Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

संगठित आतंकवाद वैश्विक शांति के लिए खतरा

आतंक का संगठित कारोबार

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

आतंकवाद का मुखर समर्थन करने वाले देशों के पीछे बड़ी ताकतें रहती हैं, जो उन्हें आर्थिक सहायता और हथियारों की आपूर्ति कर उनकी पीठ थपथपाती हैं।

दुनिया में आतंकवाद अब कोई स्थानीय समस्या नहीं रहा। इसका नियंत्रण भी प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानीय दृष्टिकोण से नहीं हो सकता। आतंकवाद विश्व स्तर पर एक संगठित धंधा बन चुका है। अलग-अलग देशों—चाहे फ़लस्तीन हो या पाकिस्तान—में आतंकवाद का पोषण खुलेआम होता है। फ़लस्तीन में हमास की गतिविधियां और पाकिस्तान में आतंकवादियों के पोषण के अड्डे किसी से छिपे नहीं हैं। आतंकवाद का पोषण भी एक संगठित तरीके से विभिन्न देशों द्वारा किया जाता है, लेकिन जब इस मानवता-विरोधी कारगुज़ारी पर सवाल उठाए जाते हैं, तो वे बड़ी मासूमियत से अपनी संलिप्तता से इनकार कर देते हैं।

भारत के विरुद्ध आतंकवाद का निरंतर पोषण करते हुए भी पाकिस्तान कभी इस बात को स्वीकार नहीं करता, बल्कि स्वयं को आतंकवाद से पीड़ित बताता रहता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की चाल भी निराली है। पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान को आतंकवाद का शिकार देश बताते हुए उसे आतंक के मुकाबले में अग्रणी करार दे दिया था। आतंकवादी पाकिस्तान में पनाह लिए रहते हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूचियों में दुर्दांत आतंकवादियों के नाम गायब हो जाते हैं। आतंकवाद का मुखर समर्थन करने वाले इन देशों के पीछे बड़ी ताकतें रहती हैं, जो उन्हें आर्थिक सहायता और हथियारों की आपूर्ति कर पीठ थपथपाती हैं।

Advertisement

दुनिया भर में आतंकवाद एक संगठित कारोबार के रूप में फैलता जा रहा है। यदि पाकिस्तान के आतंकवाद पर अप्रत्यक्ष रूप से चीन की सहमति है, तो फ़लस्तीन के हमास आतंकियों के पीछे कुछ इस्लामिक देश हैं। लेकिन जो सच है, उसे नज़रअंदाज़ कर आतंक-पोषक देश अपनी मासूमियत जताते हैंैं। वास्तव में आतंकवाद की शिकार वह साधारण जनता है, जिसके जान-माल और रोज़ी-रोटी पर आतंकियों का कुठाराघात होता है।

Advertisement

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद के सामने नाटकीय ढंग से आतंकवाद का पोषक होने से इनकार किया। उसने कहा कि केवल सरकारी नीति के अनुसार ही देश में व्यवस्था चलाई जाती है और उसी के तहत शत्रु का मुकाबला किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर भी झूठा ब्योरा प्रस्तुत किया और पहलगाम की निर्मम घटना के दोष से स्वयं को बरी कर लिया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के सुरक्षा प्रतिनिधि ने खरी-खरी सुनाते हुए ऑपरेशन सिंदूर पर झूठा ब्योरा पेश करने को लेकर पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई। भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने ज़ोर देकर कहा कि इस्लामाबाद आतंकवाद को सामान्य घटना के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संयुक्त राष्ट्र के इस सदन में पाकिस्तान आतंकवाद को वैध ठहराने की अपनी ओछी हरकत नहीं कर सकता।

पहलगाम में अप्रैल, 2025 में पाकिस्तानी आतंकियों ने जघन्य हमला कर निर्दोष नागरिकों की हत्या की थी। इस आतंकी घटना के जवाब में और पाकिस्तानी आतंकी अड्डों को नष्ट करने के उद्देश्य से भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। भारत ने पाकिस्तान के भीतर जाकर आतंकवादी अड्डों को ध्वस्त किया और पाकिस्तान-अधिकृत क्षेत्रों में भी आतंकी ढांचों को नष्ट किया। इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। वह फिर से आतंकी अड्डों को पुनर्जीवित कर आतंकवाद के पोषण में जुटा हुआ है।

आज संयुक्त राष्ट्र संघ भी अपनी प्रासंगिकता खोता हुआ प्रतीत हो रहा है। वह कहीं भी शांति सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं दिखता। उसके निंदा प्रस्तावों का आतंकियों या उन्हें संरक्षण देने वाले देशों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही देश संयुक्त राष्ट्र के मंच पर आकर स्वयं को आतंकवाद से पीड़ित मासूम राष्ट्र बताते हैं। भारतीय प्रतिनिधि ने स्पष्ट कहा कि संयुक्त राष्ट्र केवल बजट की चिंता तक सीमित न रहे, बल्कि संघर्षों से निपटने में अपनी जड़ता और प्रभावहीनता को समाप्त करे। इसी कारण आतंकवादी सिर उठा रहे हैं और अपने षड्यंत्रकारी, आक्रामक रवैये से विश्व को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं।

आतंकवाद अब स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और मानवीय मूल्यों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। यह धीरे-धीरे एक संगठित और व्यावसायिक स्वरूप ले रहा हैै। इस प्रकार आतंकवाद एक घातक वैश्विक बाजार में बदलता जा रहा है, जो विकास के बजाय मृत्यु का संदेश देता है। ऐसे में इससे निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को अपनी भूमिका और दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। सुरक्षा परिषद को वीटो-आधारित यंत्रचालित ढांचे से बाहर निकलकर पारदर्शिता, सत्य और न्याय पर आधारित प्रभावी मंच बनना चाहिए।

लेखक साहित्यकार हैं।

Advertisement
×