प्राचीनतम जंतुओं के जीन से नयी उम्मीद

प्राचीनतम जंतुओं के जीन से नयी उम्मीद

मुकुल व्यास

मुकुल व्यास

पृथ्वी पर सबसे पहले उत्पन्न बहुकोशिका जीवों के हिस्से आज भी हमारे साथ हैं। एक नये अध्ययन में यह दिलचस्प बात प्रकाश में आई है। अमेरिका में रिवरसाइड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के रिसर्चरों द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार एडियाकरन युग से संबंध रखने वाले 55.5 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवों के जीनों और आज के जीव-जंतुओं के जीनों में काफी समानताएं हैं। इनमें मनुष्य शामिल है। 63.5 करोड़ से 54.2 करोड़ वर्ष पहले के समय को एडियाकरन युग कहा जाता है। यूनिवर्सिटी की जियोलॉजी की प्रोफेसर मेरी ड्रोसर ने कहा कि इन प्राचीन जंतुओं में सिर या अस्थिपंजर जैसी कोई चीज नहीं थी। ये जीव समुद्री तल पर बिखरी तश्तरियों या गोल डोरमेट जैसे दिखाई देते थे। ये जीव इतने विचित्र हैं कि हम उन्हें आधुनिक जीव-जंतुओं की श्रेणी में नहीं रख सकते।

बहरहाल इन जंतुओं के सुरक्षित जीवाश्म रिकॉर्ड के अध्ययन के बाद ड्रोसर और उनके सहयोगी स्कॉट इवांस ने इन जंतुओं की बनावट और उनके व्यवहार का संबंध आधुनिक जीव-जंतुओं के आनुवंशिक विश्लेषण के साथ जोड़ा है। उन्होंने दोनों श्रेणियों के बीच कुछ लिंक खोजे हैं, जिसका ब्योरा ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ रॉयल सोसायटी बी’ पत्रिका में दिया गया है। अपने विश्लेषण के लिए रिसर्चरों ने एडियाकरन युग की 40 प्रजातियों को चुना। इनका आकार कुछ मिलीमीटर से लेकर एक मीटर के बीच था। इनमें किंब्रेला प्रजाति के जीव आंसुओं के आकार थे। इनका एक सिरा बड़ा और गोलाकार था जबकि दूसरा सिरा छोटा था। ये जंतु अपने छोटे सिरे पर स्थित किसी नाक या सूंड जैसी संरचना की मदद से समुद्री तल से खाद्य सामग्री एकत्र करते थे। ये जीव संभवतः आधुनिक घोंघे की तरह मांसल पैर के जरिए इधर-उधर घूम सकते थे।

इस अध्ययन में डिकिनसोनिया और ट्रिब्राचिडियम जीव भी शामिल हैं। डिकिनसोनिया सपाट अंडाकार जीव थे, जिनकी सतह पर उभरी हुई धारियां थीं जबकि ट्रिब्राचिडियम समुद्री तल पर निढाल से पड़े रहते थे। इनके अलावा इकेरिया प्रजाति के जंतुओं का विश्लेषण किया गया। इवांस और ड्रोसर की टीम ने हाल ही में इन जंतुओं की खोज की थी। इनकी साइज और बनावट चावल के दाने जैसी थी। ये पहले जंतु थे जिनके दोनो छोरों पर छिद्र थे जो आपस में आंत जैसी संरचना से जुड़े हुए थे। इवांस ने कहा कि इकेरिया का मुंह भी था, हालांकि जीवाश्म रिकॉर्ड में इसकी पुष्टि नहीं होती। ये जीव संभवतः कार्बनिक पदार्थ के बीच में रेंगते थे। ये चारों जंतु बहुकोशिका जीव थे, जिनमें विविध किस्म की कोशिकाएं थीं। इनमें मांस जैसी संरचनाएं और स्नायु तंत्र भी मौजूद थे। इनके अलावा इन जंतुओं में क्षतिग्रस्त अंगों की मरम्मत करने की क्षमता थी।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अंगों की मरम्मत की प्रक्रिया में जो जीन शामिल थे वही जीन आज मनुष्य के इम्युन सिस्टम के महत्वपूर्ण अंग हैं जो वायरस संक्रमित कोशिकाओं को हटाने में मदद करते हैं। इवांस ने कहा कि यह बात अपने आप में बहुत रोचक है कि ये जीन ऐसी चीज में सक्रिय थे जो करीब पचास करोड़ वर्ष पहले विलुप्त हो गई थी। रिसर्चर अब जानवरों के प्रारंभिक विकास क्रम को समझने के लिए मांसल विकास के अध्ययन की तैयारी कर रहे हैं।

यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि इन प्राचीन जंतुओं में एक जंतु डिकिनसोनिया के जीवाश्म भारत में भीमबेटका की गुफाओं में भी मिले हैं। भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका शैलाश्रय भारत की सबसे बहुमूल्य प्रागैतिहासिक संपदाओं में से है। यूनेस्को की विश्व धरोहरों में गिनी जानी वाली ये चट्टानी गुफाएं आदि मानव की शैलकला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। गुफाओं के भीतर आदि मानव द्वारा बनाए गए चित्रों को नव पाषाणकाल और मध्य पाषाणकाल का माना जाता है। ये शैलचित्र भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवन के प्राचीनतम चिन्ह हैं।

अब इन गुफाओं के आकर्षण में एक नया पहलू जुड़ गया है। रिसर्चरों ने इन गुफाओं की छत पर पृथ्वी के प्राचीनतम जंतु के जीवाश्म की खोज की है। इस खोज से भारत के प्रागैतिहास के एक बहुत ही दिलचस्प अध्याय का अनावरण हुआ है। यह खोज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए बहुत महत्व रखती है। रिसर्चरों द्वारा खोजा गया जीवाश्म डिकिनसोनिया नामक जंतु का है जो करीब 57 करोड़ वर्ष पहले पाया जाता था। इस जंतु के तीन जीवाश्म मिले हैं। सबसे बड़ा जीवाश्म करीब 43 सेंटीमीटर लंबा है। देखने में ये सफेद पत्ते जैसे दिखाई देते हैं। पत्ते जैसे इन जीवों में दिखने वाली मध्य शिरा दरअसल उनके केंद्रीय स्नायु तंत्र को इंगित करती है। भारत से पहले रूस और आस्ट्रेलिया में भी डिकिनसोनिया के जीवाश्मों की खोज की जा चुकी है। इनमें से कुछ जीवाश्म एक मीटर तक लंबे थे।

भीमबेटका की गुफाओं में जीवाश्मों की खोज संयोग से हुई। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1957-58 में भीमबेटका की गुफाओं की खोज की थी। तब से लेकर अब तक हजारों रिसर्चर इन गुफाओं का अवलोकन कर चुके हैं लेकिन किसी की भी नजर इन दुर्लभ जीवाश्मों पर नहीं पड़ी। गुफा की छत पर चिपके जीवाश्मों को पहले आदिम मानव द्वारा बनाए गए शैलचित्र समझा गया। इस जीव को प्रारंभिक सरल जीवों और 54 करोड़ वर्ष पहले कैंब्रियाई काल में प्रकट हुए जीवों के बीच की कड़ी माना जाता है। कैंब्रियाई काल में पृथ्वी पर जीवन प्रस्फुटित हुआ था। तब अनेक किस्म के जटिल और बहुकोशिका जीवों की उत्पत्ति हुई थी।

ये जीवाश्म भीमबेटका की ‘आडिटोरियम केव’ की छत पर पर मिले हैं जो इस परिसर की पहली गुफा है। यह स्थल जमीन से करीब 3.5 मीटर ऊंचा है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के भोपाल स्थित एक अधिकारी के अनुसार भारत में इस तरह के जीवाश्म कहीं और नहीं मिले लेकिन इसी तरह के जीवाश्म दक्षिणी आस्ट्रेलिया में भी पाए गए हैं। इससे साबित होता है कि दोनों जगह पुरा-पर्यावरण एक जैसा था। भीमबेटका और आसपास की चट्टानों की विशेषताओं के अध्ययन से पता चलता है कि ये चट्टानें आस्ट्रेलिया की चट्टानों से काफी मिलती-जुलती हैं। इससे गोंडवानालैंड में दोनों भूभागों की निकटता का भी प्रमाण मिलता है।

डिकिनसोनिया जीवाश्मों की आयु तय करने के लिए जिर्कोन डेटिंग तकनीक का प्रयोग किया गया। आस्ट्रेलिया के जीवाश्म विज्ञानी ग्रेगरी रेटालाक के नेतृत्व में की गई इस रिसर्च का ब्योरा गोंडवाना रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। नई खोज से जीवाश्म विज्ञानी बहुत उत्साहित हैं क्योंकि इससे उन्हें पृथ्वी के उस युग को समझने का मौका मिलेगा जब डिकिनसोनिया और उसके जैसे दूसरे बहुकोशिका जीवों का अस्तित्व था।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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