सवाल है कि क्या हर बार की बाढ़ व जलभराव समस्या हमारी व्यवस्था की लापरवाही या भ्रष्टाचार है? जहां हर वर्ष नालों की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है, लेकिन अगली बारिश में वही नाले फिर जाम मिलते हैं। जल निकासी की परियोजनाएं बार-बार बनती हैं, लेकिन जलभराव खत्म नहीं होता, वहां काम की गुणवत्ता और खर्च की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
आज सबसे बड़ा सवाल है कि जलभराव के बाद राहत क्यों, संकट आने से पहले तैयारी क्यों नहीं? अधिकांश शहरी जलभराव अचानक पैदा होने वाली समस्या नहीं है। जिन स्थानों पर हर वर्ष पानी भरता है, उनकी पहचान प्रशासन और नगर निकायों को पहले से होती है। यह भी पता होता है कि किस सड़क पर पानी जमा होता है, किस नाले की क्षमता कम है और कहां प्राकृतिक जल निकासी बाधित है। फिर भी हमारा जोर अक्सर पानी भरने के बाद राहत देने पर रहता है, पानी भरने से पहले समस्या रोकने पर नहीं।
इस वर्ष असम में बाढ़ से सैकड़ों लोगों की मौत हुई। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों का दुख है। असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के कारण हर वर्ष बाढ़ का खतरा रहता है। केवल भारी बारिश को जिम्मेदार बताकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। बाढ़ क्षेत्र पर बढ़ता दबाव, प्राकृतिक जल क्षेत्रों का नुकसान, अनियोजित निर्माण और कमजोर पूर्व चेतावनी व्यवस्था आपदा को अधिक विनाशकारी बना सकती है।
हरियाणा की आर्थिक शक्ति गुरुग्राम और देश के प्रमुख कारोबारी केंद्रों में शामिल इस शहर में लाखों लोग काम करते हैं। लेकिन मानसून आते ही कई बार इसकी तस्वीर बदल जाती है। भारी बारिश के बाद सड़कें पानी में डूबती हैं, वाहन घंटों फंसते हैं, सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होता है और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी रुक जाती है। हर वर्ष नालों की सफाई, पंपों की व्यवस्था और जल निकासी के इंतजाम किए जाते हैं। फिर अगले मानसून में वही स्थान दोबारा पानी में दिखाई देते हैं। पानी भरने के बाद पंप लगाना जरूरी है, लेकिन पंप स्थायी समाधान नहीं है। जलभराव के बाद यातायात नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन उससे बेहतर है कि यातायात प्रभावित ही न हो। पानी निकालना जरूरी है, लेकिन उससे अधिक जरूरी है कि पानी जमा ही न हो।
गुरुग्राम की समस्या को केवल अत्यधिक बारिश कहकर समझना अधूरा होगा। तेजी से बढ़ते निर्माण ने जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम कर दी है। जहां कभी खाली जमीन, तालाब, हरित क्षेत्र और प्राकृतिक जल मार्ग थे, वहां सड़कें और इमारतें खड़ी हो गई हैं। बारिश का पानी जमीन में जाने के बजाय तेजी से बहता है और पर्याप्त निकासी न मिलने पर सड़कें जलाशय बन जाती हैं। इस समस्या से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, जयपुर और देश के अनेक शहर हर वर्ष सामना करते हैं। हमने शहरों का विस्तार तो कर दिया, लेकिन पानी के लिए जगह नहीं छोड़ी। तालाब, झील और प्राकृतिक जल क्षेत्र खाली जमीन नहीं, बल्कि शहरों की प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था हैं।
सवाल है कि क्या हर बार की बाढ़ व जलभराव समस्या हमारी व्यवस्था की लापरवाही या भ्रष्टाचार है? जहां हर वर्ष नालों की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है, लेकिन अगली बारिश में वही नाले फिर जाम मिलते हैं। जल निकासी की परियोजनाएं बार-बार बनती हैं, लेकिन जलभराव खत्म नहीं होता, वहां काम की गुणवत्ता और खर्च की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर किसी अधिकारी, ठेकेदार या एजेंसी की लापरवाही से सार्वजनिक धन खर्च होने के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो जवाबदेही किसकी होगी? भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, स्वतंत्र गुणवत्ता जांच और प्राकृतिक जल मार्गों पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। प्रत्येक बड़े शहर का वैज्ञानिक बाढ़ जोखिम मानचित्र तैयार होना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट रहे कि अत्यधिक बारिश में पानी किस दिशा में जाएगा।
मानसून से पहले नालों की सफाई भी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। सफाई से पहले और बाद की स्थिति का रिकॉर्ड रखा जाए। हर बड़े जलभराव के बाद केवल पानी निकालने की रिपोर्ट न बने, बल्कि यह भी बताया जाए कि पानी क्यों भरा और अगली बार इसे रोकने के लिए क्या किया जाएगा। शहरों में समय पर बाढ़ चेतावनी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। भारी बारिश की सूचना पहले मिले, यातायात को वैकल्पिक मार्गों पर भेजा जाए और संवेदनशील इलाकों में प्रशासन पहले से तैनात हो।
गुरुग्राम का जलभराव बताता है कि आधुनिक शहर केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं बनता। आधुनिक शहर वह है जो भारी बारिश के दौरान भी अपने नागरिकों को सुरक्षित रख सके। बारिश हमारे नियंत्रण में नहीं है। लेकिन जल निकासी की योजना, प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण, निर्माण पर नियंत्रण, नालों का रखरखाव, पूर्व चेतावनी, विभागों का समन्वय और सार्वजनिक धन में पारदर्शिता हमारे हाथ में है।
अब समय आ गया है कि मानसून के बाद राहत की खबरों के बजाय मानसून से पहले तैयारी की खबरें सुर्खियां बनें। किसी शहर में प्रशासन की असली सफलता यह नहीं कि उसने बाढ़ के बाद कितनी तेजी से पानी निकाला। असली सफलता यह है कि इतनी बारिश के बावजूद शहर डूबा ही नहीं।

