कृषि सुधार के प्रश्न

किसानों की आशंकाओं का समाधान जरूरी

किसानों की आशंकाओं का समाधान जरूरी

शेर सिंह सांगवान

शेर सिंह सांगवान

कृषि सुधार से जुड़े दो बिल संसद ने पारित कर दिये हैं। तीसरा बिल लोकसभा में पारित हो चुका है। इन बिलों का सदन  के अन्दर और बाहर जोरदार विरोध हो रहा है। सबसे ज्यादा किसान पंजाब और हरियाणा में इन बिलों वापस लेने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

इसका मुख्य  कारण तो इन दोनों प्रणालियों का इन राज्यों में पूरी तरह से लागू होना और किसानों  का लाभान्वित होना है। अन्य  कारणों को जानने के लिए इन तीन बिलों की विवेचना किया जाना उचित होगा।

सबसे पहला बिल ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955’ सुधार के संबंध में है, जिसके अनुसार खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर रोक केवल असामान्य परिस्थितियों जैसे युद्ध, अकाल और प्राकृतिक आपदा और अप्रत्याशित मूल्यों के बढ़ने पर ही लगाई जायेगी। इसी तरह स्टॉक   लिमिट  भी 100 प्रतिशत फलों व सब्जियों  की कीमत बढ़ने और अन्य खाद्य पदार्थों की 50 प्रतिशत  कीमत बढ़ने पर ही लगाई जायेगी। इस बिल पर कोई  विशेष विरोध किसानों को नहीं होना चाहिए।

दूसरे बिल ‘किसान उत्पाद ट्रेड और कामर्स’ के अनुसार कोई भी ट्रेडर जिसके पास पेन नम्बर हो, वह अन्तर-राज्य और अन्तरा-राज्य खाद्य पदार्थों में  व्यापार किसी किसान या अन्य ट्रेडर के साथ ‘ट्रेड एरिया’ में कर सकता है। खाद्य पदार्थों में  एपीएमसी में शामिल सभी कृषि वस्तुएं होंगी तथा  ट्रेड एरिया में किसान, खेत, कारखाने की जगह, कोल्ड स्टोरेज, गोदाम व कोई अन्य बिल्डिंग भी हो सकती है परन्तु ट्रेड एरिया में एपीएमसी और उसके अधिकृत प्राइवेट बाजार शामिल नहीं होंगे।  इसके अतिरिक्त ट्रेड एरिया में खरीद-फरोख्त पर एपीएमसी या अन्य कानून व टैक्स नहीं लगेगा जबकि एपीएमसी बाजारों में यह रह सकता है। इसका प्रभाव यह होगा कि कोई भी खरीददार एपीएमसी में नहीं जाना चाहेगा और जल्दी ही ये मार्केट प्रणाली खत्म   हो  जायेगी।  किसी फैक्टरी में एक खरीददार तथा सैकड़ों बेचने वाले होंगे तो कीमत क्या होगी। बिल के अनुसार कोई रेफरेंस कीमत होगी परन्तु उसमें  एमएसपी का नाम नहीं होगा।  अतः  यह बिल एपीएमसी और न्यूनतम मूल्य प्रणाली दोनों को ही खत्म करने वाला होगा ।

इसी प्रकार तीसरा बिल कृषक (सशक्तीकरण और सुरक्षा) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा; खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, ग्रेड व स्टैंडर्ड पर ही ज्यादा ज़ोर देता है परन्तु मूल्य निर्धारण के बारे किसी कीमत से लिंक करने की बात तो करता है परन्तु स्पष्ट रूप से न्यूनतम मूल्य को उजागर नहीं करता। यहां भी खाद्य पदार्थों की बिक्री ‘ट्रेड एरिया’ में ही होगी, न कि एपीएमसी मार्केट में।  इस प्रकार से ये दोनों ही बिल एपीएमसी और न्यूनतम मूल्य प्रणाली को खत्म करने वाले हैं।

याद रहे एपीएमसी मार्केट प्रणाली रायल कृषि कमीशन 1928 में किसानों पर  व्यापारियों के शोषण को कम करने के लिए अनुशंसित की गयी थी। इसे लागू करने में लगभग 30 वर्ष लगे क्योंकि 1960 और 1970 के दशकों में सभी राज्यों ने इसे लागू किया। इस प्रणाली का पिछले 50 वर्षों  में किसानों ने कभी विरोध नहीं किया। राज्य सरकारों ने भी कोई विरोध नहीं किया क्योंकि उन्हें भी टैक्स व सैस मिलते रहे हैं। हालांकि  संबंधित उद्योग वर्ग इससे  नाखुश था क्योंकि उनसे कई  तरह के  टैक्स उगाहे जाते हैं। इसी प्रकार एमएसपी जो 1970 में गेहूं से शुरू हुई, 2020 तक लगभग सभी फसलों के लिए लागू हो गयी है। देश के सभी राज्यों के किसान इससे लाभान्वित हो रहे हैं।

केन्द्र सरकार के उपरोक्त दोनों बिलों ‘ट्रेड एरिया’ में टैक्स खत्म करके एपीएमसी मार्केट को नष्ट करने का सीधा संकेत है। इसी तरह एमएसपी का नाम नहीं है, यद्यपि प्रधानमंत्री मौखिक आश्वासन दे रहे हैं।  यह तथ्य है कि गेहूं और चावल के बढ़ते स्टॉक के कारण, भारत सरकार पर लगातार दबाव बना हुआ है कि वह स्टॉक को प्रबंधनीय सीमा के भीतर रख सके। यहां तक कि एमएसपी पर सरकार द्वारा खरीदे गए दलहन और तिलहन के स्टॉक का भी अगले खरीद सीजन से पहले निपटान नहीं किया जाता है। हाल के वर्षों में अधिक खरीद के कारण एमएसपी एक राष्ट्रव्यापी समस्या बन गई है और विपणन सुधार बिल 2020 में इसके गैर-उल्लेखों से निश्चित रूप से किसानों के मन में आशंका पैदा होगी। ऐसी स्थितियों में, एक बेहतर विकल्प फसलों की बुवाई से पहले खरीद के लिए पंजीकरण के माध्यम से ‘क्षेत्र-योजना’ हो सकता है। 

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