आती-जाती लहरों से बौराया मन

तिरछी नज़र

आती-जाती लहरों से बौराया मन

भूपेन्द्र भारतीय

भूपेन्द्र भारतीय

हमारे उत्सव प्रधान देश में हर बात पर उत्साह से उत्सव मनाना जरूरी है। यदि हम ऐसा न करें तो हमें किसी भी काम को करने में मज़ा नहीं आता। भले किसी के बालक का मुंडन संस्कार हो या फिर हमारी गाय को बछड़ा हुआ हो या फिर पड़ोसी देश की क्रिकेट टीम मैच में हमसे हारी हो। कुछ तो गाजा-बाजा बजना ही चाहिए! हम तो आपदा में भी उत्सव का अवसर निकाल ही लेते हैं। हमें कोई न कोई आयोजन करना ही होता है। आखिर हम उत्सव प्रेमी जो ठहरे।

ऐसे ही उत्सव रूपी आयोजनों की ‘लहरें’ हमारे यहां सालभर आती-जाती रहती हैं। कोरोना की लहरें तो पिछले दो साल से आ रही हैं लेकिन हमारे भारतवर्ष में हजारों सालों से जाने कितनी लहरें आती-जाती रही हैं। कभी ज्ञान की लहर आई थी, तो कभी-कभी अज्ञान की भी तगड़ी लहर आती रही है। कभी विदेशी यात्रियों की लहर आई और उनके पीछे बाहरी लुटेरों का भी काफिला घुस आया। कभी धर्मनिरपेक्षता की लहर आती है और अधर्म का बवंडर खड़ा कर जाती है। सदियों पहले धर्म परिवर्तन की लहर आई जो अब तक भी देखी जा सकती है। लहरों के हम जनक हैं! हमने ही आधुनिक युग को ‘भ्रष्टाचार लहर’ से लाभान्वित किया है। कभी हमारे गांवों में दूध-दही की धाराप्रवाह लहर रहती थी और आज है कि हर गांव में देशी शराब व रासायनिक दवाइयों की लहर से वर्तमान पीढ़ी पिलपिला कर लपलपा रही है।

बहुत बार ऐसा लगता है कि ‘जा रही है यह लहर भी’ पर फिर कोई नयी लहर जन्म लेती है। लगता है हमारे यहां लहरों के लिए सबसे ज्यादा ऊपजाउ भूमि है। ‘भले नयी लहरों के बीज देश के बाहर से आये, पर हम इन लहरों को सिंचित-पोषित-पुष्पित करने में बड़े जुगाड़ी हैं।’ और क्यों न हों! जुगाड़ी होने की विश्व ख्याति से हमें ही मनोनीत किया गया है। हम जिस ओर चल दें, लहरें अपने-आप बनने लगती हैं।

‘लहरों पर सवार होना’, हमें बचपन से सिखाया जाता है। कभी होनहार बालक बनने की लहर पर, तो कभी कामयाब युवा होने के लिए लहरों में धकेल दिया जाता है। पिछले दिनों ऐसी लहर आई कि उसके कारण अब तक शोक-संवेदनाओं की लहर चल रही है। वहीं शोक-संवेदनाओं की लहर को माननीयों ने ऐसा लपका कि उसके कारण गांवों-कस्बों में अब तक राजनीतिक बवंडर चल रहे हैं। वहीं स्वतंत्रता के बाद से आज तक ‘विकास’ की लहर चलाने के भी वादे होते आए हैं! लेकिन विकास की लहर का हम अब तक इंतज़ार कर रहे हैं।

विगत दिनों दूसरी लहर में लॉकडाउन के कारण अपने ही घर में घिर गई जनता अब घर से ऐसे निकल रही है, मानो पर्यटन और सैर-सपाटे के लिए जैसे कोई सरकारी आदेश निकला हो और यही भोली जनता उस आदेश का ईमानदारी से पालन कर रही हो! हमारे देश की सड़कों, चौराहों, सरकारी भवनों के आसपास प्रतिदिन ऐसी कोई न कोई ‘जन-मन-गण की लहर’ बैठती-उठती-दौड़ती ही रहती है। प्रतिदिन समाचार पत्रों व सूत्रों के हवाले से आई खबरों में नित-नयी लहरों की तूफानी जानकारी रहती है।

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