कोचिंग संस्थान अपना इतिहास बना रहे हैं, किंतु विद्यार्थी का भूगोल खराब हो रहा है और उनका साहित्य भी बिगड़ रहा है।
शहर में कोचिंग संस्थानों की भरमार है। अखबारों में यह पूरे-पूरे पृष्ठ को घेरे रहते हैं। खबरों को भी खा जाते हैं। जमीन से आसमान तक कोचिंग ही कोचिंग है। कवि घनानंद आज होते तो उनकी नायिका अपने नायक कृष्ण से पूछ बैठती, तुम कौन से कोचिंग पढ़े हो लला, मन देहु पर लेहू छटांक नहीं।
कोचिंग संस्थान छिपे हुए विद्यार्थी को भी ढूंढ़ लेता है। फिर वह भी भर्ती होने को मचलने लगता है। उसे लगता है कि कोचिंग के बिना कोई भविष्य है ही नहीं। जो कोचिंग नहीं जा पाते वे अफसोस मनाते हैं। एक कोचिंग के विज्ञापन को पढ़ने के बाद विद्यार्थी का भावुक मन यही कहता है चलो यहीं भर्ती हो जाएं। फिर दूसरे को पढ़कर दूसरे में भर्ती होने का मन करता है। कोचिंग इसी तरह विज्ञापनों से विद्यार्थी मन को बदलते रहते हैं। एक मन है, हजार कोचिंग हैं। वह कहां कहां भर्ती होए।
विद्यार्थी को पता नहीं होता है कि भविष्य में उसे तारे तोड़ने हैं या ताले तोड़ने हैं। क्योंकि तारे उससे कभी टूटेंगे नहीं। ताले तोड़ना उसके लिए आसान होगा। विद्यार्थी असमंजस में पड़ा-पड़ा सोचता रहता है, तारे तो बाद में भी तोड़ लेंगे अभी आसपास के ताले तोड़कर शुरुआत कर लेते हैं। कोचिंग सेंटर अपने-अपने तरीके से तारे तोड़ना सिखाता है, लेकिन विद्यार्थी सीखता केवल ताले तोड़ना है। चैन तोड़ना सीख लेता है। तारों को देखकर उसे तोड़ने का भाव कहां से आ गया? तारों को सहेजने, सराहने का भाव क्यों नहीं आया?
वे आसमान छूने की बात भी करते हैं। आसमान तो सिर्फ दिखता है। उसे छूने का विचार ही गलत है। जो भी आता है आसमान छूने की बात कहकर भ्रमित कर देता है। विद्यार्थी आसमान छूने के चक्कर में छत भी नहीं छू पाता है, और अंत में छत के पंखे को छूने के लिए फंदा लटका लेता है।
वक्त का फेर है कि विद्यालयों का कार्य भी कोचिंग करने लगे हैं। विद्यालय खाली हैं, कोचिंग ठसाठस हैं। उज्ज्वल भविष्य विद्यालयों से कोचिंगों में स्थानांतरित हो गया है। विद्यालयों में जो भविष्य बचा है उसे उज्ज्वल माना ही नहीं जा रहा है। तीव्र बुद्धि, सटीक समझ, अव्वल होशियारी वाले बच्चे कोचिंगों में कुनमुना रहे हैं। उनका विवेक तो प्रखर है किन्तु भाव शून्य है। चतुराई चरम पर है परंतु दृष्टि समाज शून्य है। यह शून्यता उज्ज्वल भविष्य का वर्तमान है। भाव शून्यता वाले उज्ज्वल भविष्य को गढ़ने में धन का अपव्यय करते हुए अभिभावकों में कितनी प्रसन्नता झलक रही है? वे खुश हैं कि कर्ज लेकर अपनी संतान का भविष्य तैयार करने का फर्ज निभा रहे हैं।
कोचिंग संस्थान अपना इतिहास बना रहे हैं, किंतु विद्यार्थी का भूगोल खराब हो रहा है और उनका साहित्य भी बिगड़ रहा है। इस पर भी विचार कीजिए।

