क्रूज में विधायक, दरिया में लोकतंत्र : The Dainik Tribune

तिरछी नज़र

क्रूज में विधायक, दरिया में लोकतंत्र

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सौरभ जैन

सौरभ जैन

हमारे यहां कुछ नया हो और लोग सवाल न करें भला ऐसा हो सकता है! ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी वाले देश में एक क्रूज नदी में क्या उतरा कुछ बेचैन आत्माओं ने सवालों के सागर में गोता लगाना शुरू कर दिया। देश की जनता भी टीवी मीडिया की तरह मूल विषयों से भटकने में माहिर हो चुकी है।

ऐसा बेशकीमती क्रूज जिसके दर्शन मात्र से विकास की आंखें चौंधिया जाएं कि खबरें दिखाते हुए एंकर खुशी से नाच रहा था। इतनी खुशी तो उसे घोड़े पर चढ़ने के दौरान भी न हुई थी जितनी अपने रिपोर्टर के जहाज में पैर रखते समय हो रही थी। उत्साह, उमंग और ऊर्जा से न्यूज रूम चमक उठा। लोकतंत्र की 7 दशकों की यात्रा में मानो जैसे यह इकलौती उपलब्धि हो।

लोग आश्चर्यजनक और हैरतअंगेज खबर को लाइव देखते हुए खुद के जीवन को सार्थक करने में लगे रहे। चाय की चुस्की से अधिक गर्मी क्रूज की खबर में थी। अब तक इतनी विशेषताएं बताई जा चुकी थीं कि रियल स्टेट वाले खबर वालों को अपना गुरु मान बैठे थे। खबर वाचक महाशय क्रूज को पानी-पानी कर चले गए मगर मध्य वर्गीय परिवारों में चर्चा का केंद्र बनकर रह गई। ‘क्या हम भी कभी इसमें यात्रा में चलेंगे?’, ‘डायमंड सेट रहने दीजिए अभी बस इसकी यात्रा करवा दीजिये’, ‘अबकी परीक्षा में फर्स्ट आया तो क्रूज का पैकेज लेकर दोगे?’, ‘रिश्ता तो पक्का है लेकिन दहेज में क्रूज का टिकट मांग रहे हैं’ जैसी बातों की साक्षी घरों की दीवारें बन रही थीं।

कुछ नेगेटिव किस्म के लोग सेव एनवायरमेंट जैसी तख्ती लेकर चिल्ला रहे थे। इतने सुंदर क्रूज की जगह इन्हें पर्यावरण की पड़ी थी। क्या यह नहीं जानते कि इस दौर में पर्यावरण संरक्षण के आयोजन के स्पॉन्सर भी पटाखे वाले होते हैं। नशामुक्ति कार्यक्रम में बजट की व्यवस्था के लिए शराब बेचकर राजस्व जुटाया जाता है। इतना ही नहीं कीटनाशक से उत्पादन के लाभ बताने वाले अपने घरों में जैविक सब्जियां ही खाते हैं। इसी तर्ज पर क्रूज से जो पैसा जुटाया जाए, उसे गंगा के संरक्षण पर खर्च करना तय किया हो!

गंगा ने कोरोना में लाशें देखी थी, तब गंगा रो दी थी। गंगा आज विशाल क्रूज देख रही है। आज भी हम उसके आंसू नहीं देख पा रहे हैं। डॉल्फिन को तो धरना देना नहीं आता। पर्यावरण की खबरों की कोई टीआरपी भी नहीं होती। अब सवाल यह है कि विनाश की नींव पर विलास क्यों शुरू किया गया है? इसका जवाब होगा शायद एक दिन क्रूज में घूमने के बहाने ही सही माल्या बाबू स्वदेश वापसी कर ले। यह नहीं हुआ तो लोकतंत्र में संकट आने पर माननीयों को जरूर क्रूज में सवार कर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया जा सकेगा।

हमारे यहां कुछ नया हो और लोग सवाल न करें भला ऐसा हो सकता है! ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी वाले देश में एक क्रूज नदी में क्या उतरा कुछ बेचैन आत्माओं ने सवालों के सागर में गोता लगाना शुरू कर दिया। देश की जनता भी टीवी मीडिया की तरह मूल विषयों से भटकने में माहिर हो चुकी है।

ऐसा बेशकीमती क्रूज जिसके दर्शन मात्र से विकास की आंखें चौंधिया जाएं कि खबरें दिखाते हुए एंकर खुशी से नाच रहा था। इतनी खुशी तो उसे घोड़े पर चढ़ने के दौरान भी न हुई थी जितनी अपने रिपोर्टर के जहाज में पैर रखते समय हो रही थी। उत्साह, उमंग और ऊर्जा से न्यूज रूम चमक उठा। लोकतंत्र की 7 दशकों की यात्रा में मानो जैसे यह इकलौती उपलब्धि हो।

लोग आश्चर्यजनक और हैरतअंगेज खबर को लाइव देखते हुए खुद के जीवन को सार्थक करने में लगे रहे। चाय की चुस्की से अधिक गर्मी क्रूज की खबर में थी। अब तक इतनी विशेषताएं बताई जा चुकी थीं कि रियल स्टेट वाले खबर वालों को अपना गुरु मान बैठे थे। खबर वाचक महाशय क्रूज को पानी-पानी कर चले गए मगर मध्य वर्गीय परिवारों में चर्चा का केंद्र बनकर रह गई। ‘क्या हम भी कभी इसमें यात्रा में चलेंगे?’, ‘डायमंड सेट रहने दीजिए अभी बस इसकी यात्रा करवा दीजिये’, ‘अबकी परीक्षा में फर्स्ट आया तो क्रूज का पैकेज लेकर दोगे?’, ‘रिश्ता तो पक्का है लेकिन दहेज में क्रूज का टिकट मांग रहे हैं’ जैसी बातों की साक्षी घरों की दीवारें बन रही थीं।

कुछ नेगेटिव किस्म के लोग सेव एनवायरमेंट जैसी तख्ती लेकर चिल्ला रहे थे। इतने सुंदर क्रूज की जगह इन्हें पर्यावरण की पड़ी थी। क्या यह नहीं जानते कि इस दौर में पर्यावरण संरक्षण के आयोजन के स्पॉन्सर भी पटाखे वाले होते हैं। नशामुक्ति कार्यक्रम में बजट की व्यवस्था के लिए शराब बेचकर राजस्व जुटाया जाता है। इतना ही नहीं कीटनाशक से उत्पादन के लाभ बताने वाले अपने घरों में जैविक सब्जियां ही खाते हैं। इसी तर्ज पर क्रूज से जो पैसा जुटाया जाए, उसे गंगा के संरक्षण पर खर्च करना तय किया हो!

गंगा ने कोरोना में लाशें देखी थी, तब गंगा रो दी थी। गंगा आज विशाल क्रूज देख रही है। आज भी हम उसके आंसू नहीं देख पा रहे हैं। डॉल्फिन को तो धरना देना नहीं आता। पर्यावरण की खबरों की कोई टीआरपी भी नहीं होती। अब सवाल यह है कि विनाश की नींव पर विलास क्यों शुरू किया गया है? इसका जवाब होगा शायद एक दिन क्रूज में घूमने के बहाने ही सही माल्या बाबू स्वदेश वापसी कर ले। यह नहीं हुआ तो लोकतंत्र में संकट आने पर माननीयों को जरूर क्रूज में सवार कर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया जा सकेगा।

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