स्वास्थ्य व शिक्षा में क्रांति की दरकार

स्वास्थ्य व शिक्षा में क्रांति की दरकार

गुरबचन जगत

गुरबचन जगत 

भारत में कोविड-19 का कहर शुरू हुए एक साल से ज्यादा हो गया। पहली लहर बनिस्पत कम घातक रही, जिसके चलते मुगालते में आकर हम कहने लगे कि सब ठीक हो गया है। यहां तक कि हम वह वैक्सीन भी निर्यात करने लगे, जो उपलब्ध थी। फिर आई दूसरी खतरनाक लहर और हमें संभलने का मौका तक नहीं मिला। स्वास्थ्य ढांचा नाममात्र का निकला-अस्पताल, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, मेडिकल स्टाफ इत्यादि की बेतरह कमी। लाखों लोग मारे गए और लाखों-लाख संक्रमित हो बीमार पड़े, इनकी ठीक संख्या का भी पूरी तरह पता नहीं है। विश्व हमारी मदद को आया, लेकिन उतना नहीं, जितनी जरूरत थी। अब हमें इंतज़ार है तीसरी लहर का और प्रार्थना कर रहे हैं कि काश न आए।

लेकिन यह इस लेख का उद्देश्य नहीं है। तथ्यों को आंकड़ों की हेराफेरी से छिपाया नहीं जा सकता। कोविड सचमुच में व्याप्त है, लाखों जानें लील गया और हमारी तैयारियां कहीं आसपास भी नहीं थीं। ऐसा क्यों हुआ? इसके लिए हम ब्रितानी हुकूमत को दोष नहीं दे सकते क्योंकि आजाद हुए 73 बरस हो गए। यह समय काफी है एक प्रथम श्रेणी का स्वास्थ्य तंत्र बनाने को। तथापि आजादी के दिन से किसी भी सरकार ने दो क्षेत्रों-स्वास्थ्य और शिक्षा-को तरजीह देकर विकसित करने की ओर ध्यान नहीं दिया। यदि पिछले सालों में इनके लिए रखे गए बजटीय प्रावधानों को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि समस्या की जड़ कहां है। होना तो यह चाहिए था कि जिला, प्रखंड और राज्य मुख्यालय स्तर पर मॉडल अस्पताल होते। आलीशान भवन बनाने पर जोर देने की बजाय पैसा पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स और सर्वोत्कृष्ट उपकरण जुटाने पर लगाया जाता। कुछ गांवों के समूह के पीछे एक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र होना चाहिए, जहां छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं का निवारण स्थानीय स्तर पर हो सकता और जरूरत पड़ने पर ही रोगी को उच्च स्तर के अस्पतालों में रेफर किया जाता। 

इसके साथ जरूरत थी नर्सें तैयार करने को यथेष्ठ संख्या में मेडिकल और प्रशिक्षण कॉलेजों की। इनकी गिनती अस्पतालों की संख्या के आधार पर हो सकती थी। पर्याप्त संख्या में सामान्य और विशेषज्ञ चिकित्सक भर्ती कर उनकी नियुक्ति अस्पतालों में बराबर संख्या में होती। ग्रामीण डिस्पेंसरियों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि अधिकांश बिना डॉक्टर के चल रही हैं, क्योंकि वे सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण अंचल में जाकर काम करने से कतराते हैं। 

इन सबसे ऊपर है, सत्ता के शीर्ष पर एक राजनीतिक दूरदृष्टा होने की जरूरत, जिसे इल्म हो कि स्वास्थ्य और शिक्षा, मानव विकास हेतु सबसे मूलभूत अवयव हैं, जिनके ऊपर देश का समग्र विकास निर्भर करता है। लेकिन 1947 से ही इस ओर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। अपने लंबे सरकारी सेवाकाल के दौरान मैंने ऐसे स्वास्थ्य मंत्रियों और सचिवों को देखा है, जिनका लगभग पूरा समय स्थानांतरण और नियुक्तियां करने में निकल जाता था। दबाव इतना कि नीतिगत मामलों के लिए समय नहीं बचता। इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद हम लोग एक नीति तक विकसित नहीं कर पाए और ‘लॉबी के भीतर लॉबी’ सारा गोरखधंधा चलाए हुए हैं। इस तरह की स्थिति में भ्रष्टाचार फलता-फूलता है, दवाओं एवं उपकरणों की खरीद से लेकर ओहदे और स्थानांतरण तक में। नतीजा यह कि हमारे नामी मेडिकल प्रशिक्षण एवं अनुसंधान प्रतिष्ठान जैसे कि पीजीआई, एम्स इत्यादि को चारों ओर से आने वाले मरीजों की सुनामी झेलनी पड़ती है, क्योंकि निचले स्तर पर व्यवस्था सही ढंग से काम नहीं करती। लिहाजा, उपचार जगत में उत्कृष्टता पाने के उद्देश्य से बने इन संस्थानों को अपनी पढ़ाई एवं अनुसंधान की एवज़ पर हर रोज़ हज़ारों बाह्य रोगियों से निपटना पड़ता है। 

हमारे नेता और शिक्षाविद‍् सदा उच्च शिक्षा संस्थान बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन इनके लिए जरूरी विद्यार्थी आएंगे कहां से? हमारे प्राथमिक विद्यालय तो ज्यादातर कागज़ों में चल रहे हैं। इनमें न समुचित भवन, न ही शौचालय (विशेषकर लड़कियों के लिए) इत्यादि की व्यवस्था है। प्रशिक्षित अध्यापक भी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। जो हैं, उन्हें बौद्धिकता अथवा अध्यापन अथवा नैतिक व्यवहार का उदाहरण नहीं कहा जा सकता। इनकी यूनियनें बहुत ताकतवर हैं और कोई बड़ा बदलाव नहीं होने देतीं। यहां भी, बहुत सारा समय मनपसंद नियुक्ति और स्थानांतरण करने-करवाने में चला जाता है। 

शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी तंत्र नदारद है – समुचित संख्या में स्कूल, कॉलेज, प्रयोगशालाएं नहीं हैं। हमें राष्ट्रीय स्तर के ऐसे संस्थान बनाने चाहिए थे, जिनका उद्देश्य बच्चों में नये विचार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने का होता। हर साल इतिहास, राजनीति शास्त्र इत्यादि में पैदा हुए लाखों स्नातकों का समाजोन्मुख उपयोग बहुत कम है। हमें ऐसे विद्यार्थियों की जरूरत है, जो शुरू से ही रचनात्मक सोच रखें और विश्वविद्यालय पहुंचते-पहुंचते नये अनुसंधान करें। कॉलेजों में कला संकाय के विद्यार्थियों की संख्या में भारी कमी लाने की जरूरत है और युवा लड़के-लड़कियों को अन्य ऐसे कौशल सिखाए जाएं, जिनसे उनको उद्योग-धंधों में रोजगार मिल सके। इसके लिए उद्योगों की भावी जरूरतों को ध्यान में रखकर शिक्षण को उस मुताबिक ढाला जाए। 

सरकार और उद्योग जगत की ओर से विश्वविद्यालयों में नये अनुसंधानों को धन दिया जाए, यहां तक कि सेना को भी अपनी जरूरतों के मद्देनजर नये अनुसंधानकर्ताओं को धन मुहैया करवाना चाहिए (विकसित देशों में यही होता है)। हमें जरूरत है अपने उन प्रोफेसर और छात्रों की, जो मिलकर अनुसंधान करें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार, वेबीनार, आदान-प्रदान कार्यक्रम निरंतर चलते रहें ताकि हमें नयी खोजों के बारे में वास्तविक समय पर पता चलता रहे। चूंकि डिजिटल युग में प्रवेश किए हमें कुछ वर्ष हो चुके हैं, आज दुनिया में रोबोटिक्स, एआई, माइक्रोबॉयोलॉजी इत्यादि क्षेत्र में बहुत तरक्की हो चुकी है, लेकिन हम कहां हैं? बेशक कोविड की वजह से बंद पड़े स्कूलों ने हमें ऑनलाइन पढ़ाई एवं प्रशिक्षण करने की ओर मोड़ा है, किंतु लाखों बच्चों के पास न तो कम्यूटर हैं, ना स्मार्टफोन। और ऐसे परिवार बहुत हैं, जहां चार या पांच बच्चे हैं, उनके बीच एक फोन होता है, जो अक्सर पिता के पास रहता है। परिणाम स्वरूप दो-तीन बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़ परिवार की मदद को काम-धंधे में लगना पड़ा है। मैंने उनकी आंखों में शिक्षा की भूख देखी है। यहां तक कि गरीब से गरीब को अहसास है कि केवल शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य ही उन्हें गरीबी के दुष्चक्र से निकाल सकते हैं। 

सालों पहले, जब कम्यूटर का आगमन हुआ ही था, चीनियों को अहसास हो गया था कि उनके पास पर्याप्त संख्या में ऐसे बच्चे नहीं हैं, जिन्हें अंग्रेजी आती है। उन्होंने 50 लाख लड़के-लड़कियों को चुना और उन्हें इंग्लिश सिखाने का क्रैश कोर्स करवाया – जल्द ही उनके पास अंग्रेजी में बातचीत करने में समर्थ नयी पीढ़ी की खेप थी। उन्होंने अपने विश्वविद्यालय, स्कूलों, प्रशिक्षण सुविधाओं में सुधार किया और इसको राष्ट्रीय आंदोलन में तबदील किया। हजारों विद्यार्थी अमेरिका, यूके और अन्य देशों में पढ़ने हेतु भेजे। उनमें से अधिकांश ने वापस आकर अपने देश और पश्चिमी जगत के बीच तकनीक के अंतर को पाटने में मदद की। 

हम क्यों नहीं अपने बच्चों को लाखों-करोड़ों स्मार्टफोन बनाकर दे पाए? अनुभव बताता है कि हमारे ज्यादातर अध्यापकों को ऑनलाइन पढ़ाई करवाने का तकनीकी ज्ञान नहीं है। समस्त देश में इस बाबत सिखाने के लिए एक क्रैश-कोर्स बनाया जाए। उच्च शिक्षा के पात्र विद्यार्थी चुनने को नयी प्रणाली बनाई जाए और बाकियों को रोजगारोन्मुख कौशल सीखने की ओर मोड़ा जाए।

विगत में हम कलात्मक एवं वैज्ञानिक सोच विकसित करने को चले पुनर्जागरण और जागृति अभियान का हिस्सा बनने में विफल रहे हैं, हम औद्योगिक क्रांति बनाने में भी असफल रहे हैं और आज इस क्षेत्र में हमारी उपस्थिति नगण्य है। आइए अब हम डिजिटल क्रांति का मौका हाथ से न जाने दें। जिनके पास विदेश जाकर स्नातक और इससे ऊंची शिक्षा प्राप्त का सामर्थ्य है, उनमें अधिकांश चीनी विद्यार्थियों की तरह वापस वतन नहीं लौटेंगे। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है, विदेशों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जो उन्हें वहां बेहतर मौके प्रदान करती है। सोचने की बात है कि नडेला और उस जैसे भारतीय मूल के कई दिग्गज अंतर्राष्ट्रीय कॉर्पोरेट जगत में इतनी ऊंचे स्थान पर कैसे पंहुच गए? मुझे यकीन है कि अपने देश में भी अनेक क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं, जिनके पास दूरदृष्टि है। वे आगे आएं और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने नजरिए को वास्तविकता में फलीभूत करें। इन दोनों क्षेत्रों में, हमें सुधार नीचे से ऊपर की ओर करना होगा। यानी प्राथमिक विद्यालय और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से शुरू कर उच्चतर विद्यालय एवं कौशल विकास केंद्रों की कड़ी बनाना, विद्यार्थियों को उद्योगों में रोजगार के लिए तैयार करने को कॉलेजों में पूरी तरह उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशालाएं, संकाय एवं विद्यार्थियों को जरूरत की सुविधाएं मुहैया कर नवीनतम अनुसंधान का माहौल बनाना, हर स्तर पर अच्छा प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापन संकाय, खासकर वह मेधावी छात्र जो आधुनिक गैजेट खरीद पाने में असमर्थ हैं, उन्हें यह मुहैया करवाना इत्यादि उपाय करने होंगे। 

भारत में अग्रणी व्यवसायियों के मार्गदर्शन में एक राष्ट्रीय योजना बनाई जाए। इसको क्रियान्वित करने और निगरानी के लिए एक समूह हो, अग्रणी उद्योगपति और सरकारी विशेषज्ञ बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करें। यहां तक कि इस काम में नामी गैर सरकारी संस्थाएं जोड़ी जाएं। इस योजना में, अध्यापकों को सही ढंग से ऑनलाइन पढ़ाई करवाने लायक बनाने को क्रैश कोर्स भी शामिल हो और कॉलेज एवं उच्चतर संस्थाओं में यथेष्ठ संख्या में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएं। 

तथ्य यह है, वक्त रहते यदि हमने अनेक प्रकार के आरक्षण वाली व्यवस्था बनाने के अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्रांतिकारी बदलाव लाने की योजना बनाई होती तो पहले ही विकसित देश बन चुके होते। आज हमारे समक्ष नाना प्रकार के आरक्षित वर्ग के अलावा करोड़ों ऐसे गरीब लोग हैं, जिन्हें समाज के अन्य वर्गों से मदद की दरकार है। लेकिन मदद केवल उस लीक पर हो, जो ऊपर बताई गई है, वरना मध्य एवं समृद्ध वर्ग के बच्चे तो विदेश जा बसेंगे और बाकी बचे दारूण गरीबी, अज्ञानता और घटिया स्वास्थ्य सुविधाओं वाले माहौल में स्वदेश में धंसे रह जाएंगे। वक्त हमें इन क्षेत्रों में क्रांति बनाने को पुकार रहा है–अब यदि डिजिटल क्रांति से चूक गए तो हम कहीं के न रहेंगे। अपने पास जिस विशाल युवा आबादी का फायदा होने की बात हम कहते हैं, यदि वही युवा अशिक्षित और बेरोजगार हों तो यह दु:स्वप्न में तबदील हो जाएगा। 

लेखक मणिपुर के राज्यपाल, संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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