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अच्छी-सच्ची पत्रकारिता की कसौटी पर खरे उतरे मार्क

किसी भी पत्रकार के लिए मार्क टली जैसा विश्वास पाना किसी तमगे से कम नहीं है। वैसे उन्हें तमगे भी कम नहीं मिले– भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया और इंग्लैंड की महारानी ने उन्हें...

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किसी भी पत्रकार के लिए मार्क टली जैसा विश्वास पाना किसी तमगे से कम नहीं है। वैसे उन्हें तमगे भी कम नहीं मिले– भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया और इंग्लैंड की महारानी ने उन्हें ‘सर’ का खिताब दिया।

यह मेरा दुर्भाग्य ही है कि मुझे बीबीसी के भारत स्थित संवाददाता स्वर्गीय मार्क टली से मिलने का कभी अवसर नहीं मिला, पर हकीकत यह भी है कि मैं पिछले चार-पांच दशकों में उनसे अक्सर मिलता रहा हूं। यह मिलना बीबीसी रेडियो के माध्यम से होता था। दशकों से रेडियो बीबीसी विश्वसनीय खबरों का एक पर्याय बन चुका हुआ था, और मेरे जैसे लाखों-करोड़ों श्रोता बीबीसी के माध्यम से ही खबरों की विश्वसनीयता परखा करते थे। बीबीसी को यह श्रेय जहां संस्थान की रीति-नीति के कारण मिलता था, वहीं सर मार्क टली जैसे सजग और ईमानदार पत्रकारों ने बीबीसी की विश्वसनीयता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

आज मार्क टली हमारे बीच नहीं हैं। भारत में ही जन्मे सर टली के निधन से ईमानदार पत्रकारिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण हमारे बीच से उठकर चला गया। वे चाहते थे कि उनका निधन भारत में ही हो और यह संयोग मात्र नहीं है कि भारत के बनते इतिहास का यह साक्षी अपनी जन्मभूमि से ही विदा हुआ। आज जब रेडियो के माध्यम से समय की सच्चाई जानने वाले श्रोता उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, तो उस व्यक्ति के साथ ही उस पत्रकारिता की बात भी होनी चाहिए, जिसके लिए वह जाना जाता रहा। और यह अवसर इस बात का भी है कि हम पत्रकारिता, विशेषकर भारत की पत्रकारिता के बारे में भी सोचें, यह आकलन करने की कोशिश करें कि आज हमारी पत्रकारिता की स्थिति क्या है, और जैसी है, वैसी क्यों है?

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अच्छी और सच्ची पत्रकारिता की शायद सबसे बड़ी कसौटी यह है कि विश्वसनीयता के संदर्भ में वह कहां ठहरती है। था एक ज़माना जब यह माना जाता था कि अखबार में यदि कुछ छपा है तो वह सही ही होगा, जो अखबार जितनी ज़्यादा तटस्थ और सही खबरें देता था, वह उतना ही बेहतर माना जाता था। अब जबकि अखबार के साथ टेलीविजन और सोशल मीडिया भी खबरों की दुनिया का हिस्सा, प्रमुख हिस्सा कहा जाना चाहिए, बन गया है, तो विश्वसनीयता का महत्व और बढ़ जाता है। जिसकी जितनी ज़्यादा पहुंच है, उससे उतनी ही ज़्यादा ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। यह ईमानदारी ही मीडिया के कद को नापती है।

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मुझे याद है जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या हुई तो राजीव गांधी दिल्ली से बाहर (बंगाल में) थे। तब उन्होंने बीबीसी रेडियो के माध्यम से ही समाचार की पुष्टि की थी। ज्ञातव्य है कि ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) ने तो शाम छह बजे तक उनकी मृत्यु की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी। कारण कुछ भी बताये जायें, पर यह हकीकत अपनी जगह है कि राजीव गांधी को तब इंग्लैंड का बीबीसी रेडियो ही विश्वसनीय लगा था। यह तथ्य जहां बीबीसी के महत्व को दर्शाता है, वहीं इस बात को भी रेखांकित करता है कि मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। यह दुर्भाग्य ही है कि आज हमारा रेडियो सरकारी सूचनाओं का भोंपू बनकर रह गया है! दुर्भाग्य यह भी है कि आज हमारे मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विश्वसनीयता के संकट का शिकार हो गया है।

लगभग आधी सदी पहले जब 1975 में देश में आपातकाल लागू किया गया था तो उसका सबसे बुरा असर मीडिया पर ही पड़ा था। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गयी थी, कुछ भी छापने से पहले सरकारी एजेंसियों से अनुमति लेनी होती थी। उस कठिन समय में जिन गिने-चुने साहसी पत्रकारों ने सरकार के इस आदेश का पालन करने से इनकार किया, उनमें बीबीसी रेडियो के भारत स्थित संवाददाता मार्क टली का नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जाता है। तब उन्हें चौबीस घंटे में भारत छोड़कर जाने का आदेश तत्कालीन सरकार ने दिया था। सरकार के आगे घुटने टेकने के बजाय मार्क टली ने अपने देश लौट जाना बेहतर समझा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और पत्रकारिता की विश्वसनीयता को बनाये रखने के लिए वे इंग्लैंड लौट गये। पर सरकार उनकी वाणी पर प्रतिबंध नहीं लगा पायी थी। लंदन में रहते हुए भी वह भारत स्थित अपने सूत्रों से सही सूचनाएं प्राप्त करते रहे— भारत समेत दुनिया भर के श्रोताओं तक उन्हें पहुंचाते रहे।

यह सही है कि उस काल की भारत की पत्रकारिता पर अपयश के काले धब्बे लगे थे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तब कहा था, ‘जब हमारे पत्रकारों को घुटने टेकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे थे।’ पर सच यह भी है कि उस स्थिति के लिए सिर्फ पत्रकार ही दोषी नहीं थे, पत्रकारों से कहीं ज़्यादा डर तब मीडिया-मालिकों, प्रबंधकों को था। लेकिन यह कथित विवशता आपातकाल में हमारी पत्रकारिता पर लगे धब्बों को नहीं मिटा सकती। दुर्भाग्य की बात तो यह भी है कि आज भी हमारी पत्रकारिता पर विश्वसनीयता का संकट मंडरा रहा है। मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा आज ‘गोदी मीडिया’ कहलाता है। यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है।

बीबीसी से सेवानिवृत्त होने के बाद भी मार्क टली ने भारत को ही अपना देश बनाया। वे भारत और भारत की चुनौतियों को अच्छी तरह समझते थे, और उनका मानना था कि जनता तक सही और समुचित जानकारी पहुंचाना पत्रकारिता का दायित्व है। उनका स्पष्ट कहना था कि पत्रकारिता का एक ही नियम है– अपने आप से यह पूछिए कि कोई आप पर क्यों विश्वास करता रहे। यदि आप दिमाग में यह सवाल बनाए रखेंगे तो स्वयं ही पता चल जाएगा कि आप रिपोर्ट कैसे करें। एक बार यदि विश्वास टूट जाये तो फिर से प्राप्त करना लगभग असंभव है। जितना आप सत्ता के निकट रहेंगे, इस विश्वास पर उतना अधिक जंग लगेगा।

पत्रकार टली सत्ता के नहीं, जनता के निकट रहना पसंद करते थे। उनकी संवेदना जनता के ही निकट रहती थी, पर इस बात का भी ध्यान उन्हें हमेशा रहा कि संवेदना भावुकता का रूप न ले ले। जनता से उनकी निकटता का यह परिणाम था कि जनता के मूड या भावना को वह आसानी से समझ जाते थे। उनके साथी पत्रकार अक्सर उनके इस गुण की चर्चा किया करते थे। यह जनता से उनकी निकटता का ही परिणाम (या प्रमाण) है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक दौरे के दौरान एक ग्रामीण ने उनके साथियों से कहा ‘टली साहब कह रहे हैं तो सच ही होगा!’ किसी भी पत्रकार के लिए इस तरह का विश्वास पाना अपने आप में किसी तमगे से कम नहीं है। वैसे उन्हें तमगे भी कम नहीं मिले– भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया और इंग्लैंड की महारानी ने उन्हें ‘सर’ का खिताब दिया। दो सरकारों द्वारा इस तरह से सम्मानित करना अपने आप में एक विशेष उपलब्धि से कम नहीं है, पर सर मार्क टली के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार अपने पाठकों-श्रोताओं का विश्वास प्राप्त करना था। इस तरह विश्वास अर्जित करने वाले पत्रकार कम ही होते हैं। यह विश्वास ही सच्ची-अच्छी पत्रकारिता की पहचान है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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