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लो अब आ ही गया नया स्वर्णिम काल

तिरछी नज़र

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सोना एकदम सोना हो गया है और चांदी एकदम चांदी हो गयी है। अब जिनके पास सोना है, उन्हें लगता है कि उनके छूते ही सब सोना हो जाएगा और चांदी वाले तो खैर चांदी कूट ही रहे हैं।

वैसे स्वर्णिम तो हमेशा अतीत काल ही रहता आया है जी! अतीत के स्वर्णिम होने के फायदे धर्म से लेकर राजनीति तक फैले हुए हैं। उधर अगर कथावाचक उससे चांदी कूटते हैं तो इधर नेता लोग अतीत को स्वर्णिम बताकर अपनी कुर्सी पक्की करते हैं। भविष्य के हिस्से तो हमेशा उज्जल रहने की कामना ही आती है बस, जबकि वर्तमान को नून, तेल, लकड़ी के फेर में ही खर्च होना होता है। लेकिन अच्छी बात यह हुई है जी कि अब सिर्फ अतीत ही स्वर्णिम नहीं रहा, वर्तमान भी स्वर्णिम हुआ जा रहा है और कामना की जा रही है कि भविष्य भी स्वर्णिम ही होगा।

ऐसे में भूख, गरीबी, बेकारी को अपने आसपास भी न फटकने दें। न उनका जिक्र करें और न ही उन्हें याद करें और जैसे भूत-प्रेत की छाया से बचने के लिए यज्ञ-हवन किए जाते हैं, वैसे ही भूख, गरीबी, बेकारी की छाया से बचने के लिए यज्ञ-हवन टाइप कुछ पूजा-पाठ करा लेना चाहिए। वैसे भी अब ट्रंप के लिए तो इसकी जरूरत बची नहीं, सो अब आहुति इनके लिए दीजिए। खैर जी, हुआ यह है कि सोने की जो चिड़िया अतीत में भी कहीं खो गयी थी, वह अचानक उड़कर हमारे वर्तमान में आ बैठी है और जमकर चहचहा रही है।

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सोना एकदम सोना हो गया है और चांदी एकदम चांदी हो गयी है। अब जिनके पास सोना है, उन्हें लगता है कि उनके छूते ही सब सोना हो जाएगा और चांदी वाले तो खैर चांदी कूट ही रहे हैं। वरना कल तक यह माना जाता था कि शेयर-सट्टा बाजार वाले ही चांदी कूट रहे हैं। या फिर यह माना जाता था कि रीयल एस्टेट वाले चांदी कूट रहे हैं। बिल्डरों की बन आयी थी और प्रॉपर्टी डीलर मालामाल हो रहे थे। जमीन पर खेती करने वाले किसान बेशक मिट्टी के साथ मिट्टी हो रहे थे, लेकिन रीयल एस्टेट के धंधे में जमीन सोना थी। फिर किसानों से चाहे उसे मिट्टी के मोल ही क्यों न खरीदा गया हो। शेयर-सट्टे का धंधा तो बेशक उतार-चढ़ावों से भरा हुआ था। फिर वह सभी की समझ में भी तो नहीं आता न। लेकिन रीयल एस्टेट का धंधा तो एकदम चकाचक था। यहां सिर्फ बिल्डरों और प्रॉपर्टी डीलरों के लिए माल नहीं था बल्कि दलालों, बाहुबलियों, पहलवानों, ठेकेदारों, बिचौलियों नेताओं, ठगों सबके लिए काफी माल था।

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लेकिन फिर सोने-चांदी की चमक के समक्ष सब कुछ फीका पड़ गया। शेयर-सट्टे का धंधा भी और रीयल एस्टेट- प्रापर्टी का धंधा भी। जिस सोने-चांदी की खरीद को पहले सिर्फ धनतेरस तथा दिवाली जैसे त्योहारों से जोड़कर देखा जाता था, उन्होंने अचानक अर्थव्यवस्था को ऐसे हिला डाला जैसे भूकंप में धरती हिल जाती है। अब हर कोई सोना-चांदी ही खरीदना चाहता है और बस चांदी कूटना चाहता है। नहीं?

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