आज से 50-60 साल पहले कुछ मासिक पत्रिकाएं थीं, जैसे ‘सत्यकथा’, ‘मनोहर कहानियां’ और ‘सच्ची दुनिया’। हम लोग स्कूल में थे और किताबों-पत्रिकाओं की दुकानों पर ये भी डिस्प्ले की हुई होती थीं। इनको पढ़ना ज्यादा अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन दसवीं या उसके बाद की कक्षाओं में पहुंचते-पहुंचते इनकी एकाध कहानी पढ़ ही लेते थे। मेरे बड़े मामा को इस तरह की जासूसी और जुर्म की पत्रिकाएं पढ़ने का बड़ा चस्का था। मेरी मां उनको कई बार टोका भी करती थीं। खैर, मामा की आदत जैसी थी, वैसी ही बरकरार रही। वह अंग्रेजी की ‘कारवां’, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ और ‘इंडिया टुडे’ जैसी पत्रिकाएं भी खूब पढ़ते थे। मुझे कभी यह ‘सत्यकथा’, ‘मनोहर कहानियां’, ‘सच्ची दुनिया’ आदि पढ़कर अच्छा नहीं लगा।
आजकल जिस तरह की खबरें रोजाना देखने-पढ़ने को मिल रही हैं, उससे यही लगता है कि इस दौर में तो वे पत्रिकाएं भी बहुत पीछे रह गई हैं। अजीब-अजीब खबरें! एक परिवार के चार सदस्य कुछ दिन पहले तरबूज खाकर मर गए। उसमें चूहे मारने की दवा की मिलावट पाई गई। ये सब तो हम लोग पचास-पचपन बरस पहले भी अपनी आंखों से देखते रहे हैं। एक जुलूस में एक आदमी ने सार्वजनिक रूप से दर्द-निवारक कैप्सूल बांटने चाहे, ताकि लोगों का शारीरिक दर्द कम हो। साजिशों की ऐसी ही अनेक खबरें सामने आती रहती हैं। हमारे एक वरिष्ठ डॉक्टर ने एक वीडियो साझा किया है, जिसमें बताया गया है कि देशी घी के नाम पर इतनी मिलावट और धोखाधड़ी हो रही है कि पशुओं की चर्बी तक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
कुछ महीने पहले मैं अपने किसी मित्र के पास बैठा हुआ था। अचानक फोन आया। पता चला कि राजस्थान से उनका शुद्ध देशी घी आ रहा है। बताने लगे कि ऑनलाइन एक वीडियो देखा था और ऑर्डर कर दिया। दो हजार रुपये में एक किलो था। वह व्यक्ति एक किलो देसी घी की बोतल दे गया। पूछने लगा कि क्या यह आपको सही लग रहा है। मैं हंसने लगा। असल में आजकल यूट्यूब पर ऐसे वीडियो की भरमार है।
आज की वास्तविक दुनिया में ‘सत्यकथाएं’, ‘मनोहर कहानियां’ तो क्या, क्राइम नॉवेल, मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्में और क्राइम शो भी पीछे रह गए हैं। जितने खुराफाती हम हो चुके हैं, जितने मक्कार, शातिर और चालबाज बन गए हैं, हम कुछ भी कर सकते हैं—लालच के चक्कर में। बच के रहिए।
साभार : डीआरप्रवीणचोपड़ा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

