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नया साल, तीन यार और श्रीमती का तीसरा नेत्र

तिरछी नज़र

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भाभीजी और बच्चे स्वागत को खड़े थे कि अतिथि देवता आए तो तिलक कर ससम्मान गृह प्रवेश करवाएं। वे बाकायदा आए लेकिन तिलक के नाम पर कपाल चुराने लगे। नहाए के बाल, खाए के गाल और पीए के हाल दिख जाते हैं।

गिरधारी हमेशा से नया साल पुराने दोस्तों संग मनाता आया है। त्योहार मनाने का अपना कायदा है। कुछ त्योहार विद फैमिली तो कुछ ‘ओनली विद गाइज’ सेलिब्रेट करने के लिए बने हैं। अबकी बार गिरधारी ने सपरिवार घर पर न्यू ईयर सेलिब्रेशन का मन बनाया था। ऐसा उसकी श्रीमती से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने के बाद संभव हो पाया था।

दोस्त किंकर्तव्यविमूढ़ थे। बात कोई खास नहीं मगर जब चार यार मिलते हैं तो सत्संग से लेकर सियासत तक अच्छी-बुरी सब टाइप की बातें होती हैं। नया साल घर से बाहर शुरू हो तो ही अच्छा। जहां सिर्फ यार की यारी निभाते नींद आ जाए। सूरज चाचू की तीसरी, चौथी... किरण कानों में कड़ककर कहे सुबह हो गई मामू और हम कहे ऐसी भी क्या जल्दी है? घर भी कोई न्यू ईयर सेलिब्रेशन की जगह है लल्लू! मगर कहते हैं न ‘दोस्ती इम्तेहान लेती है।’ बेचारे दोस्त मन और झक मारकर नया साल गिरधारी के घर मनाने पर राजी हो गए।

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मित्रों से मंजूरी मिलते ही मिसेज गिरधारी और बच्चे नए साल की तैयारियों में जुट गए। घर सजने लगा गोया पापा के पट्ठे नहीं पुतिन आ रहे हों। खीर-पूड़ी और ‘तायों’ से नए साल का पेट फोड़ने की कमरकस तैयारी की गई।

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आखिरकार इकतीस दिसंबर वाली शाम आ गई। फोन पर बुलावा पाकर तीनों दोस्त फटफटी पर होके सवार खुशी-खुशी चल पड़े। राह में कल्लू ने यकायक गाड़ी रोकी बोला आया। गया तो फिर आया ही नहीं। मंगत बुलाने गया, वह भी नहीं लौटा। मस्तराम के मन में तरह-तरह की कुशंकाएं जन्मने लगीं। सुबह का भूला शाम को लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते मगर शाम का भूला घंटों न लौटे तो उसे क्या कहें? मस्तराम भी ढूंढ़ते चला अफसोस वह भी बैठक में समा गया। गिरधारी के फोन आने लगे। भाभीजी और बच्चे स्वागत को खड़े थे कि अतिथि देवता आए तो तिलक कर ससम्मान गृह प्रवेश करवाएं। वे बाकायदा आए लेकिन तिलक के नाम पर कपाल चुराने लगे। नहाए के बाल, खाए के गाल और पीए के हाल दिख जाते हैं। इनके भी दिख गए।

भाभी जी घर से गरीब थीं लेकिन थोड़ा-बहुत अमीर खुसरो को पढ़ रखा था, उन्होंने दोहा दोहराया—खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाए/ आया कुत्ता खा गया, अब बैठो तुम ढोल बजाए। पोल खुलने के बाद ढोल बजाना ही शेष रह जाता है। इसलिए लोग पहले ही विदेश जाकर ढोल बजा लेते हैं। तभी दूर ढोल बजने की आवाज़ सुनाई दी, शायद बारह बज गए। दोस्त गिरधारी को साथ लेकर जाना चाहते थे। एक तरफ तीन दोस्त दूसरी तरफ श्रीमती का कुछ-कुछ खुलता तीसरा नेत्र... गिरधारी नेत्र बंद कर घर में सो गया। यह सोचकर कि सुबह कितनी रंगीन होगी!!

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