मुद्दा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख और जनता के भरोसे को बचाए रखने का है और चुनाव आयोग के इस प्रकरण ने कम-से-कम इतना तो बता ही दिया है कि यदि ईमानदारी से कोशिश की जाए, तो इस दिशा में निश्चित रूप से कुछ उल्लेखनीय किया जा सकता है।
एक था ज़माना, जब भारत के चुनाव आयोग का डंका सारी दुनिया में बजता था। हमारे चुनाव आयुक्तों को दुनिया के अलग-अलग देशों में बुलाया जाता था, ताकि वे वहां जाकर निष्पक्ष चुनाव कराने के तौर-तरीके समझा सकें। और आज यह स्थिति हो गई है कि हमारा अपना चुनाव आयोग कटघरे में है। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में हुए एक खुलासे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर-तरीके और चुनाव आयोग की निष्पक्षता, दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है। लेकिन, विडंबना यह भी है कि जहां एक ओर मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगा जा रहा है, वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान—भारत रत्न—से विभूषित करने की मांग कर रहा है। यह परस्पर विरोधी स्थिति देश की चिंता का विषय होनी चाहिए। चुनाव आयोग जैसे संस्थान का निष्पक्ष होना ही नहीं, निष्पक्ष दिखना भी ज़रूरी है। आज जो कुछ दिख रहा है, वह इस संदर्भ में आश्वस्त तो नहीं ही करता। गेंद आयोग के पाले में है और उसे ही अपनी विश्वसनीयता प्रमाणित करनी होगी। यह काम कब होता है और कैसे होता है, इस पर देश की निगाहें लगी हैं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता वाले इस प्रकरण ने एक और ज़रूरी मुद्दे को भी चर्चा का विषय बना दिया है—यह मुद्दा प्रेस या मीडिया की विश्वसनीयता का है। विश्वसनीयता मीडिया की सबसे बड़ी ताकत है और यह एक चिंताजनक सच्चाई है कि हमारा मीडिया विश्वसनीयता के तराजू पर खरा उतरने में लगातार कमज़ोर सिद्ध हो रहा है। जहां एक ओर मीडिया कुछ निहित स्वार्थों का शिकार बनता दिख रहा है, वहीं मीडिया के एक वर्ग पर सरकार की गोद में बैठने का आरोप भी है और स्थिति यह बन गई है कि देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ‘गोदी मीडिया’ के नाम से जाना जा रहा है!
इसी स्थिति का परिणाम है कि आज हमारे मीडिया के समक्ष अपनी साख की रक्षा करना एक चुनौती बना हुआ है और प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों ही क्षेत्रों में स्थिति बिगड़ती नज़र आ रही है। ऐसे में, जब चुनाव आयोग के कथित ‘घोटाले’ का समाचार सामने आया, तो मीडिया की दुनिया में एक हलचल-सी मच गई। कुछ लोगों को इसमें मीडिया के लिए उम्मीदों की किरण दिखाई देने लगी है। यह अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि कम-से-कम एक अखबार ने कुछ ऐसा कर दिखाया, जिससे मीडिया की विश्वसनीयता का मुद्दा उभरकर सामने आया है। चुनाव आयोग में गड़बड़ी को उजागर करने वाला समाचार अखबार और संवाददाता, दोनों के प्रयास को साहसिक बनाता है। मुद्दा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख और जनता के भरोसे को बचाए रखने का है और चुनाव आयोग के इस प्रकरण ने कम-से-कम इतना तो बता ही दिया है कि यदि ईमानदारी से कोशिश की जाए, तो इस दिशा में निश्चित रूप से कुछ उल्लेखनीय किया जा सकता है। संबंधित अखबार और पत्रकार दोनों बधाई के पात्र हैं, पर इसकी प्रशंसा कर देना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। इसे एक शुरुआत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
बहरहाल, हमारे आज के मीडिया परिदृश्य की स्थिति बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं बढ़ाती। और वर्तमान प्रकरण यह भी बताता है कि यह स्थिति चिंताजनक है। एक ओर बाज़ार की ताकत हमारे मीडिया को कमज़ोर सिद्ध कर रही है और दूसरी ओर विज्ञापनों के लिए सरकार पर निर्भरता हमारे मीडिया की विवशता को उजागर करती है। यह हकीकत अपने आप में बहुत कुछ कहने वाली है कि हमारा मीडिया बाहरी दबाव की सेंसरशिप का शिकार बना हुआ है। दबाव बाहरी है, पर सेंसरशिप कुल मिलाकर भीतरी ही है। मीडिया-मालिक सत्ता और विज्ञापनदाताओं को नाराज़ करने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते, इसलिए चौकीदार की अपनी भूमिका भी उन्हें याद नहीं रहती। ‘नहीं रहती’ कहना उचित नहीं होगा; हकीकत यह है कि वे इस बात को याद रखना ही नहीं चाहते। इसीलिए, जब कोई एक अखबार या मीडिया-घराना इस तरह की खबर चलाता है, जैसी इंडियन एक्सप्रेस ने छापी, तो यह एक विशेष घटना बन जाती है, जबकि होना यह चाहिए कि मीडिया में इस तरह की पहल लगातार होती दिखे। पर आज की स्थितियों को देखते हुए यही लगता है कि यह आशा करना एक खुशफहमी ही है। आज के हमारे मीडिया की एक सच्चाई यह भी है कि आम जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दे पत्रकारिता की मुख्यधारा की चर्चाओं से लगभग बाहर हो चुके हैं। रोजगार, कृषि-संकट, शिक्षा की स्थिति जैसे मुद्दे शायद ही कभी मुख्य चर्चाओं का हिस्सा बनते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रोज़-रोज़ होने वाली शाम की बहसें कुल मिलाकर एक निरर्थक शोर बनकर रह गई हैं। इनमें भाग लेने वाले लगातार इस कोशिश में रहते हैं कि उनकी आवाज़ विरोधी की आवाज़ पर भारी पड़े। शोर मचाने की इस प्रतियोगिता में गंभीर विचार-विमर्श के लिए शायद ही कहीं कोई स्थान बच पाता है।
सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है और कड़े सवाल पूछना समय और समाज की आवश्यकता। मीडिया की मुख्यधारा ने इस धर्म और इस आवश्यकता को जैसे भुला ही दिया है। यही कारण है कि जब कोई पत्रकार ऐसा कुछ करता है, जैसा इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार ने किया, तो वह बेहतर कल की आशा की किरण लगने लगता है। यह किरण लगातार दिखती रहे, इसके लिए क्या किया जा सकता है?
इस प्रश्न का पहला और सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्तर तो यह है कि संपादकीय स्वतंत्रता और नैतिकता को फिर से स्थापित करने का ईमानदार प्रयास हो। राजनीतिक अथवा कॉरपोरेट निकटता के बजाय पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों को समझा और स्वीकार किया जाए। यह अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि आज की विषम परिस्थिति में भी कुछ स्वतंत्र पत्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर वह सब करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, जिसकी एक स्वस्थ और उत्तरदायी पत्रकारिता से अपेक्षा की जाती है।
पत्रकारिता एक व्यवसाय मात्र नहीं है। सच कहें तो यह व्यवसाय है भी नहीं, और है भी तो एक विशिष्ट व्यवसाय है। इस बात को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि पत्रकारिता की शुरुआत ही समाज के हितों की रक्षा के लिए हुई थी। इस व्यवसाय की विशिष्टता का तकाज़ा है कि इसे समाज के हितों के साथ जोड़ा जाए। मीडिया यदि स्वतंत्र नहीं है, तो वह मीडिया ही नहीं है। ऐसे में उसे कोई और नाम दिया जाए। प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि इस विशिष्ट व्यवसाय को निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देखा जाए। सनसनीखेज समाचारों से टी.आर.पी. भले ही बढ़ाई जा सकती हो, पर पत्रकारिता के अस्तित्व को सार्थकता नहीं मिल सकती। इस सार्थकता का तकाज़ा है कि तथ्यों की ओर लौटा जाए। तथ्यपरक, निष्पक्ष और जनता के सरोकार ही हमारी पत्रकारिता को सार्थक बना सकते हैं। पत्रकारों और जागरूक नागरिकों को यह सवाल अपने आप से पूछना ही होगा कि विश्वसनीयता के तराजू पर हमारी पत्रकारिता का पलड़ा कितना नीचा या कितना ऊंचा है।
दुनिया के 180 देशों में स्वतंत्रता-सूचकांक की दृष्टि से हमारा स्थान 157वां है। पिछले साल, यानी 2025 में, यह स्थान 151वां था। स्पष्ट है, इस संदर्भ में हमारी स्थिति बिगड़ती जा रही है। प्रेस की स्वतंत्रता की दृष्टि से नॉर्वे का स्थान पहला है। इसी देश में एक पत्रकार ने हमारे प्रधानमंत्री से पूछा था कि वे सवालों के जवाब क्यों नहीं देते। यह सवाल हम सबको समूची व्यवस्था से पूछना चाहिए। सवाल यह है कि हमारी पत्रकारिता सार्थक कैसे बने—और उत्तर समाज को भी देना है, पूरी व्यवस्था को भी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

