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आधुनिक तकनीक से बदलेगी खेती की तस्वीर

ग्रामीण बाजार में वृद्धि

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देश के छोटे और सीमान्त किसान वर्तमान में भी आधुनिक खेती की तकनीक अपनाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। छोटे किसान ऑनलाइन खरीदारी में दुनिया से बहुत पीछे हैं। ग्रामीण जनजीवन के करीब 22 फीसदी लोगों की कर्ज के लिए साहूकारों और अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता बनी हुई है।

भारत में ग्रामीण बाजार शहरी बाजार की तुलना में तेज़ गति से बढ़ रहे हैं। हाल ही में 7 जनवरी को वाहन डीलरों के संगठन फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (फाड़ा) की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष 2024 में यात्री वाहनों की बिक्री वृद्धि में ग्रामीण बाजार शहरी बाजार से आगे निकल गया। शहरी बाजारों में यात्री वाहनों की बिक्री 8 फीसदी बढ़ी, वहीं ग्रामीण इलाकों में इसमें 12 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2025 में ग्रामीण बाजारों में कुल 44.7 लाख यात्री वाहन बिके, जबकि साल 2024 में कुल 41 लाख वाहनों की बिक्री हुई।

उल्लेखनीय है कि भारत के ग्रामीण परिवेश से संबंधित अन्य कई रिपोर्टों में रेखांकित हो रहा है कि किसानों की आमदनी बढ़ने से गांवों में खपत बढ़ रही है और इससे ग्रामीण बाजार को रफ्तार मिल रही है। ग्रामीण गरीबी में कमी, छोटे किसानों की साहूकारी कर्ज पर निर्भरता में कमी और किसानों का जीवन स्तर बढ़ने जैसी विभिन्न अनुकूलताओं से ग्रामीण बाजार मजबूती की राह पर आगे बढ़ रहा है। किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संगठन नाबार्ड द्वारा 11 दिसंबर को जारी आठवें चरण के ग्रामीण आर्थिक स्थिति एवं भावना सर्वेक्षण (आरईसीएसएस) में बताया गया है कि देश में पिछले एक साल में ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ने से खर्च करने की क्षमता और इच्छा दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।

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सर्वे के अनुसार 80 फीसदी ग्रामीण परिवारों द्वारा पिछले एक साल में अपनी खपत में वृद्धि की सूचना दी गई है। नाबार्ड के सर्वे के अनुसार, अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में खपत मेें तेज़ी उम्मीद बढ़ाने वाली है। निवेश और औपचारिक ऋण में भी रिकॉर्ड तेजी दर्ज की गई है जो बढ़ती आय के समानुपातिक मानी जा सकती है। 29.3 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने पिछले एक साल में पूंजीगत निवेश (खेती और गैर-खेती दोनों क्षेत्रों में) बढ़ाया है। बैंक, सहकारी संस्थाओं आदि से कर्ज लेने वाले परिवारों का हिस्सा 58.3 प्रतिशत हो गया, जो कि सितंबर 2024 में 48.7 प्रतिशत था। वस्तुतः ग्रामीण भारत के बाजार के तेजी से बढ़ने के पीछे बढ़ती क्रयशक्ति, वास्तविक आय वृद्धि, जीएसटी सुधार, कम महंगाई और सरकारी योजनाओं के ग्रामीण लोगों को मिलते लाभ भी हैं।

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विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण सुधार, बेहतर कृषि उत्पादन, ग्रामीण वेतन वृद्धि, ग्रामीण उपभोग में बढ़ोतरी तथा कर सुधार जैसे घटकों के दम पर भारत के ग्रामीण बाजार तेजी से आगे बढ़े हैं। इसी तरह दुनिया की प्रसिद्ध एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग्स द्वारा प्रकाशित एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट 2025 के मुताबिक ग्रामीण भारत में महंगाई घटने और करों में कटौती से भारत की ग्रामीण खपत में सुधार हुआ है। इसी तरह आरबीआई द्वारा प्रकाशित ग्रामीण उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में 76.7 फीसदी ग्रामीण परिवारों में उपभोग वृद्धि और 39.6 फीसदी परिवारों में आय में वृद्धि सामने आई है। यही नहीं, गरीबी पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में गरीबी कम हुई है।

वर्ष 2019 से शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना देश के छोटे और सीमांत किसानों को वित्तीय मजबूती में सहायक बनी है। देश के गांवों में अप्रैल, 2020 से शुरू की गई पीएम स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीणों को उनकी जमीन का कानूनी हक देकर उनके आर्थिक सशक्तीकरण का नया अध्याय लिखा जा रहा है। गांवों में किसानों को औपचारिक ऋण से जोड़ने के मद्देनजर सरकार द्वारा राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाओं में वृद्धि महत्वपूर्ण है। गांवों में बैंक शाखाओं की संख्या मार्च, 2010 के 33,378 से बढ़कर दिसंबर 2024 तक 56,579 हो गई। साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, सहकारी समितियों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था आदि प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। सरकार ने बीते दशक में फसलों पर दी जाने वाली सब्सिडी और फसल बीमा की राशि को तेजी से बढ़ाया है। भारतीय किसान तेजी से डिजिटल पेमेंट को अपना रहे हैं। वर्ष 2024-25 में भारत में रिकॉर्ड 37.7 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ है तथा देश का कुल कृषि निर्यात 50 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। इन सबके बावजूद देश के छोटे और सीमान्त किसान वर्तमान में भी आधुनिक खेती की तकनीक अपनाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। छोटे किसान ऑनलाइन खरीदारी में दुनिया में बहुत पीछे हैं। ग्रामीण जनजीवन के करीब 22 फीसदी लोगों की कर्ज के लिए साहूकारों और अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता बनी हुई है। यह वर्ग अभी भी ऊंची ब्याज दर पर कर्ज ले रहा है।

ऐसे में गांवों में बैंक शाखा विस्तार के अलावा दूसरे अन्य कदम उठाने की जरूरत है। ग्रामीण ऋण लागत कम करने और विश्वास बढ़ाने के लिए तकनीक का लाभ उठाया जाना होगा। औपचारिक ऋणों के लिए बेहतर प्रोत्साहन और डिजिटल उपकरणों से लैस बैंक प्रतिनिधियों को ग्रामीण परिवारों और संस्थानों के बीच समन्वय का माध्यम बनाया जाना चाहिए। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) की भूमिका को प्रभावी बनाना होगा। गांवों में प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना का तेजी से विस्तार करना होगा, इससे छोटे किसानों की संस्थागत ऋण तक पहुंच बढ़ाई जा सकेगी।

उम्मीद करें कि सरकार देश के ग्रामीण बाजारों के विकास और उन्हें रफ्तार देने के लिए रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ेगी।

लेखक अर्थशास्त्री हैं।

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