाती है। शरीर का आंतरिक अनुकूलन तंत्र काम करना बंद कर देता है, और उसका तापमान घातक सीमाओं की ओर बढ़ने लगता है। यह स्थिति हमें ‘वेट-बल्ब तापमान’ की चरम सीमा के खतरनाक रूप से करीब ले आती है जो कि मानव शरीर द्वारा झेली जा सकने वाली संयुक्त गर्मी और आर्द्रता की अंतिम सीमा है। अमेरिका के ‘पेंसिल्वेनिया स्टेट हीट प्रोजेक्ट’ के हालिया चिकित्सा अनुसंधान के मुताबिक, मानव शरीर मात्र 31 डिग्री सेल्सियस के वेट-बल्ब स्तर पर ही अपने आंतरिक तापमान पर नियंत्रण खोना शुरू कर देता है।
इस उमस भरे प्रहार का सबसे बड़ा खतरा है कि यह हमारी वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिए संरचनात्मक रूप से अदृश्य बना रहता है। जून के अंत और अब जुलाई के शुरू में महानगरों में ‘हीट इंडेक्स’ 51 से 53 डिग्री पार कर गया। ड्राई-बल्ब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, तो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) कठोर नियामक मानदंडों के कारण अक्सर आधिकारिक तौर पर हीटवेव की घोषणा नहीं कर सका। इससे श्रमिकों की परेशानी की अनदेखी हुई। ‘लू’ घोषित नहीं होती, इसलिए श्रम प्रवर्तन एजेंसियां निर्माण श्रमिकों, डिलीवरी ब्वॉयज और कृषि मजदूरों के लिए दोपहर के विश्राम की अवधि निर्धारित नहीं करतीं। इन कामकाजी लोगों को 50 डिग्री की दहकती भट्ठी जैसी स्थिति में खटना पड़ता है। वहीं ‘हीटस्ट्रोक’ के मामलों में स्वास्थ्य प्रणालियां अक्सर उमस के दौर में हताहतों की संख्या कम आंकती हैं।
यदि भारत को ऐसे युग में जीवित रहना है जहां ‘महसूस होने वाला’ तापमान नियमित रूप से 50 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को छू रहा हो, तो हमारी जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को क्रांतिकारी बदलाव से गुजरना होगा। आईएमडी और राज्य आपदा प्रबंधन अधिकारियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनियों, स्कूलों की छुट्टियों और श्रम नियमों के निर्धारण के कानूनी पैमाने के रूप में ड्राई-बल्ब थर्मामीटर को हटाकर आधिकारिक तौर पर ‘कंपोजिट हीट रिस्क इंडेक्स’ (संयुक्त ऊष्मा जोखिम सूचकांक) को लागू करना चाहिए। 65 फीसदी आर्द्रता वाले 40 डिग्री सेल्सियस के दिन को भी प्रशासनिक रूप से उतनी ही गंभीरता मिले, जितनी 47 डिग्री सेल्सियस वाले शुष्क दोपहर को।
इस दमघोंटू गर्मी के प्रति आम उपभोक्ताओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया अधिक से अधिक निजी हाई-पावर सप्लिट एसी खरीदने की होती है। लाखों निजी एसी बेहद गर्म हवा सीधे तंग सड़कों पर छोड़ते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव गहरा हो जाता है। यह शहरी गरीबों के लिए सार्वजनिक रास्तों को ‘थर्मल डेथ ट्रैप’ बना देता है जो एसी नहीं खरीद सकते। भारत को इसके वैश्विक संरचनात्मक विकल्पों की ओर देखना चाहिए, जैसे फ्रांस का भूमिगत ‘क्लाइमस्पेस’ नेटवर्क या गुजरात के ‘गिफ्ट सिटी’ में हमारा अपना स्वदेशी मॉडल। हमें कूलिंग को एक सेंट्रलाइज्ड पब्लिक यूटिलिटी के रूप में अपनाना होगा—यानी ऐसे ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम’ जो इंसुलेटेड पाइपों के जरिए ठंडे पानी को पूरे वाणिज्यिक और आवासीय क्षेत्रों में घुमाकर ठंडा रख सकें।
भवन नियमों को शीशे और कंक्रीट के उन ढांचों से दूर हटना होगा जो विशाल ग्रीनहाउस जाल की तरह काम करते हैं। ‘ऊर्जा संरक्षण भवन कोड’ लागू कर इमारतों में प्रकाश परावर्तित करने वाली ठंडी छतें, क्रॉस-वेंटिलेशन के रास्ते और खोखली इंसुलेटेड ईंटों का उपयोग अनिवार्य किया जाए। यह अंदरूनी तापमान को 5 डिग्री तक कम कर सकता है, जिससे रहने के लिए एसी पर निर्भरता कम हो जाएगी।
जलवायु परिवर्तन हमारे जीवन को सीधे नहीं, बल्कि विभिन्न कारकों को आपस में मिलाकर तेजी से प्रभावित कर रहा है। जब हवा का तापमान कुछ और कहे और इंसान की त्वचा कुछ और महसूस करे, तो हमारी सार्वजनिक नीतियों को हमेशा इंसान की त्वचा का साथ देना होगा। यह समय साधारण थर्मामीटर को विदा करने और एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा तैयार करने का है जो हवा के इस भारी और वास्तविक संकट का दृढ़ता से मुकाबला कर सके।
लेखक पंजाब विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।
