कार्यालय की कार्य-संस्कृति में अफसरी की कसक

कार्यालय की कार्य-संस्कृति में अफसरी की कसक

गुरबचन जगत

स्टाफ ऑफिसर या दफ्तर में बैठकर काम करने वाले अफसर की श्रेणियां ब्रिटिश सेना के स्रोत के मुताबिक कुछ यूं हैं एक, वह जो उच्च कमान में काम करने लायक हो; बुद्धिमान और सख्त मेहनती हो–ऐसा व्यक्ति आदर्श दफ्तरी अफसर होता है और एक वह जो कुछ-कुछ सुस्त किंतु कर्मठ हो–परंतु ऐसा अफसर संगठन के लिए खतरा होता है। तथापि जरूरी नहीं यह परिभाषा भी एकदम सटीक बैठती हो, क्योंकि अफसर या खुद में सुधार लाते रहते हैं या फिर अपने खोल में घुसे रह सकते हैं।

पुलिस सचिवालय में मेरे कार्यकाल दो अवधियों वाले हैं, एक अल्पकालीन, जो वर्ष 1977-78 में था, तो वहीं साल 1982-97 के दौरान बीच-बीच में मेरी नियुक्ति अधिक अपेक्षाकृत ज्यादा समय वाली थीं (इस अंतराल में पंजाब पुलिस आवास निगम का पहला प्रबंध निदेशक भी रहा था)। पुलिस सचिवालय में जब मेरा कार्यकाल लंबा चला था तो सीआईडी और प्रशासनिक विभाग में अलग-अलग जिम्मेवारियां सौंपी गईं। एक मौका ऐसा भी था जब मैंने पुलिस विभाग के मुखिया और सीआईडी विभागाध्यक्ष, दोनों के लिए, ठीक एक ही समय काम किया था, जिससे कई बार विकट स्थिति पैदा हो जाती थी।

ऐसा ही एक वाकया है वर्ष 1977 में सरकार बदल गई थी। हमें नए पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) और सीआईडी विभाग को नए उप-महानिरीक्षक (डीआईजी) मिले (उन दिनों पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीशनल डीजीपी) का पद नहीं हुआ करता था)। जिन्हें सीआईडी का उप-महानिरीक्षक बनाया गया था, मूलतः वे फील्ड में काम करने के आदी थे। उन्हें मेज-कुर्सी वाला काम जरा नहीं भाता था। उन्होंने नई जिम्मेवारी से नाखुशी को जगजाहिर किया भी था, परंतु महानिरीक्षक की सलाह पर मुख्यमंत्री ने ठान रखी थी कि उन्हें ही इस पद पर बैठाना है। शायद महानिरीक्षक नहीं चाहते थे कि विभाग में कोई अन्य ऐसा हो जो समांतर शक्ति केंद्र बन जाए। महानिरीक्षक-सीआईडी पद पर आसीन अफसर की एक अलग शक्ति-केंद्र बनने की संभावना रहती है। मुख्यमंत्री रोजाना उससे निजी मुलाकात में राज्य की तमाम गुप्त जानकारियां लेते हैं।

उन दिनों मैं सीआईडी के उपमहानिरीक्षक के लिए स्टाफ ऑफिसर की भूमिका निभाया करता था। हालांकि, कागजों में मेरा पदभार कुछ और ही था। मैंने इससे पहले उक्त महाशय के साथ कभी काम नहीं किया था। अपने विभागाध्यक्ष के साथ सफल साझेदारी बनाने को उसकी निजी आदतें और कामकाज के तरीके का पता होना जरूरी होता है। मेरे पिछले विभागाध्यक्ष अपनी तरह के विलक्षण अफसर थे। उनके साथ काम करके नित नया सीखने को मिलता था। खैर, पिछले साहिब ने मुझे कहा था कि हर सुबह सबसे पहले वह फाइलें प्रस्तुत किया करूं जिन्हें तरजीह देने की जरूरत हो और रोजमर्रा वाली फाइलें अलग रख दिया करूं। मैंने नए साहब के लिए भी ठीक वैसा किया, उन्होंने मेरी ओर देखा और सबको एकसाथ मेज पर रखकर वापस जाने को कहा। अगली कुछ मर्तबा मैंने अपने सामने अतिआवश्यक फाइलें पहले निपटवाने का प्रयास किया। लेकिन असफल रहा, इसके बाद मैंने यह करना बंद कर दिया और अति-जरूरी फाइलें उनके पास भिजवाने लगा, परंतु वे जल्द लौटकर मेरे पास नहीं आती थीं। इसको लेकर मैंने एक पुराने साथी अफसर से बात की जो उनके साथ पहले काम कर चुका था, उसने पूछा कि जब फाइलें लेकर कमरे में जाते हो तो वे उस वक्त क्या कर रहे होते हैं? मैंने कहा कुछ नहीं। इस पर उसने मुझे सलाह दी कि चूंकि उपमहानिरीक्षक उनमें नहीं है जो सुबह-सुबह काम में जुट जाएं, इसलिए मैं फाइलें लेकर दोपहर में जाया करूं, तब वे तुरंत देखकर निपटा देंगे। उनकी दी यह सलाह काम कर गई। संबंध सहज होते ही उन्हें याद दिलवाया कि पदभार संभालने के बाद उन्होंने एक बार भी मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं की है, जबकि उन्हें प्रतिदिन व्यक्तिगत रूप में जानकारी देनी बनती है। उलटे मुझसे कहा यह काम मैं कर दिया करूं, परंतु मैंने नम्रतापूर्वक मना कर दिया। इस पर उन्होंने चंडीगढ़ सीआईडी इकाई के डीएसपी को तलब किया और उसे रोजाना मुख्यमंत्री को जानकारी उपलब्ध करवाने की जिम्मेवारी सौंप दी। आश्चर्य मुख्यमंत्री ने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लिया!

चूंकि उपमहानिरीक्षक और महानिरीक्षक के बीच संवाद बहुत कम था लिहाजा मध्यस्थ की भूमिका मेरे ऊपर थी। सीआईडी विभाग राज्य की अपराध-स्थिति पर अपनी समीक्षा सरकार को प्रस्तुत करती है। इसके लिए पहले सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक महीनावार अपराध पुस्तिका में सभी आंकड़े एक खास कामकाजी प्रारूप में दर्ज कर इकट्ठा करते हैं। इस पुस्तिका को आकलन उपरांत सीआईडी उपमहानिरीक्षक के सामने रखा जाता है। जब नए साहिब के सामने ऐसी पहली पुस्तिका पेश की गई तो उन्होंने मुझसे दरियाफ्त की कि मैंने इसे उन्हें क्यूं भेजा है? मैंने बताया कि महानिरीक्षक और सरकार के सामने पेश किए जाने से पहले इस पर उनकी विवेचना की जरूरत है। उन्होंने मुझे निर्देश दिया कि मैं इसे वापस ले जाऊं और एक अलग कागज पर अपनी ओर से टिप्पणी लिखकर लाऊं, जिसको देखने के बाद वे अपनी सहमति देंगे। उन्होंने आगे मुझे यह भी कहा अपराधों की संगीनता को कमतर करके न दिखाया जाए और विश्लेषण का सुर आलोचनात्मक रहे। इस पर मुझे खासा दिमाग खपाना पड़ा और जितना कर सकता था उतनी बेबाक और तीखी समीक्षा कर डाली और उनके पास भिजवा दी, उन्होंने भी उक्त टिप्पणी को फाइल पर हू-ब-हू उतार दिया!

चंद घंटों बाद महानिरीक्षक साहिब ने अपने सामने पेश होने के लिए बुलवा भेजा। वे अपनी कुर्सी से उठे और फाइल फेंकते हुए बोले कि सीआईडी विभाग में क्या बकवास पक रहा है? मुझे बेकसूर पाकर उन्होंने आखिर में मुझे बैठने को कहा और उपमहानिरीक्षक महोदय की समीक्षा को पंक्ति-दर-पंक्ति पढ़कर सुनाया (जो वास्तव में मेरी लिखी हुई थी!), महानिरीक्षक साहिब का पारा सातवें आसमान पर था लेकिन मैं लगातार चुप्पी साधे रहा। फिर उन्होंने मुझे फाइल वापस ले जाकर इस बार उनकी तरफ से टिप्पणी दर्ज करने को कहा, जिसमें उपमहानिरीक्षक के लिखे का बिंदुवार नकारने वाला जवाब हो। मैंने उनके कमरे से फौरी रवानगी डाली लेकिन बाहर आने पर समझ न आए कि अब हंसू कि रोऊं! बिना शक मैंने जितना बेहतर बन पड़ा उतना शब्दजाल बुना ताकि महानिरीक्षक की तसल्ली बन सके। मेरी टिप्पणी उन्हें जंच गई और महानिरीक्षक महोदय ने भी इसे फाइल पर दर्ज वैसे का वैसा लिखकर आगे सरकार को भेज दिया। सौभाग्यवश ऊपर से कोई जवाबतलबी नहीं हुई, लेकिन आईंदा मैं उन शब्दों को लेकर सावधान रहा जो मैंने पहली वाली टिप्पणी में लिखे थे!

परंतु उप-महानिरीक्षक एक सहृदय इंसान थे। फिर हम दोनों के बीच संबंध मधुर रहे। तथापि वे खुद को सचिवालय रूपी पिंजरे में कैद शेर की मानिंद देखते थे। कुर्सी से चिपककर फाइलें निपटाने का नीरस काम सौंप दिया गया है। एक सुबह उन्होंने मुझे बुलाया और खुशी उनके चेहरे पर झलक रही थी, उनकी बदली पटियाला में बतौर उपमहानिरीक्षक-रेंज हो गई थी। फील्ड में काम करना सदा उनका पहला प्यार रहा था।

मैंने लेख की शुरुआत जिस परिभाषा से की थी यानी एक बुद्धिमान और सख्त मेहनती अफसर दफ्तरी काम के लिए बना है, भले ही राजनीति कुछ भी हो। तो मैंने बतौर उक्त किस्म वाला कर्मी एक लंबे समय तक दफ्तर में बैठकर काम किया है, लेकिन भाग्य ने मुझे दो प्रमुख बलों– जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीमा सुरक्षा बल का मुखिया होने का मौका दिया, हालांकि मुझे नहीं मालूम कि क्या मैं सुस्त किंतु कर्मठ श्रेणी से हूं या बुद्धिमान और सख्त मेहनती वाले वर्ग से? इसका जवाब शायद मेरे उक्त दोनों बड़े अफसर साहिबान बेहतर दे पाएं!

लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष एवं मणिपुर के राज्यपाल रहे हैं।

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