नेता राजनीति छोड़ता नहीं है, बस थोड़ा पीछे खड़ा हो जाता है—ताकि ज़रूरत पड़ने पर यह याद दिलाया जा सके कि उसने कभी कुर्सी ठुकराई थी। राजनीति में यही याददाश्त सबसे बड़ा निवेश है।
भारतीय लोकतंत्र में नेता राजनीति तब छोड़ता है जब उसे लगने लगने लगता है कि अब राजनीति उसके बस की नहीं रही, या तब जब यह साफ़ हो जाए कि अब आगे कुछ मिलने वाला नहीं है। यानी राजनीति में त्याग भावना नहीं, नेता जी की सुविधाओं की गणना का नतीजा होता है। जैसे ही अगली कुर्सी पाने को लेकर शक होने लगता है, त्याग अचानक सम्मान बन जाता है।
भारतीय राजनीति में त्याग हमेशा सुरक्षित समय पर किया जाता है। जीत के बाद त्याग बेवकूफी माना जाता है और टिकट मिलने से पहले त्याग आत्मघाती होता है। सही त्याग वही होता है, जिसमें न पार्टी असहज हो और न नेता अपमानित दिखे।
हाल ही में एक वरिष्ठ नेता ने ऊपरी सदन का चुनाव न लड़ने की घोषणा की। कहने को तो शब्द कम थे, लेकिन उन शब्दों में संदेश बड़ा निहित था। सार्वजनिक बयान में कहा गया—अब इसकी ज़रूरत नहीं। राजनीति में ‘ज़रूरत’ वही चीज़ है, जो सबसे पहले खत्म होती है और सबसे बाद में मानी जाती है।
ऊपरी सदन अब राजनीति का आरामघर बन चुका है। जो चुनावी भीड़ से घबराता है, जिसे ज़मीनी लड़ाई भारी लगती है या जिसे पार्टी सम्मान के साथ किनारे करना चाहती है—उसके लिए यही सुगम रास्ता चुना जाता है। ऐसे में इस कुर्सी से इनकार करना त्याग से ज़्यादा समय की पहचान लगता है।
वास्तव में देखा जाए तो इस तरह के त्याग में न कोई जोखिम था, न कोई संघर्ष। न ही हार का डर, न जीत की उम्मीद। बस एक बयान और उसके चारों ओर नैतिकता। समर्थकों ने इसे राजनीति में अनुकरणीय आदर्श कहा, वहीं दूसरी ओर विरोधियों ने मजबूरी की संज्ञा दे दी। आम आदमी ने इसे भी बयान समझकर छोड़ दिया—क्योंकि बयान से न महंगाई घटती है, न रोज़गार बढ़ता है।
कहा जाता है कि ऐसे फैसले नई पीढ़ी के लिए जगह बनाते हैं। हकीकत यह है कि राजनीति में जगह बयान से नहीं, खाली कुर्सी से बनती है। वैसे हकीकत तो यही है कि अक्सर कुर्सी खाली होने से पहले ही तय हो जाता है कि उस पर अगला बैठेगा कौन। सबसे दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि चुनाव क्यों नहीं लड़ा गया, बल्कि यह है कि इसकी घोषणा क्यों ज़रूरी थी। असली त्याग चुपचाप होता है, लेकिन राजनीति में चुप रहना सबसे मुश्किल काम है।
अंत में नेता राजनीति छोड़ता नहीं है, बस थोड़ा पीछे खड़ा हो जाता है—ताकि ज़रूरत पड़ने पर यह याद दिलाया जा सके कि उसने कभी कुर्सी ठुकराई थी। राजनीति में यही याददाश्त सबसे बड़ा निवेश है।

