उत्तर प्रदेश

प्रतियोगी परीक्षाओं को लीकप्रूफ बनाने की जरूरत

प्रतियोगी परीक्षाओं को लीकप्रूफ बनाने की जरूरत

कृष्ण प्रताप सिंह

उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा का प्रश्नपत्र आउट होने के चलते उसे रद्द किये जाने को लेकर अभ्यर्थियों का आक्रोश स्वाभाविक है। नि:संदेह अभ्यर्थियों को अनेक असुविधाएं झेलकर परीक्षा भवन में पहुंचने और प्रश्नपत्र का उत्तर देना शुरू करने के बाद पता चले कि उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर गया है, तो उन्हें जिस गम्भीर तनाव की हालत से गुजरना पड़ता है, न जांच का कोई सरकारी आश्वासन उसकी भरपाई कर सकता है, न यह ऐलान कि जो भी दोषी पाये जायेंगे, उन पर गैंगस्टर व राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होगी और उनकी सम्पत्तियां जब्त कर ली जायेंगी।

योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा इस सिलसिले में की गई इस घोषणा कि महीने भर में ही यह परीक्षा दोबारा करा दी जायेगी और उसमें भाग लेने आने हेतु अभ्यर्थियों को राज्य सड़क परिवहन की बसों में उनके प्रवेश पत्र को ही टिकट मानकर निःशुल्क यात्रा की सुविधा दी जायेगी, का भी तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक इस सवाल का जवाब न मिले कि लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य की निर्धारक इस तरह की अर्हता परीक्षाओं की फुलप्रूफ व्यवस्था क्यों नहीं की जाती।

ज्ञातव्य है कि इस परीक्षा के लिए कोई 21 लाख 65 हजार अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था और उनमें जो गरीब मां-बाप की संतान थे, दूर-दराज के गांवों से अनेक तकलीफें उठाकर आवंटित परीक्षा केन्द्रों तक पहुंचे थे, उनके निकट सिर्फ किराये के खर्च की ही समस्या नहीं थी, जिसे अगली बार के लिए मुफ्त कर योगी सरकार उपकार जता रही है। उनमें से अनेक का भोजन व ठहरने की जगह पर खर्च की तंगी से भी सामना था। इसलिए उन्होंने परीक्षा की पिछली रात खुले आसमान के नीचे काटी थी।

सवाल है यदि इसके पीछे शिक्षा क्षेत्र में फैला हुआ व्यापक भ्रष्टाचार नहीं है तो ऐसी घटनाओं की बार-बार पुनरावृत्ति क्यों होती रहती है? जानकारों के अनुसार इस परीक्षा में इस बार पहली बार लाइव सीसीटीवी सर्विलांस की व्यवस्था की गई थी, ताकि हर हाल में शुचिता बरकरार रखते हुए नकल रहित परीक्षा सम्पन्न कराई जा सके। लेकिन लाइव सीसीटीवी सर्विलांस के बूते परीक्षा की शुचिता की रक्षा के सरकारी दावे की धज्जियां उड़ने में घंटा भर भी नहीं लगा। यह तब था जब उक्त सर्विलांस को हर परीक्षा केंद्र पर एक्टिव किया गया था और लखनऊ में उसकी मॉनिटरिंग की जा रही थी।

यह क्यों कर हुआ कि परीक्षा शुरू होने के तुरंत बाद ही उसका प्रश्नपत्र गाजियाबाद, मथुरा और बुलंदशहर आदि जिलों में व्हाट्सएप पर लीक होकर वायरल हो गया? प्रदेश पुलिस की जो स्पेशल टास्क फोर्स अब दावा कर रही है कि उसने तत्परतापूर्वक प्रश्नपत्र लीक होने का पता लगा लिया, जिसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गयी, उसकी तत्परता को तभी पूर्ण माना जा सकता था, जब वह प्रश्नपत्र लीक होने से पहले ही उसकी कोशिश या साजिश में लगे तत्वों का भंडाफोड़ कर देती।

आखिर परीक्षा व्यवस्था में उनके अनुकूल छिद्र छोड़ देने का दोष किस पर मढ़ा जायेगा और क्या उसका शमन इतने से ही हो जायेगा कि टास्क फोर्स जिसे भी धर दबोचे, उस पर रासुका व गैंगस्टर लगा दे? इस तरह कुछ छोटी मछलियां जरूर फंस जायेंगी, लेकिन बड़ी मछलियां तो गुल खिलाती ही रहेंगी और इस सवाल का जवाब शायद कभी न मिले कि क्या सम्बन्धित अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इस तरह प्रश्नपत्र का आउट होना संभव है? अनेक वारदातों के बावजूद प्रदेश सरकार प्रश्नपत्र लीक या आउट की समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच पाई है और उसकी हर पुनरावृत्ति के वक्त सोती हुई पकड़ी जाती व चौंककर कड़ी कार्रवाइयों की घोषणाएं करने लग जाती है तो क्या इसे सामान्य मामला मानकर दरकिनार किया जा सकता है? 

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