इस प्रावधान का उद्देश्य है किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में समता, न्याय और समावेशन को सुनिश्चित करना।
यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संसदीय समिति की सिफारिशों के आधार पर यूजीसी ने इस संबंध में समिति के गठन हेतु अधिसूचना जारी की है। यह पहल किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से सामने आ रही सामाजिक विसंगतियों और न्यायिक हस्तक्षेप का नतीजा है।
यूजीसी ने फरवरी, 2025 में ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ का मसौदा जारी किया था। इसके बाद यह मसौदा संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया, जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने की। 8 दिसंबर, 2025 को समिति ने संसद में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह स्पष्ट किया गया कि देश के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में केवल एससी और एसटी ही नहीं, बल्कि ओबीसी विद्यार्थियों के साथ भी जातिगत भेदभाव की घटनाएं बढ़ी हैं। इन सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के आधार पर 13 जनवरी, 2026 को यह विनियम राजपत्र में प्रकाशित हुआ और 15 जनवरी, 2026 से पूरे देश में लागू कर दिया गया।
इस प्रावधान का उद्देश्य स्पष्ट और संवैधानिक है—धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान अथवा दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में समता, न्याय और समावेशन को सुनिश्चित करना। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन वर्गों के लिए बनाई गई है, जिनके साथ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और संस्थागत स्तर पर अन्याय होता रहा है।
इसके बावजूद इस प्रावधान का विरोध किया जा रहा है। विरोध करने वालों का प्रमुख तर्क यह है कि इस समिति में ‘जनरल कैटेगरी’ को शामिल नहीं किया गया, इसलिए यह नियम भेदभावपूर्ण है। लेकिन यह प्रश्न विचारणीय है कि जाति-आधारित भेदभाव सामान्य वर्ग के साथ किस प्रकार होता है। जब देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, प्राचार्य और कुलपति पदों पर लगभग 97 प्रतिशत प्रतिनिधित्व उन्हीं वर्गों का है, तब निर्णय, मूल्यांकन और प्रशासनिक सत्ता पहले से ही उनके हाथों में है। ऐसे में उनके साथ जातिगत उत्पीड़न की आशंका वस्तुतः तथ्य से अधिक आशंका और भ्रम पर आधारित प्रतीत होती है।
विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव के दुष्परिणामों का इतिहास नया नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अपने अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा था— ‘मेरा जन्म ही एक दुर्घटना था।’ इसके बाद पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे कई मामले सामने आए। ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं, जहां शिक्षा के केंद्र ही उत्पीड़न के स्थल बनते चले गए।
यह भी एक भ्रांति फैलाई जा रही है कि यदि कोई ओबीसी विद्यार्थी किसी एससी या एसटी विद्यार्थी के साथ भेदभाव करेगा, तो उस पर कार्रवाई नहीं होगी। विनियम इस संदर्भ में पूरी तरह स्पष्ट है। किसी भी वर्ग के व्यक्ति द्वारा किया गया जाति-आधारित भेदभाव जांच के दायरे में आएगा। समिति का उद्देश्य किसी को पूर्वाग्रह के आधार पर दोषी ठहराना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित करना है।
समिति की संरचना भी संतुलित और प्रतिनिधिक रखी गई है। इसमें संस्थान प्रमुख पदेन अध्यक्ष होंगे, वरिष्ठ संकाय सदस्य, कर्मचारी प्रतिनिधि, नागरिक समाज के प्रतिनिधि, छात्र प्रतिनिधि और सचिव शामिल होंगे। साथ ही यह अनिवार्य किया गया है कि समिति में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांगजन और महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व हो। यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है ताकि निर्णय प्रक्रिया समावेशी और एकतरफा प्रभाव से मुक्त रहे।
विरोध का एक और तर्क संभावित ‘दुरुपयोग’ को लेकर दिया जा रहा है। किंतु यह तर्क स्वयं में कमजोर है। महिलाओं के लिए बने कानूनों, श्रम कानूनों या आतंकवाद विरोधी कानूनों के दुरुपयोग की आशंका के बावजूद उन्हें समाप्त नहीं किया गया। किसी कानून के संभावित दुरुपयोग के डर से न्याय के रास्ते बंद कर देना स्वयं अन्याय को बढ़ावा देना है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन समुदायों के विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए यह प्रावधान बनाया गया है, उनमें इसके प्रति पर्याप्त जागरूकता नहीं है। दूसरी ओर, सांस्कृतिक और संस्थागत वर्चस्व रखने वाले वर्ग संगठित रूप से मीडिया, सोशल मीडिया और न्यायिक मंचों पर इसका विरोध कर रहे हैं। यह प्रावधान कोई ‘काला कानून’ नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता और गरिमा के मूल्यों को व्यवहार में उतारने का प्रयास है। जैसे कार्यस्थलों और शिक्षण संस्थानों में महिलाओं के लिए वूमेन सेल आवश्यक माने जाते हैं, उसी प्रकार जातिगत भेदभाव से पीड़ित वर्गों के लिए यह समिति आवश्यक है। यदि आज इसे कमजोर किया गया, तो भविष्य में फिर किसी रोहित, किसी पायल या किसी दर्शन को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। वक्त की मांग है कि हम न्याय, समानता और समावेशन के पक्ष में खड़े होकर भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित-समान अवसरों वाले भविष्य सुनिश्चित करें।

