याद आता है, अपने वक्त के जमीर की आवाज मिर्जा गालिब ने भी उस वक्त की लगभग इसी तरह की बेबसी को इन शब्दों में व्यक्त किया था : बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।
देश का दिल कहलाने वाली राजधानी दिल्ली इन दिनों जहरीले हवा-पानी के कारण अपने शहरियों की सेहत के लिए कोरोना के बाद का सबसे बड़ा संकट झेल रही है। दिल्ली के अखबारों में छपी वर्षांत छोटी-छोटी बात में जानलेवा हिंसा की खबरें चीख-चीख कर यह जता रही हैं कि उसकी सामाजिक सेहत और भी खराब है, इतनी खराब कि उसके कई निवासियों को सहज मनुष्यता से भी महरूम कर, उन्हें मनुष्य की जगह हत्यारा बना दिया है।
लेकिन दिल्ली ही क्यों, इन्हीं अखबारों में छपी गोरखपुर की उस खबर को पढ़ लें, जिसमें ग्यारहवीं के एक छात्र को ह्वाट्सएप पर लगाये उसके एक स्टेटस से ख़फ़ा सिरफिरों ने उसके कालेज में ही गोलियों से भून डाला, तो साफ हो जाता है कि शेष देश का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। साफ कहें तो वहां की सामाजिकता भी इतने अंदेशों के हवाले है कि सिर्फ वही अपने को सुरक्षित अनुभव कर सकते हैं, जो किसी की असुविधा के कारण नहीं हैं। लेकिन इस लिहाज से, इसके बावजूद, उनकी मुश्किलों का अंत बहुत मुश्किल है कि जो हालात हैं, उनमें बहुत चाहकर भी किसी की असुविधा का कारण न बनना संभव नहीं हो पा रहा। बढ़ता धार्मिक व साम्प्रदायिक विद्वेष और प्रदूषित राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएं बेतरह इसके आड़े आ रही हैं।
तिस पर आम लोगों की बात करें तो वे अपने एकांत में तो अकेले हैं ही, भीड़ भरी सड़कों पर भी अकेले ही हैं। क्योंकि जब भी उनके जैसे किसी निरीह या निर्दोष पर कोई प्रहार होता है, भरी हुई सड़कें देखकर भी कुछ नहीं देखतीं। बुजदिली की शरण में चली जाती और मृत्यु से पहले ही मर जाती हैं। माब लिंचिग जैसी वारदातों के वक्त बढ़-चढ़कर 'बहादुरी' प्रदर्शित करने वालों का पौरुष उस वक्त जानें कहां चला जाता है। शायद इसलिए कि उनके निकट मारना बचाने से बड़ा जीवन-मूल्य हो गया है और किसी की रक्षा के लिए अपनी जान खतरे में डालने का जोखिम उन्हें इतना बड़ा लगता है कि वे उसको उठा नहीं पाते।
ऐसे में जब कभी धूमधाम से आई इक्कीसवीं शताब्दी के एक चौथाई वर्ष नि:शेष होने वाले हैं और बर्फीली हवाएं ठिठुरन बनकर तन-मन को बेधे जा रही हैं, आगे मनुष्य के मनुष्य ही न रह पाने के अंदेशे जताती इन खबरों के बीच जो बात सबसे ज्यादा सताती है, वह, निस्संदेह, स्मृतिशेष वीरेन डंगवाल द्वारा अरसा पहले अपनी एक कविता में पूछे गये इस सवाल के अनुत्तरित रह जाने से पैदा हुई है : आखिर हमने कैसा समाज रच डाला है, जिसमें जो कुछ भी चमक रहा है काला है?
याद आता है, अपने वक्त के जमीर की आवाज मिर्जा गालिब ने भी उस वक्त की लगभग इसी तरह की बेबसी को इन शब्दों में व्यक्त किया था : बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।
ऐसे में यह सवाल भी बहुत स्वाभाविक है कि क्या हम अपनी मनुष्यता के लिहाज से ग़ालिब के वक्त में ही खड़े रह गये हैं? अगर नहीं तो क्यों हमारे बीच कोई इतना बेदर्द है कि इन हालात में नये साल की शुभकामनाएं देते हुए उसका कलेजा फटने को नहीं आ जाता और क्यों जगजीत सिंह की गाई इस मशहूर गजल के शायर को कहना पड़ता है कि 'तुमको ये नया साल मुबारक हो दोस्तो, मैं जख्म गिन रहा हूं अभी पिछले साल के!'
पिछला वर्ष इस तरह कलेजा निकाल कर जायेगा तो कौन इस भ्रम के सहारे खुश हो सकता है कि इक बरहमन ने कहा है कि साल अच्छा है या कि किस्से बनेंगे अबके बरस भी कमाल के। अगर पिछले साल के ज़ख्म गिनने की विडम्बना उसका साथ नहीं छोड़ती तो इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि मीर-ए-कारवां को यह देखने की फुर्सत है या नहीं कि वह आ रहा है पांव के कांटे निकाल के!
यहां कह सकते हैं कि 2025 ने बहुत से जख्म दिए तो छाती चौड़ी करने के अनेक मौके भी। लेकिन इस बात का क्या करें कि इससे यह गम गलत नहीं होता कि उसने हमें मनुष्यता के उदात्तीकरण की ओर ले जाने के बजाय उसके अवसान के अंदेशे ही प्रबल किये हैं। ये अंदेशे उत्सव बनते बड़े-बड़े युद्धों और उनमें निरीह बच्चों तक के संहारों में ही नहीं, हमारे निजी व सामाजिक जीवन की छोटी-छोटी कुटिलताओं में भी नजर आते हैं।
बकौल कविवर हरीशचंद्र पांडे, ‘नया साल मुबारक हो’ कहते हुए लगता है कि हम झाड़ियों के उलझाव से बाहर निकलने की कोशिश करती बैलों के गले में बंधी घंटियों में बदल गये हैं। इस खतरे की घंटी को, अभी और अभी, फौरन से पेश्तर सुने जाने की जरूरत है। इसलिए कि हमारी आज की सबसे बड़ी जरूरत मनुष्य के रूप में अपनी रक्षा की है। हम यह रक्षा कर पाये तो वह सब भी फिर से पाने की उम्मीद कर सकते हैं, जो पहले गंवा आये हैं। लेकिन नहीं कर पाये तो? इस सवाल का जवाब भला किसे मालूम नहीं? और किसे नहीं मालूम कि उससे बचने का एक ही तरीका है कि हम नये साल में प्राणपण से अपनी मनुष्यता को बचायें और बेहतर बनायें।

