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अब हुए घर बड़े और दिल छोटे

तिरछी नज़र

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घर छोटे थे, कमरे कम थे पर दिलों में जगह बहुत थी। एक खाट पर तीन पीढ़ियां समा जाती थीं और किसी को घुटन नहीं होती थी।

एक समय था जब लोग साथ के लिए मरा करते थे। और यह गाना तो गाना आम था- तेरा साथ है कितना प्यारा, कम लगता है जीवन सारा। अब किसी को साथ नहीं चाहिए। सब खोखले हो गये हैं। यानी एकांतप्रिय। किसी के पास साथ बैठने का समय ही नहीं है, सिर्फ चार्जिंग का समय बचा है।

क्या समय था कि बच्चों में मां के चूल्हे के पास बैठने की होड़ होती थी क्योंकि वहीं रोटियों की गर्मी के साथ अपनापन भी मिलता था। नानी के साथ सोने की लड़ाई होती थी क्योंकि उसकी कहानियों में नींद नहीं, सुरक्षा मिलती थी। घर में बुआ आ जाती तो बच्चे आपस में भिड़ जाते थे कि मैं इसके साथ सोऊंगा... नहीं मैं। उस झगड़े में ईर्ष्या नहीं होती थी, सिर्फ अपनत्व होता था।

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घर छोटे थे, कमरे कम थे पर दिलों में जगह बहुत थी। एक खाट पर तीन पीढ़ियां समा जाती थीं और किसी को घुटन नहीं होती थी। साथ होना मजबूरी नहीं, सौभाग्य समझा जाता था। समय ने भयानक करवट ली है। सबने दिलों की बैठक तोड़ दी। अब किसी को किसी का साथ नहीं चाहिए। हर कोई अपने-अपने खोल में सिमटा हुआ है। दरवाज़े बंद हैं, मोबाइल खुले हैं। कोई कमरे में आ न जाए, यह डर है। अब लड़ाई इस बात की होती है कि मुझे अकेला छोड़ दो। हमने निजता के नाम पर दूरी पाल ली और सुविधा के नाम पर संवेदना खो दी।

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कभी बच्चे मां की गोद में सुकून ढूंढ़ते थे। आज मां बच्चों के कमरे के बाहर खड़ी होकर दस्तक देती है- अंदर आ सकती हूं? कभी साथ मांगा जाता था, आज साथ सहन नहीं होता। शायद हमने विकास की दौड़ में एक सबसे कीमती चीज़ खो दी- एक-दूसरे के पास बैठ सकने और नसीहत सुनने का धैर्य।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब शाम ढलते ही सब अपने-अपने काम छोड़कर आंगन में इकट्ठा हो जाते थे। बातें बड़ी नहीं होती थीं पर बातें बहुत होती थीं। कभी चुप्पी भी होती थी लेकिन वह बोझ नहीं बनती थी। वह चुप्पी भी साथ बैठकर ही निभाई जाती थी। जिस घर में साथ बैठने की आदत बची रहती है, वही घर सच में आबाद रहता है, बाकी सब सिर्फ पते होते हैं।

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एक बर की बात है अक नत्थू एक कागज पढ़ण म्ह बावला सा हो रह्या था। उसका ढब्बी सुरजा बोल्या- रै किस बैरण की चिट्ठी आगी? नत्थू शर्माता सा बोल्या- रामप्यारी की सै। सुरजे नै चिट्ठी कानीं झांक्या तो कागज कती कोरा था। वो झुंझलाता सा बोल्या- रै बावली बूच! इस म्हं तो एक अक्षर भी नीं लिख राख्या। नत्थू बोल्या- बात या है अक आजकाल म्हारी बोलचाल बंद हो री सै।

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