जीवन की क्षणभंगुरता को याद करते जीना

जीवन की क्षणभंगुरता को याद करते जीना

अविजीत पाठक

अविजीत पाठक

हर मौत याद दिलाती है : हम अनिश्चितता में जीते हैं, इस फानी जगत को हल्के में लेते हैं– हमारी ताकत, प्रसिद्धि या हमारे पास मौजूद भौतिक सुविधाएं या सफलता की कहानियां– यह सब किसी भी क्षण बिना पूर्व सूचना छिन सकता है। फिर भी, हम नाजुक वजूद वाले इस मूल सच को नकारना चाहते हैं, हमें भूलना पसंद है और अपने सामान्य क्रिया-कलापों में पुनः रम जाते हैं– ‘सर्वश्रेष्ठ ही जीने लायक है’ के सिद्धांत वाली चूहा-दौड़ में सहमति से शामिल हो जाते हैं, अपने फुलाए अहंकार को तुष्ट करते और यह मान बैठते कि जीवन इसी तरह चलता रहेगा। लेकिन जब किसी मश्ाहूर हस्ती की मौत होती है– वह भी तब जब वह करिअर में ऊंचे मुकाम पर हो, तो यह खबर बन जाती है। यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि एक सितारा अपने आभामंडल, आकर्षण और पैसे के बावजूद यूं मर जाएगा : ठीक वैसे ही जैसे मेरे और आपके जैसे रोजाना मरते हैं।

कोई हैरानी नहीं कि सिद्धार्थ शुक्ला की अचानक मौत ने हमें झिंझोड़कर रख दिया है। वह युवा और स्वस्थ थे। उनमें खिंचाव था, उनकी शारीरिक बनावट फिटनेस की गवाही देती थी, वे स्क्रीन पर मनमोहक दिखते थे और सबसे ज्यादा यह कि असंख्य दर्शक उन्हें पसंद करते थे। लेकिन काल का ग्रास बनने से नहीं बच पाए। एक तरह से, उनकी अचानक हुई मृत्यु ने हम सबको असहज कर दिया है क्योंकि गहरे अंतस में यह हमारे उस दुनियावी नजरिए को ध्वस्त करता है, जिसको बहुत से लोग मानकर जीते हैं कि सदा महत्वाकांक्षी रहें, लोगों में दिखाई दें और मशहूर हों, चिर युवा दिखें और ऐसा करना आम बात माना जाता है। तथ्य यह है कि हमारे क्षणभंगुर वजूद का सच किसी से भेदभाव नहीं करता, मौत किसी भी वक्त दरवाजे पर दस्तक दे सकती है, चाहे फिर वह कोई सितारा हो या खरबपति।

हां, हम सिद्धार्थ को प्यार करते थे और हमें सदमा लगा है और इस दर्द की अपनी गहराई और तीव्रता है। जब भी कोई मौत होती है– हमारे निकटवर्ती, पड़ोसी, राजनीतिक व्यक्तित्व, कलाकार इत्यादि तो हम मनोवैज्ञानिक संताप और किसी अपने को खो देने वाली भावना से गुजरते हैं। यह समय है सिद्धार्थ की माता को अपनी प्रार्थना पहुंचाने का। लेकिन फिर यक्ष प्रश्न वही है : जब तक आप और मैं जिंदा हैं क्या सदा मौत का पूरा आभास रखते हुए जीना संभव है, प्रत्येक क्षण का आनंद लेकर इसे अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है? या फिर हम मौत के बारे में न सोचकर यूं ही जीते रहें, और मान लें कि जिंदगी वही है, जिसमें हम अभिमान, महत्वाकांक्षा, डर, हिंसा और असुरक्षा के साथ जीते हैं? अखबारें, टेलीविज़न, चैनल और सामाजिक मीडिया जल्द ही सिद्धार्थ को भूल जाएगा, उनके प्रशंसक भी अपनी दुनिया में रम जाएंगे– जहां दफ्तर, करिअर, पैसा, खरीदारी, दारूबाजी... इत्यादि सब पहले की तरह है।

यदि हम ताजिंदगी मौत के पूरे अहसास के साथ जीएं तो क्या यह हमें अनिवार्य रूप से निराशावादी, किसी और दुनिया में विचरने वाला और जिंदगी से विमुख माना जाने वाला इंसान बना देगा? या फिर हमें जीवन को पुनः परिभाषित करने के काबिल बनाएगा, और हमें लचीला, अर्थपूर्ण और विनम्र बनाएगा? यह प्रतिबिंबित करना महत्वपूर्ण है कि हम अपनी रोजाना वाली जिंदगी के वजूद के साथ इस जगत में क्या कर रहे हैं, जहां भौतिक तरक्की को पराक्रम माना जाए, अहंकार भरी उपलब्धियों का महिमामंडन, जीने का मतलब अनंत लड़ाई हो और जो धीमेपन, शांति और सुकून से दूर भागे। हम बस दौड़ रहे हैं और दौड़े चले जा रहे हैं और सफलता की उपलब्धियां पाने वालों को सिर-आंखों पर बैठा रहे हैं, फिर चाहे यह खरबपति, खिलाड़ी, फिल्मी हस्ती या कोई आत्ममुग्ध राजनेता क्यों न हो। हमारे परिवार या स्कूलों में हमें सदा महत्वाकांक्षी, प्रतिस्पर्धी और उपलब्धि नीत होना सिखाया जाता है। क्या हम सच में गहराई से और शालीनता से जीते हैं? या फिर जिदंगी में मिथकों जैसी सफलता को पाने की हसरत में इस चूहा-दौड़ में शामिल हैं, हम साधारण में दिव्यता की झलक से महरूम हैं, मसलन, सूर्यास्त, बहती नदी, पेड़ों की वत्सल छांव तले चाय की चुस्कियां या अपने प्रियतम की आंखों में समुद्र की खोज करना आदि। क्या ऐसा नहीं है कि आज हम गुस्से और संताप के साथ जी रहे हैं, टूटे रिश्ते और अवसाद कम करने वाली दवाएं और जो कुछ हमारे पास हैं उसे खोने का गहरा डर जैसे कि प्रसिद्धि, चकाचौंध और पैसा? क्या यही वह है जिसे हम ‘जिदंगी’ की तरह लें।

यदि हम इस चूहा-दौड़ की तमाम बेवकूफी को समझ पाने के लिए साहस पा लें और यह मान लें कि जिंदगी-मौत के बीच वाले अंतराल में भौतिक सफलताएं निरर्थक हैं, तो आत्महत्या करने की नौबत न बने, या फिर हम व्यर्थ की शून्यता भरी संस्कृति को बढ़ावा दिए जा रहे हैं। इसकी बजाय क्यों न हम इस तरह जीएं– और सोच-समझकर एवं शिद्दत से– हर उस घड़ी जब हम चल-पढ़ रहे हों, रसोई में काम करते वक्त या गिटार बजाते हुए। इस तरह हर वह क्षण अलौकिक एवं दिव्य बन जाता है, तीव्र जिंदगानी की इस घड़ी में कोई बिछोह नहीं होता, नर्तक खुद नृत्य बन जाता है, गवैया गीत में ढल जाता है। ऐसी कोई मिथकभरी सफलता नहीं जो कल को हमें अमर बना दे। भावी कल तो अनिश्चितता दूसरा नाम है, कोई इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। केवल यही वर्तमान क्षण है जिसे हम जीने के लिए प्यार, अचरज और सृजना भरे उत्सव में बदल सकते हैं। हम आसमान के सितारों की तरह अजर-अमर नहीं हैं, हम तो तालाब-बगिया में खिले हुए नन्हे फूल की मानिंद हैं, जब कभी मुरझाने लगें तो आसमान में तैरते बादलों सरीखी तैरती सकारात्मकता अपना आकार बदल बारिश रूपी आशीर्वाद बरसाए।

आमतौर पर हमें उस ‘आकारहीन’ को रिश्वत देने को प्रशिक्षित किया जाता है, जिसे सुसंगठित धर्म ईश्वर बताते हैं। हम उसके सामने अपनी बेटी के लिए अच्छा घर-वर, बेटे की बढ़िया नौकरी या किसी प्रियजन की अनियंत्रित हो चुकी मधुमेह को अपने चमत्कार से ठीक करने जैसी अनेकानेक प्रार्थनाएं करते हैं। ये प्रार्थनाएं न तो हमारी तरक्की करती हैं न ही इनसे यह अहसास करने का बल मिलता कि जीने-मरने की कला जानने के सिवा कोई और शक्ति नहीं है। मौजूदा पल को भरपूर जीने के लिए प्यार जगाने को अहंकार खत्म करने का अहसास या मशहूरी और सफलता की बेजा लालसा को मारना पड़ता है। क्या परिकल्पना से इस किस्म की प्रार्थना संभव है जो हमें जिंदगी-मौत और आकार-आकारहीन के बीच मेल के लिए तैयार करने वाली हो?

लेखक समाजशास्त्री हैं।

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