जलभराव में तैराकी के नए खिलाड़ी तैयार होंगे, मत्स्यपालन की संभावनाएं बढ़ेंगी और पर्यटन विभाग चाहे तो ‘गुरुग्राम मानसून नौका विहार योजना’ भी शुरू कर सकता है।
‘इन्हीं बरसातों में तुमसे मिले हम साजन, हमसे मिले तुम बरसात में...’ शैलेन्द्र का यह गीत ‘बरसात’ फिल्म में आया था और खूब लोकप्रिय हुआ था। लेकिन गुरुग्राम में बरसात का अपना ही महत्व है। यहां हर बरसात कुछ ऐसी यादें छोड़ जाती है जिन्हें लोग जिंदगी भर नहीं भूलते। बरसात आते ही पूरा क्षेत्र प्रकृति और अभियांत्रिकी के संयुक्त प्रदर्शन में बदल जाता है। साइबर सिटी या मिलेनियम सिटी गुरुग्राम सभी शहरों का गुरु साबित हो जाता है।
यदि आपने बरसात के दिनों में गुरुग्राम की यात्रा नहीं की है तो समझिए आप हमारे आधुनिक विकास के कुछ अद्भुत नमूनों से वंचित हैं। संभव है कि यात्रा के दौरान आपकी नजर सड़क, गड्ढों और सामने से आती गाड़ियों पर रही हो और आपने आसपास की स्थापत्य कला पर ध्यान ही न दिया हो।
वैसे ‘बरसात’ शब्द भी अब कई दूसरे शब्दों—यथा संस्कार, सहिष्णुता, दया, सेवा आदि—की तरह धीरे-धीरे किताबों तक सीमित होता जा रहा है। लेकिन जब बादल मेहरबान होते हैं, तब पानी बरसता है। और जब मेहरबानी की अति होती है, तब बादल फट पड़ते हैं। यही वह समय होता है जब गुरुग्राम की अभियांत्रिकी प्रतिभा अपने पूरे वैभव के साथ सामने आती है। देश में इतने अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज होने का शायद यह सबसे बड़ा लाभ है।
थोड़ी-सी बरसात होने पर भी ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति ने वहीं जलप्रपात स्थापित कर दिया हो। ऊपर सड़क, नीचे जलप्रपात—विकास और प्रकृति का ऐसा अद्भुत समन्वय स्विट्ज़रलैंड में भी कहां मिलेगा!
नीचे की सड़क पर पानी जमा होकर कुछ ही देर में कृत्रिम जलाशय का रूप ले लेता है। रात में या छुट्टी के दिन जब यातायात कम हो, तब इच्छुक नागरिक इसमें तैराकी का अभ्यास भी कर देश को रिकॉर्ड-तोड़ तैराक उपलब्ध करवा सकते हैं। बाकी समय गाड़ियां ही इस जलाशय में तैरने का प्रयास करती दिखाई देती हैं।
इससे देश को खेलों में भी लाभ हो सकता है। जलभराव में तैराकी के नए खिलाड़ी तैयार होंगे, मत्स्यपालन की संभावनाएं बढ़ेंगी और पर्यटन विभाग चाहे तो ‘गुरुग्राम मानसून नौका विहार योजना’ भी शुरू कर सकता है। इससे स्थानीय नाविकों को रोजगार मिलेगा और जनता को जलभराव को कोसने के बजाय उसका आनंद लेने की आदत पड़ेगी।
तो अगली बरसात में गुरुग्राम आइए। सड़क पर चलिए, जलप्रपात देखिए, कृत्रिम झीलों का आनंद लीजिए और हमारी अभियांत्रिकी प्रतिभा को नमन कीजिए। बस इतना ध्यान रखिए कि यदि यात्रा रात में हो तो गीत जरूर गुनगुनाइए— ‘जिंदगी भर नहीं भूलेंगे, वो बरसात की रात...’ क्योंकि यहां बरसात केवल होती नहीं है, यादगार बनाई जाती है।

