जयंती प्रसंग : अल्हड़ बीकानेरी

रचनाधर्मिता का बहुआयामी मूल्यांकन बाकी

रचनाधर्मिता का बहुआयामी मूल्यांकन बाकी

सत्यवीर नाहड़िया

बीकानेर नाम जेहन में आते ही, ध्यान राजस्थान की ओर जाना स्वाभाविक है। यही कारण रहा कि काव्य मंचों पर छंदबद्ध हास्य-व्यंग्य रचनाओं तथा गीत-ग़ज़लों की तरन्नुम शैली के लिए चर्चित रहे कवि अल्हड़ बीकानेरी को भी ज्यादातर साहित्य प्रेमी राजस्थानी ही मानते रहे, जिसका उन्होंने अपनी रचनाओं में भी उल्लेख किया है।

दरअसल, वे रेवाड़ी जिले के गांव बीकानेर के मूल निवासी होने के कारण अपना तखल्लुस बीकानेरी लिखते थे। आज जब काव्य मंचों पर हास्य विधा में गिरावट का दौर जारी है, तो अल्हड़ जी की हास्य-व्यंग्य तथा गीत-ग़ज़ल पर आधारित छंदबद्ध रचनाधर्मिता की अनूठी साधना अनायास याद आती है।

17 मई, 1937 को हरियाणा प्रदेश के वर्तमान रेवाड़ी जिले के अंतर्गत बीकानेर गांव में पिता छुट्टनलाल शर्मा तथा माता पार्वती देवी के घर जन्मे बालक श्याम की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में हुई। फिर अहीर कालेज, रेवाड़ी में विज्ञान विषयों के विद्यार्थी के रूप में दाखिला लिया। विषम परिस्थितियों में पढ़ाई बीच में छोड़ पहले कस्टोडियन विभाग व फिर डाकतार विभाग में नौकरी की। बचपन से ही कला, साहित्य एवं संगीत में विशेष रुचि रखने वाले श्यामलाल शर्मा पर पत्नी, पिता, दो पुत्रों तथा भानजे के निधन की निरंतरता से दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। यह दर्द गीत-ग़ज़लों के रूप में रिसने लगा। माहिर बीकानेरी के नाम से जन्मा यह शायर अनायास काका हाथरसी की फुलझड़ियों से बेहद प्रभावित हुआ तथा रस-परिवर्तन के साथ नाम परिवर्तन कर अब अपना ‘अल्हड़पन’ हास्य-व्यंग्य की दुनिया में दिखाना प्रारंभ कर दिया।

प्रसिद्ध रचनाकार गोपाल प्रसाद व्यास के शिष्य बनने के बाद तो अल्हड़ ने काव्य-मंचों पर छंदबद्ध गेय रचनाओं से जो धूम मचाई, उसी रचनाधर्मिता का प्रतिफल रही तमाम कृतियां। साथ ही काका हाथरसी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार, काव्य गौरव सम्मान, ठिठोली पुरस्कार, यथासंभव सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों की उपलब्धियां उनके हिस्से रहीं।

सन‍् 1986 में उन्होंने हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्म ‘छोटी-साली’ का निर्माण करते हुए इसकी कहानी, पटकथा, गीत आदि लिखने के अलावा अनेक प्रभार संभाले। रेवाड़ी-झज्जर मार्ग पर रेवाड़ी से नौ कि.मी. की दूरी पर स्थित गांव बीकानेर अपने आंचल में अल्हड़ जी से जुड़ी अनेक अनमोल स्मृतियां सहेजे है। अल्हड़ जी की शैली में लिखने एवं कहने वाले उनके शिष्य बीकानेरवासी हास्य कवि हलचल हरियाणवी के मानस पटल पर अल्हड़ जी की तमाम यादें अंकित हैं। उनका नाम जुबां पर आते ही, वे उनकी चर्चित चुटकी का जिक्र करना नहीं भूलते, जिसे वे अक्सर अपने परिचय में विभिन्न अवसरों पर लटके-झटके लेकर सुनाया करते थे :-

कैसा क्रूर भाग्य का चक्कर, कैसा विकट समय का फेर।

कहलाते हम बीकानेरी, कभी ना देखा बीकानेर॥

जन्मे ‘बीकानेर’ गांव में, है जो रेवाड़ी के पास।

पर हरियाणा के यारों ने, कभी न डाली हमको घास॥

हास्य-व्यंग्य के कवियों में, लासानी समझे जाते हैं।

हरियाणवी पूत हैं पर- राजस्थानी समझे जाते हैं॥

बीकानेर गांव के बुजुर्गों को आज भी 14 जनवरी, 1981 को अल्हड़ जी के अभिनंदन में बीकानेर गांव में रातभर चला वह कवि-सम्मेलन याद है, जिसमें यहां अल्हड़ जी के सम्मान में अशोक चक्रधर, ओमप्रकाश आदित्य, जैमिनी हरियाणवी, जयंत प्रभाकर, चिरंजीत शर्मा, बिमलेश राजस्थानी जैसे चर्चित हास्य कवियों ने बुधराम कला केंद्र के तत्वावधान में सुबह पांच बजे तक श्रोताओं को बांधे रखा था। उपरोक्त करीब एक दर्जन कृतियों में उनकी अधिकांश रचनाएं हिंदी-उर्दू में हैं, किंतु उन्होंने हरियाणवी फिल्म छोटी साली की बहुआयामी रचनाधर्मिता की तरह अनेक रचनाएं अपनी मां-बोली हरियाणवी में भी लिखीं, जिनमें से अनपढ़ धन्नो, म्हारा बालकपण, लॉटरी वंदना जैसी रचनाएं बेहद चर्चित रहीं। म्हारा बाळकपण नामक रचना में उन्होंने अपने गांव बीकानेर से जुड़ी विभिन्न अनमोल स्मृतियों का ज्यों का त्यों वर्णन किया है, जिसके करीब दो दर्जन पात्रों के संदर्भ में बुजुर्ग आज भी चर्चा करते देखे जा सकते हैं :-

चौमासे में पकी निंबोळी, खूब चर्या करते।

होळी पै रळ-मिलकै सारे सांग भर्या करते।

छिप-छिप कै भाबी दड़कां तै, छेड़ कर्या करते।

ताई मोटळी की छाया तै,

घणे डर्या करते॥

काव्य मंचों पर अपनी हास्य रचनाओं तथा ग़ज़लों से विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करवाकर 17 जून, 2009 को भले ही वे अपनी नश्वर देह त्याग गए, किंतु उनके बहुआयामी योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन उनकी विशिष्ट रचनाधर्मिता पर अभी बहुआयामी शोध कार्य होने बाकी हैं।

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