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दलों-नेताओं का भविष्य भी बतायेगा नव वर्ष

दलों-नेताओं का भविष्य भी बतायेगा नव वर्ष

राजकुमार सिंह

चुनाव होते तो हैं, भावी सरकार चुनने के लिए, पर और भी बहुत कुछ तय कर जाते हैं। फिर वर्ष 2022 की तो शुरुआत ही नहीं, समापन भी कुछ महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनाव से होगा। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि नव वर्ष न सिर्फ राजनीतिक दलों की दिशा, बल्कि कुछ नेताओं का भविष्य भी बतायेगा। फरवरी-मार्च में संभावित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को वर्ष 2024 का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है तो इसके दो अहम कारण हैं : पहला, इन राज्यों में लोकसभा में सर्वाधिक 80 सांसद भेजनेवाला उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जिसने लगातार दो लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिलवाने में निर्णायक भूमिका निभायी है। दूसरा, इन राज्यों में पंजाब और उत्तराखंड भी शामिल हैं, जिनमें से पहले राज्य में कांग्रेस की सरकार है, तो दूसरे में वह भाजपा से सत्ता छीनने की प्रबल दावेदार है। बेशक उत्तर प्रदेश और गोवा में भी कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर निगाहें रहेंगी, लेकिन पंजाब और उत्तराखंड में प्रदर्शन उसकी दिशा भी तय करेगा। अपने ऐतिहासिक पराभव काल से गुजर रही देश की इस सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का फैसला भी इसी साल होना है। चुनावी परीक्षाओं में लगातार विफलता वाले दल का पुन: नेतृत्व संभालने से राहुल गांधी का न तो मनोबल ऊंचा होगा और न ही वरिष्ठ नेताओं में उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।

अगर बड़बोले नवजोत सिंह सिद्धू के समक्ष समर्पण करने और मुख्यमंत्री पद पर दलित कार्ड चलने के बाद भी कांग्रेस सीमावर्ती राज्य पंजाब में सत्ता बरकरार नहीं रख पाती है तो उससे हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भी उसकी संभावनाओं पर नकारात्मक असर ही पड़ेगा, जहां क्रमश: 2022 और 24 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। कुछ समय पहले तक पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-आप और अकाली-बसपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना जतायी जा रही थी। त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस का पलड़ा भी भारी माना जा रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री पद से कैप्टन अमरेंद्र सिंह की बेआबरू विदाई और फिर अंतत: तीन विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी के बाद समीकरण तेजी से बदले हैं। आलाकमान के व्यवहार से आहत अमरेंद्र सिंह ने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बागी नेताओं द्वारा सुखदेव सिंह ढींढसा के नेतृत्व में गठित अकाली दल (संयुक्त) के साथ गठबंधन कर चुनाव को चतुष्कोणीय बनाने का दांव चला है। बेशक बहुकोणीय चुनावी मुकाबले में हार-जीत का अंतर बहुत कम रह जायेगा, जिसका प्रभाव किसी एक दल तक सीमित नहीं रहेगा, लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि अनुभवी कप्तान की व्यूह रचना के निशाने पर मुख्यत: कांग्रेस ही रहेगी, जिससे भारत को मुक्त करना भाजपा का घोषित लक्ष्य भी है। भले ही उनके नवगठित दल का नाम पंजाब लोक कांग्रेस हो, पर यह तो खुला रहस्य है कि अमरेंद्र सिंह अब पंजाब में भाजपाई रणनीति के ही कप्तान हैं। जब सभी के निशाने पर कांग्रेस है, तो त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरने पर कांग्रेस विरोधी नये सत्ता समीकरण बनने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वर्ष 2022 में तय हो जायेगा कि अमरेंद्र सिंह भाजपा के लिए हेमंत विस्वा शर्मा साबित होंगे या फिर चिराग पासवान। किसान आंदोलन की सफलता को चुनाव में भुनाने चले बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढ़ूनी जैसे लोग जिसका भी खेल बिगाड़ें, इससे किसान आंदोलन की साख को पहुंचनेवाली ठेस की भरपाई मुश्किल होगी।

पंजाब की सत्ता जाने से कम झटका कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में सत्ता हासिल न कर पाना भी नहीं होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव का पिछला अनुभव बताता है कि अगर मुकाबला सीधा हो तो भाजपा के विकल्प के रूप में कांग्रेस की स्वीकार्यता अभी भी है। उत्तराखंड का इतिहास भी हर चुनाव में सरकार बदलने का रहा है। पिछले साल चंद महीनों में तीन मुख्यमंत्री बदलना उत्तराखंड की बाबत भाजपा की बेचैनी को ही दर्शाता है, लेकिन हरीश रावत विरोधी गुट की सक्रियता तथा इस बार आप द्वारा भी चुनावी ताल ठोंकना कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को ग्रहण लगा सकता है। बेशक उत्तराखंड छोटा-सा पहाड़ी राज्य है, सांसद-संख्या की दृष्टि से जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा बड़ी भूमिका नहीं है, लेकिन वहां सत्ता हासिल न कर पाने का संदेश कांग्रेस के लिए बेहद नकारात्मक साबित होगा, क्योंकि दो अन्य छोटे राज्यों- गोवा और मणिपुर में भी उसके विरुद्ध जबर्दस्त घेराबंदी की जा रही है। यह जानना दिलचस्प होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में गोवा में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन उसकी सुस्ती का लाभ उठा कर भाजपा ने वहां सरकार बना ली। फिर इस बार तो वहां न सिर्फ आप ताल ठोंक रही है, बल्कि कांग्रेसियों को तोड़कर तृणमूल भी सत्ता की दावेदार बनने की फिराक में है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस दशकों से हाशिये पर है। तर्क दिया जा सकता है कि वहां उसका बहुत कुछ दांव पर नहीं है, लेकिन भावी राष्ट्रीय राजनीति में ताल ठोंकने का इरादा रखनेवाला कोई भी दल उत्तर प्रदेश को नजरअंदाज कर आत्मघात ही करेगा। यही कारण है कि मुख्य विपक्षी दल सपा द्वारा गठबंधन से इनकार कर दिये जाने के बाद प्रियंका गांधी कांग्रेस के आक्रामक अभियान का आर-पार के अंदाज में नेतृत्व कर रही हैं। महिलाओं को 40 प्रतिशत विधानसभा टिकट समेत हर संभव दांव आजमाये जा रहे हैं- कांग्रेस की चुनावी किस्मत बदलने के लिए। विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा के वर्चस्व के बावजूद 2009 तक लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें मिल जाती थीं, लेकिन 2014 में मोदी लहर के बाद से वह पूरी तरह हाशिये पर है। अमेठी ने तो पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी से मुंह फेर लिया, अब विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में प्रियंका का डंका कितना बज पायेगा—इस पर प्रियंका ही नहीं, कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य भी निर्भर करेगा। संभावित भाजपा विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन में भी कांग्रेस की हैसियत इसी बात पर निर्भर करेगी कि पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता बचाते हुए वह उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे बड़े राज्यों में अपना खोया जनाधार किस हद तक वापस पा सकती है।

उत्तर प्रदेश में पिछले चुनावों में दो लड़कों का बड़ा शोर था। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की वह जोड़ी मतदाताओं का मन नहीं जीत पायी तो दलों और दिलों में दूरियां बढ़ती गयीं। नतीजतन पिछले लोकसभा चुनाव में कट्टर प्रतिद्वंद्वी बसपा तक से गठबंधन कर लेनेवाली सपा ने इस बार कांग्रेस से हाथ मिलाने से साफ इनकार कर दिया। बसपा और कांग्रेस के बजाय अखिलेश ने इस बार छोटे दलों से गठबंधन का प्रयोग किया है। इस गठबंधन में उनके नाराज चाचा शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी समेत शामिल तो कई दल हैं, पर सबसे ज्यादा निगाहें जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल पर टिकी हैं। वजह भी साफ है। हालिया किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर पंजाब–हरियाणा के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहा, जहां 2014 से पहले तक रालोद का परंपरागत वोट बैंक जाट-मुसलमान मिल कर एक विजयी समीकरण बनाता रहा। 2013 में सांप्रदायिक दंगों के बाद टूटा वह समीकरण किसान आंदोलन से फिर कितना बना और चुनाव तक कितना बचा रहेगा—इस पर रालोद सुप्रीमो जयंत चौधरी का राजनीतिक भविष्य भी निर्भर करेगा, जो पहली बार अपने पिता अजित सिंह के साये के बिना चुनाव परीक्षा में उतर रहे हैं। अगर रालोद अपने हिस्से की सीटों में से ज्यादातर नहीं जीत पाया तो अलग दल चला पाना मुश्किल हो जायेगा। उस स्थिति में जयंत की राजनीतिक संभावनाएं बहुत प्रबल तो नहीं रह जायेंगी। यह भी कि आगामी विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और उनकी सपा का प्रदर्शन भी बहुत कुछ रालोद सरीखे मित्र दलों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा, और उसी पर निर्भर करेगा उनका राजनीतिक भविष्य भी। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार दो लड़कों की नयी जोड़ी क्या चुनावी गुल खिला पायेगी। कई बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं बसपा सुप्रीमो मायावती की एकला चलो की राजनीति संदेह और सवालों के घेरे में है, लेकिन चुनाव परिणाम के प्रभाव से अछूता तो उनका राजनीतिक भविष्य भी नहीं रह पायेगा। 2017 में चमत्कार की तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने पर जिन योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखा-दिखाया गया, पिछले साल उन्हें बदलने की अटकलें भी लगीं। जाहिर है, आसन्न चुनाव में कमल पूरी तरह नहीं खिला तो ग्रहण लगने से बच उनका भी राजनीतिक भविष्य नहीं पायेगा। वर्षांत में होने वाले हिमाचल, गुजरात और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों के परिणाम बतायेंगे कि भाजपा और कांग्रेस के लिए आने वाले वक्त की मुट्ठी में क्या है।

journalistrksingh@gmail.com

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