जलवायु बदलाव व इंसानी हस्तक्षेप से हिमालयी जंगलों में आग लगने से वन संपदा व जीवों के साथ मानवीय क्षति भी हो रही है। जाड़ों में आग लगना और गंभीर मामला है। आग तुरंत नहीं बुझायी जा सकती। ऐसे में वन पंचायतों की मजबूती व जलस्रोतों का बेहतर रखरखाव जरूरी है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में पिछले साल दिसम्बर माह में गढ़वाल मंडल में टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग व चमोली के जंगलों में आग लगने की खबरें आने लगी थीं। उस समय जोशीमठ, बदरीनाथ व केदारनाथ के वन क्षेत्रों में भी आग लगी थी। केदारनाथ सेंक्चुरी व बागेश्वर के ग्लेशियर्स वन क्षेत्र भी प्रभावित हुए थे। जनवरी, 2026 के आखिरी सप्ताह तक जब तक हल्की बारिश और हिमपात नहीं हुआ था, छिटपुट वनाग्नियां लगती रहीं। अब फिर इस माह यानी फरवरी में खासकर कुमाऊं में चीड़ बहुल क्षेत्रों में आग लगने की खबरें आ रही हैं।
ऐसे में जब देश में फायर सीजन निचले इलाकों में फरवरी के बाद ही माना जाता है तो मौसम बदलाव के दौर में जाड़ों के माह की दावाग्नियों को गंभीरता से लेना चाहिए। ठंड के दिनों में जंगल की आग की घटना में ग्रामीण रात-रात भर जागकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे हैं। हिमालयी दुर्गम क्षेत्रों में जाड़ों में पहुंचना ज्यादा मुश्किल हो जाता है।
जनवरी, 2016 में कई जगहों पर जंगलों में आग लगी थी। इस तरह से जंगलों में जाड़ों में लगने वाली आगों से निपटने की कोई तैयारी नही थीं। हालांकि, उस समय कई सौ करोड़ रुपयों की राज्य जलवायु बदलाव कार्य योजना लागू थी। वर्ष 2017 में ही उत्तराखंड वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों का कहना था कि सभी वन प्रभाग अपनी-अपनी कार्ययोजनायें उत्तराखंड स्टेट क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान के व्यवहारों व पद्धतियों के अनुरूप बनायेंगेे। ऐसा हुआ होता तो जाड़ों की वनाग्नियां लगातार बढ़ती न रहतीं। सवाल है कि 2014 के बाद जो स्टेट क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान राज्य में जारी है, और जिसकी नोडल एजेंसी वन विभाग ही है, वह वनाग्नि कम करने में नाकारा क्यों है?
मध्य भारत व पूर्वोत्तर के राज्यों में देश की करीब तीन-चौथाई जंगलों में आग लगने की घटनायें होती हैं। जब मध्य फरवरी से ही सामान्य फायर सीजन शुरू हो जाता है, तो जनवरी में वैसे भी फायर लाइन खींचने, नीचे गिरे झाड़-झंखाड़ और पत्तियों को जमा करने के लिए वन कर्मी मौजूद रहते हैं। ऐसे में मानवीय असावधानियों या जानबूझकर आग लगाने पर रोक तब भी लगाई जा सकती है।
वर्ष 2016 में उत्तराखंड में व्यापक पैमाने पर जंगलों में आग लगी थी। उस समय नैनीताल हाईकोर्ट के निर्देशानुसार वनाग्नि आपदाओं के प्रबंधन के लिए गांव स्तर पर भी कमेटियां गठित करनी थीं। लेकिन एक याचिका के जरिये हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि 2021 अप्रैल तक भी ग्रामस्तरीय कमेटियां गठित नहीं हुईं। दरअसल देश में उत्तराखंड की पहचान उन राज्यों में होती है, जहां वनाधिकार कानून लागू करने में उदासीनता रही है। मोटर मार्ग भी जलते जंगलों की चपेट में आ जाते हैं। स्कूल जाने के एक-तिहाई रास्ते आग संभावित जंगलों से गुजरते हैं। वहीं स्मॉग से आंख, नाक व फेफड़ों के रोग भी बढ़ जाते हैं।
जंगलों की आग का प्रबंधन और रोकथाम राज्यों का विषय है। हर राज्य की दावानलों के प्रबंधन की अपनी कार्ययोजना होती है। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की लगभग पचास हजार हेक्टेयर भूमि वनाग्नियों की भेंट चढ़ चुकी है। राज्य का 38000 वर्ग किलोमीटर यानी 71 प्रतिशत क्षेत्र जंगल का हैै। दरअसल, मौसम में बदलाव को भी वैज्ञानिक जंगलों में आग लगने का कारण मानते हैं। मार्च से तो जंगलों में आग लगना स्वाभाविक ही मान लिया जाता है। इस बार जाड़े के माह सूखे ही रहे।
वैसे जंगलों की आग या तो बरसात से बुझती है या फिर ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से। कई बार इन प्रयासों में ग्रामीण केवल झुलसते ही नहीं हैं, बल्कि मृत्यु भी हो जाती है। वर्ष 2015 में आग बुझाने के प्रयास में दो महिलाएं मरी थीं। मई, 2009 में पौड़ी में वनों में लगी आग बुझाने की कोशिश के दौरान आठ ग्रामवासियों ने प्राणों की आहुति दी थी। असल में जहां अवैध शराब की भट्टियां हों, कटान हो रहे हों या वन तस्कर दुर्लभ जानवर मारने को आग जलाये हों, वहां आग बुझाने जाना स्थानीय जन के लिए खतरनाक हो जाता है। आग लगने के लक्षण बताते हैं कि पहाड़ों में जंगलों के जलस्रोत सूखते जा रहे हैं। कम बर्फ के चलते ऊचांइयों पर ज्वलनशील चीड़ की पहुंच बढ़ती जा रही है। बाघ, तेंदुआ जैसे जंगली जानवर और तराई के जंगलों में हाथी भी पानी की तलाश में भी जंगलों से बाहर निकल रहे हैं। अत: इस समय बड़े पैमाने पर जंगलों में जलाशय बनाने की जरूरत है।
उन्नीसवीं शताब्दी में ही जब अंग्रेजी हुकूमत ने कुमाऊं-गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में वनों पर सरकारी स्वामित्व स्थापित करने के प्रयास किये तो ग्रामीणों ने इसका विरोध करना प्रारंभ कर दिया। इन आंदोलनों के चलते 1930 में जनता से समझौते के तहत पंचायती वन प्रणाली लागू की गयी थी। विडंबना यह कि अंग्रेजों के समय की सशक्त वनप्रणालियां धीरे-धीरे कमजोर कर दी गई। हालांकि, आज भी वन पंचायतें हैं लेकिन वे देशी-विदेशी फंडों से संचालित व सरकारी विभागों से नियंत्रित होने लगी हैं। उत्तराखंड की वन पंचायत प्रणाली में सरकारीकरण बढ़ाकर उसे कमजोर करने से वन अधिकार अधिनियम 2006 में भी कमजोरी आयेगी।
दरअसल ग्रीन बोनस में वन पंचायतों को सशक्त हितग्राही बनाया जाना चाहिए, क्योंकि पहाड़ी खेती, पशुपालन, जलापूर्ति आदि बहुत कुछ जंगलों पर ही निर्भर करते हैं। यदि आग को त्वरित रूप से नहीं बुझाया जाता है, तो गांवों के बीच पैदल मार्गों और वन विभाग के विभिन्न क्षेत्रों में नमी बनाए रखने, जलस्रोतों, तालाबों आदि के रख-रखाव के लिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। वनों में यदि नमी मौजूद रहेगी तो जंगलों की आग में उग्रता नहीं आयेगी।
लेखक पर्यावरण वैज्ञानिक हैं।

