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वर्तमान को जीना भी है एक कला

अंतर्मन

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भविष्य में मार्ग में आगे आने वाले और ज़्यादा ख़ूबसूरत फूलों की संभावना के कारण वर्तमान ख़ूबसूरत फूलों की उपेक्षा करना किसी भी तरह से उचित नहीं। वर्तमान निश्चित है, जबकि भविष्य अनिश्चित। कल भी ये ख़ूबसूरत फूल हमारी आंखों के सामने खिले हुए होंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता।

कुछ लोग अपने जीवन में इस बात को लेकर बड़े निराश होते रहते हैं कि वे बहुत-सी चीज़ों, बातों अथवा जानकारी से वंचित रह गए। उनका मानना होता है कि वे अपने जीवन को और अधिक अच्छा बना सकते थे। अधिक पुस्तकें पढ़ सकते थे अथवा सत्संग आदि में अधिक समय व्यतीत कर सकते थे। अधिक योग्य, ज्ञानवान अथवा धार्मिक हो सकते थे। अधिक लोगों से मेलजोल बढ़ाकर अपना सामाजिक दायरा अधिक विस्तृत कर सकते थे। तात्पर्य यही है कि समय का और अधिक अच्छा उपयोग कर सकते थे। यदि हम जीवन में बहुत-सी चीज़ों, बातों अथवा जानकारी से वंचित भी रह गए तो भी हमें मायूस होने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि हमारी सीमाएं अवश्य होती हैं।

वास्तव में जो नहीं किया या नहीं हो सका, उस पर ध्यान देने के बजाय हमें अपना सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित करना चाहिए कि हमें आगे क्या करना है और कैसे करना है? आज तक हमने जो भी किया है, अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अच्छा ही किया है, इस बात को मन में रखें और आज तक जो भी प्राप्त किया है, उसका पूरा-पूरा उपयोग अपने और समाज के हित में करें। यदि हम अपने अल्प ज्ञान अथवा कुशलताओं के बल पर एक बेहतर संतुलित जीवन व्यतीत कर रहे हैं और हमारे कारण समाज का अहित नहीं, कुछ न कुछ हित ही हो रहा है तो ये भी बहुत बड़ी बात है। समाज के समग्र विकास के लिए हर तरह के ज्ञान व कुशलताओं की ही नहीं, हर तरह की चीज़ों व हर तरह के लोगों की भी आवश्यकता होती है। बड़ी-बड़ी मशीनें जितनी महत्वपूर्ण होती हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं सामान्य उपयोग की छोटी-मोटी वस्तुएं भी। यदि फिर भी हमें लगता है कि हम सचमुच बहुत अच्छा नहीं कर पाए हैं तो ये पता चलना भी हमारे पूर्व में संचित ज्ञान और अनुभवों का ही परिणाम है, जो अपने आप में एक उपलब्धि ही है। यह हमें हमारे जीवन के शेषांश के लिए सही स्थितियों का चुनाव करने में सहायक होगा।

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वैसे भी ज्ञान-विज्ञान अथवा सीखने की कोई सीमा नहीं। ज्ञान-विज्ञान के मुकाबले में मनुष्य के सीखने का काल अथवा उसकी जीवनावधि अत्यंत अल्प है। अपने पूरे एक जीवन में इस ब्रह्मांड के अथाह समुद्र रूपी ज्ञान की एक बूंद मात्र भी हम पूरी तरह से नहीं सीख सकते। संपूर्ण ज्ञान की बात करना ही निरर्थक होगा। यहां आकर हम द्वंद्व में फंस जाते हैं कि हम क्या सीखें और क्या न सीखें? क्या हम यूं ही जीवन को गुज़ार दें? नहीं। जीवन को हमें एक अच्छे तरीके से जीने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जीवन को चलाने के लिए कुछ व्यावहारिक व कुछ विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। जीवन में कहीं विशेष सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य होता है तो कहीं व्यावहारिक पक्ष को देखना।

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एक प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफेसर व एक अनपढ़ नाविक की कथा तो आपने सुनी ही होगी। एक बार एक प्रोफेसर समुद्री जहाज़ से यात्रा कर रहे थे। वहां उनकी दोस्ती एक नाविक से हो गई। एक दिन विद्वान प्रोफेसर ने नाविक से पूछा, ‘क्या तुमने दर्शन शास्त्र पढ़ा है?’ नाविक ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाते हुए कहा, ‘नहीं।’ इस पर प्रोफेसर ने नाविक से कहा कि दर्शन शास्त्र न पढ़कर उसने अपनी ज़िंदगी का चौथाई भाग व्यर्थ कर डाला है। अगले दिन विद्वान प्रोफेसर ने नाविक से फिर पूछा, ‘क्या तुमने साहित्य का अध्ययन किया है?’ इस बार फिर नाविक ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाते हुए कहा, ‘नहीं, मुझे तो पता ही नहीं साहित्य क्या होता है।’ इस पर प्रोफेसर ने नाविक से कहा, ‘यदि तुमने साहित्य का अध्ययन नहीं किया है तो तुमने अपनी ज़िंदगी का आधा भाग व्यर्थ कर डाला है।’

प्रोफेसर और नाविक के मध्य वार्तालाप चल ही रहा था कि तभी समुद्र में तूफ़ान आ गया और ऊंची-ऊंची लहरें उठने लगीं। जहाज़ बुरी तरह से हिलने लगा। तूफ़ान के शोर में एक-दूसरे की आवाज़ तक नहीं सुनाई पड़ रही थी। तभी नाविक ने चिल्लाकर प्रोफेसर से पूछा, ‘प्रोफेसर साहब, क्या आपको तैरना आता है?’ प्रोफेसर ने कहा कि उसे तैरना नहीं आता। इस पर नाविक ने कहा, ‘प्रोफेसर साहब, आपने तो अपनी पूरी ज़िंदगी ही व्यर्थ कर डाली है। अभी जहाज़ डूबने वाला है और जिसे तैरना आता है, उसी के बच निकलने की संभावना है।’ यह कहकर नाविक अपनी जान बचाने के लिए समुद्र में कूद गया। संदेश स्पष्ट है। जीवन में जितना महत्व विशिष्ट ज्ञान का है, उससे अधिक महत्व सामान्य व्यावहारिक ज्ञान व कुशलताओं का भी है। हम जीवन में सहजता-सरलता की उपेक्षा कर ही नहीं सकते।

डिज़रायली का एक कथन है कि हमें दुनिया की सारी चीज़ों के बारे में कुछ-कुछ और कुछ एक के बारे में सब कुछ सीखने की कोशिश करनी चाहिए। हम दुनिया की तमाम चीज़ों के बारे में सब कुछ नहीं सीख सकते। लेकिन कुछ भी न सीखना भी ठीक नहीं। जब हमें इस संसार में रहना है तो इस संसार की व्यावहारिकता को भी जानना ही चाहिए, अन्यथा जीवन संकट में पड़ जाएगा।

हम चौबीसों घंटे पूरी दुनिया का नक्शा अपने दिमाग में न रखें, लेकिन जिस रास्ते से भी गुज़रें, विशेष रूप से उसका नक्शा ज़रूर अपने दिमाग में रखें। जीवन-यात्रा में जहां भी ख़ूबसूरत फूल खिले मिलें, उनसे अवश्य आनंदित हों। फिर हमारे जीवन के अगले क्षण की ही क्या गारंटी है? कल भी हमारी आंखों के सामने सुंदर-सुंदर फूल खिले हों, इसके लिए नए बीज बोते रहें, लेकिन वर्तमान की उपेक्षा किसी भी तरह से उचित नहीं।

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