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दांत किटकिटाते आम और दांत निपोरते खास

तिरछी नज़र

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वे हंसे थे यह दिखाते हुए कि मैं चाहे यह करूं, मैं चाहे वो करूं। मेरी मर्जी। वे एक संप्रभु राज्य की बेबसी पर हंसे थे कि उसके चोर-दरवाजों से हम किस खूबी से निकल भागे हैं।

देखो जी, जिस तरह की शीतलहर चल रही है, उसमें तो हंसने की बजाय दांत किटकिटाने की संभावना ही ज्यादा है। लेकिन बेशर्मों पर बेशरमाई इस कदर सवार रहती है कि वे हंसने के नाम पर कभी दांत दिखाने लगते हैं, जिसे अगर हरियाणवी अंदाज में कहें तो दांत फाड़ना भी कह सकते हैं। लेकिन जब थू-थू होने लगती है तो वे दांत निपोरने भी लगते हैं। ललित मोदी और विजय माल्या ने इसी तरह पहले तो दांत फाड़े और फिर दांत निपोरने लगे हैं। उन्होंने पार्टी करते और बेशर्मी दिखाते हुए पहले तो अपनी महानता का बखान किया, जिसे अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना ही कहा जा सकता है। उन्होंने अपने आपको भारत के महान भगोड़े बताया और हंसे। वे उस तरह से नहीं हंसे थे जैसे बलात्कारी सेंगर, जेल जाते हुए हंसा था। वे तो भारतीय गणराज्य पर, यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर, अदालती प्रक्रिया पर, कानून के चोर-दरवाजों पर, कानूनी ढील-ढिलाई पर और भी न जाने किस-किस पर हंसे थे।

वे हंसे थे अपना यह अहंकार दिखाते हुए कि हम इस मुल्क की दौलत लूटकर भागे, बताओ तुमने हमारा क्या बिगाड़ लिया? वे हंसे थे अपनी कुटिलता और अपनी धूर्तता पर कि देखो हमने तुम्हें कितनी सफाई से लूटा। वे सिर्फ अपने भ्रष्ट आचरण पर नहीं हंसे थे, वे देश में व्याप्त उस भ्रष्टाचार पर भी हंसे थे, जिसके चलते उन्हें इतने बड़े-बड़े कर्ज मिले और जिसके चलते वे अपने सैकड़ों नहीं तो दर्जनों तो अवश्य ही, सूटकेसों को हवाई जहाजों में लाद-लाद कर विदेश भाग गए और अब वहां आराम से पार्टियां कर रहे हैं।

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वे हंसे थे इस देश की मेहनतकश, लेकिन गरीब जनता पर कि देखो मेहनत से तो रोटी भी नहीं कमाई जा सकती, लेकिन बेईमानी से विदेशों में ऐश की जा सकती है। जब चाहे पार्टी करो। जब चाहे बीमार हो जाओ। जब चाहो अदालत का सहारा लेकर अपना प्रत्यर्पण रोके रहो और जब चाहे पोडकास्ट करके सरकार को कटघरे में खड़ा कर दो। वे हंसे थे यह दिखाते हुए कि मैं चाहे यह करूं, मैं चाहे वो करूं। मेरी मर्जी। वे एक संप्रभु राज्य की बेबसी पर हंसे थे कि उसके चोर-दरवाजों से हम किस खूबी से निकल भागे हैं।

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वे हंसे थे उस समर्थन पर, जो लुके-छुपे ढंग से राजनीतिक हलकों से, नौकरशाही से, न्यायिक व्यवस्था से उन्हें मिलता रहा है। और वे शायद इसलिए भी हंसे थे कि यह समर्थन उन्हें आगे भी मिलता रहेगा। वे अपनी चालाकी, अपनी बेशर्मी, अपनी बेईमानी, अपनी कुटिलता, अपनी धूर्तता और अपनी ठसक पर इतराते हुए हंसे थे। वे हंसे थे इस देश की नासमझी पर, लापरवाही पर और उदासीनता पर। लेकिन फिर जब डरे तो उन्होंने दांत भी निपोरे। देखा ना? नहीं?

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