म्यांमार की चुनौतियां और भारतीय हित

म्यांमार की चुनौतियां और भारतीय हित

जी. पार्थसारथी

हाल ही में भारत के सेनाध्यक्ष जनरल मनोज विक्रम नरवाणे और विदेश सचिव हर्षवर्धन सिंगला म्यांमार के संयुक्त दौरे पर गए थे। उत्तर-पूर्व का यह पड़ोसी मुल्क, जिसके साथ हमारी 1644 कि.मी. लंबी थलीय सीमा रेखा है, से रिश्तों को भारत कितना महत्व देता है, यह यात्रा परिचायक है। यह सीमा रेखा उत्तर में चीन से लेकर दक्षिण में बांग्लादेश तक साझी है। म्यांमार के साथ राजनीतिक संबंध अच्छे रहने के बावजूद द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग 1990 तक काफी कम था। इसके पीछे मुख्य कारणों में एक है म्यांमार की एकाकीपन रखने वाली आर्थिक नीति। दोनों मुल्कों के हथियारबंद पृथकतावादी गुट सीमा के आर-पार अपनी गतिविधियां चलाते हैं। इनमें भारत के असम का ‘उल्फा’ एवं नागालैण्ड का ‘एनएससीएन (आईएम)’, म्यांमार का ‘काचिन मुक्ति संगठन’ और ‘अराकान आर्मी’ प्रमुख हैं। ये आपस में गठजोड़ करके एक-दूसरे की मदद करते आए हैं जबकि सरकारों के बीच आपसी सुरक्षा सहयोग न्यूनतम या कहें लगभग नगण्य था।

1990 के दशक में भारत और म्यांमार प्रशासन नजदीक आए और सीमापारीय विद्रोही गतिविधियों और नशा तस्करी से निपटने के लिए संधि की। ये समझौते दोनों मुल्कों के सशस्त्र पृथकतावादियों को नाथने में काफी प्रभावशाली रहे हैं। म्यांमार के काचिन मुक्ति संगठन की मदद लेकर भारत के पृथकतावादी चीन के युन्नान प्रांत में सुरक्षित पनाह और सैन्य मदद लेते रहते हैं। इस काम में चीन की सरकारी एजेंसियां अंदरखाते सहयोग करती हैं।

1990 के दशक में ब्रिटेन-अमेरिका के नेतृत्व में म्यांमार पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के कारण नकदी की तंगी ने उसको चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर बना डाला। हालांकि उसने पड़ोसी देश जैसे कि भारत और थाइलैंड, सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संबंध सुधारे हैं। म्यांमार भारत के उन पृथकतावादियों से सख्ती से पेश आता है जो इसकी सीमा से होकर चीन की सुरक्षित पनाहगारों तक आते-जाते रहते हैं। म्यांमार सामरिक दृष्टि से अमेरिका के लिए कुछ खास महत्व नहीं रखता। रोहिंग्या मुस्लिमों के प्रति नस्लीय हिंसा और कथित मानवाधिकार हनन करने की एवज में अमेरिका और सहयोगी पश्चिमी मुल्कों ने म्यांमार पर आर्थिक प्रतिबंध जड़ दिए हैं। रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर म्यांमार के राखिने प्रांत के बाशिंदे हैं, जिसकी सीमा भारत और बांग्लादेश से लगती है। अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार पर आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर रखे प्रस्ताव को चीन ने वीटो कर रखा है। रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी और पुनर्वास के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने म्यांमार के पड़ोसी मुल्कों और जापान से साथ मिलकर कोई ठोस योजना बनाने पर भी सहयोग नहीं किया है। अमेरिका एवं यूरोपियन यूनियन की इस नीति से चीन सबसे ज्यादा फायदे में है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में अपने खिलाफ रखे गए कथित मानवाधिकार हनन प्रस्ताव को वीटो करवाने के लिए म्यांमार को उस पर पूरी तरह आश्रित होना पड़ा।

म्यांमार की इस मजबूरी का चीन अब पूरी तरह दोहन कर रहा है। वह बंगाल की खाड़ी के तट पर क्याक्फयू बंदरगाह का विकास कर रहा है। चीन के युन्नान प्रांत तक रेल और सड़क संपर्क मार्ग बनने हैं। चीनी कंपनियां म्यांमार में मौजूद खनिज और कीमती पत्थरों के खनन करने को अधिक संख्या में पहुंचने लगी हैं। इसके अलावा चीन ने म्यांमार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह में जुटे 26 जातीय गुटों से निकट संबंध बना रखे हैं, इनमें 12000 से 15000 लड़ाकों वाला ताकतवर गुट काचिन मुक्ति संगठन भी एक है। इसके कारकुन भारत और चीन के सीमांत सघन जंगली इलाकों में आवाजाही करते रहते हैं। चीन इन गुटों को बतौर एक औजार म्यांमार के अंदरूनी मामलों में दखलअंदाजी करने और प्रभाव बनाने के लिए करता है। यहां तक कि चीन ने इनसे समन्वय बनाने को बाकायदा एक ‘राजदूत’ नियुक्त कर रखा है। देश के नए संविधान का प्रारूप तय करने के सिलसिले में ये गुट इन दिनों म्यांमार सरकार द्वारा आयोजित वार्ता में भाग ले रहे हैं। अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल वह चीनी कंपनियों को बुनियादी ढांचा और अन्य विकास परियोजनाओं में ठेके दिलवाने के लिए भी करता है।

भारत के सीमा सड़क संगठन ने मणिपुर के मोरेह और म्यांमार के क्लेम्यो को जोड़ने वाली सड़क बनाकर बढ़िया काम कर दिखाया है। इससे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और मांडले के बीच व्यापार के दरवाजे खुल गए हैं। हालांकि ‘कालादन कॉरीडोर’ नामक महत्वपूर्ण योजना के काम में देरी हो रही है। इस परियोजना के तहत मिजोरम और भारत के अन्य उत्तर-पूर्वी सूबों की पंहुच बंगाल की खाड़ी के तट पर सित्वे बंदरगाह तक हो जाएगी, जो कोलकाता से कुछ ही दूरी पर है। म्यांमार के विद्रोही गुट अराकान आर्मी के हमलों की वजह से इस कॉरीडोर के काम में देरी हो रही है। हालांकि दोनों देशों के सेनाओं ने सीमांत क्षेत्र में बने अराकान आर्मी के कुछ ठिकानों को ध्वस्त किया है।

भारत-म्यांमार के बीच पिछले साल का व्यापार निरुत्साहित करने वाले स्तर पर यानी महज 1.2 खरब डॉलर मूल्य का है, इसमें भारत से किया जाने वाला निर्यात 97.3 करोड़ डॉलर का था। जहां भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी ने समुद्र में तेल खोज करने में अच्छा काम कर दिखाया है वहीं हमारा निजी क्षेत्र म्यांमार में जापान, चीन और आसियान संगठन की कंपनियों के मुकाबले निवेश करने में कुछ खास नहीं कर पाया है। तथापि दोनों मुल्कों के बीच सैन्य सहयोग में बढ़ोतरी होने जा रही है। इस सिलसिले में भारत ‘किलो’ श्रेणी की पनडुब्बी और तारपीडो देने के अलावा 105 मि.मी. तोपें, राडार और सोनार प्रणाली मुहैया करवाएगा। इसके लिए वार्ता का दौर जारी है।

भारतीय सेनाध्यक्ष और विदेश सचिव के म्यांमार दौरे में दोनों मुल्कों के बीच संबंधों के तमाम पहलुओं पर नजरिए का आदान-प्रदान हुआ है। भारतीय शिष्टमंडल ने म्यांमार के दो सबसे ज्यादा ताकतवर नेताओं से मुलाकात की है। इनमें एक हैं स्टेट कांउसलर आंग सान सू की, जो फिलवक्त आगामी 8 नवम्बर को होने वाले चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं और दूसरे हैं रक्षा विभाग के अध्यक्ष और वरिष्ठ जनरल मिंग ओंग ह्लैंग। हालांकि जनरल ह्लैंग के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि इस चुनाव में सेना का झुकाव नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की अध्यक्ष सू की पर न होकर पूर्व सेना अधिकारी के नेतृत्व वाली यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवेलपमेंट पार्टी की तरफ होगा। देश में काफी लोकप्रिय और करिश्माई नेता सू की और सेना के बीच लंबे अर्से से खींचतान रही है और यह प्रसंग वहां की मौजूदा राजनीति और जिंदगी का आम पहलू बना हुआ है परंतु बंगाल की खाड़ी में, जहां चीन मौके की ताड़ में है, क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए चली आ रही रोहिंग्या समस्या को सुलझाना जरूरी है। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पड़ेगी। भारत को चाहिए कि अपने ‘क्वाड’ सहयोगियों को साथ लेकर सक्रिय भूमिका निभाए। नौ लाख रोहिंग्या शरणार्थियों का सारा बोझ अकेले बांग्लादेश को उठाना पड़े, यह उम्मीद करना जायज नहीं होगा। इस मुद्दे को लेकर म्यांमार और बांग्लादेश के बीच तनाव जारी है और इसका हल केवल तभी निकल पाएगा जब अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी साथ जुड़ेगी।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

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