स्मृति शेष : प्रो. शीला भल्ला

जीवन पर्यंत किसान हितों के लिए संघर्ष

जीवन पर्यंत किसान हितों के लिए संघर्ष

प्रीतम सिंह

प्रीतम सिंह 

प्रो. शीला भल्ला जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमेरिटस रहने के अलावा एक अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कृषि अर्थशास्त्री थीं, जिनकी विशेषज्ञता हरियाणा की खेती पर थी। बीती 5 सितम्बर को उनका निधन हो गया। वह और उनके पति प्रो. जी. एस. भल्ला, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के अर्थशास्त्र विभाग में मेरे अध्यापक रहे थे। प्रो. जी. एस. भल्ला का देहांत वर्ष 2013 में हुआ था। दरअसल शीला की पृष्ठभूमि कनाडा की थी। उनकी मुलाकात गुरदर्शन सिंह से उस वक्त हुई जब वे दोनों लन्दन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में साथ-साथ स्नातकोत्तर पढ़ाई कर रहे थे। दोनों सामाजिक भलाई वाली आर्थिकी के पुनर्निर्धारण में समाजवादी विचारों को लेकर एक-दूसरे से प्रभावित थे। शीला को समाजोन्मुख झुकाव अपने पिता का एक कनाडाई वामपंथी होने की वजह से विरासत में मिला था। दोनों की उभयनिष्ठ बौद्धिकता और सामाजिक सोच से ओतप्रोत विचारों ने उन्हें पास ला दिया और शादी हुई। पढ़ाई उपरांत उन्होंने भारत में बसना पसंद किया। 

प्रो. जी. एस. भल्ला की पृष्ठभूमि मोगा के पास स्थित गांव बधनी कलां से संबंधित एक बड़े परिवार से थी। शीला ने पंजाबी समझने और बोलने में काम चलाने लायक प्रवीणता हासिल कर ली थी। चंडीगढ़ और दिल्ली के अपने अकादमिक करियर के दौरान भी शीला ने प्रो. भल्ला की वृद्ध माताजी की सेवा-संभाल की, जिन्हें केवल पंजाबी बोलनी-समझनी आती थी, सास-बहू के बीच बहुत प्यार वाला रिश्ता कायम रहा। 

भल्ला दंपति ने अर्थशास्त्र के अपने अकादमिक कार्य के साथ-साथ मजदूर–किसानों का साथ दिया। उनके हितों और भारत में मानवाधिकारों के लिए चले आंदोलनों का समर्थन किया। जब उन्होंने मार्च 1969 में पंजाब यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग में काम शुरू किया तब मैंने बतौर स्नातक द्वितीय वर्ष में पदार्पण किया था। 2 सितम्बर 1969 के दिन वियतनाम के महान नेता हो चि मिन्ह की मृत्यु हो गई और हम में से कुछ ने उनके क्रांतिकारी नेतृत्व को श्रद्धांजलि देने के लिए एक बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया। काफी संख्या में विद्यार्थी तो जुटे लेकिन अध्यापक वर्ग से केवल भल्ला दंपति ने शिरकत की। यह हमारे नैतिक बल के लिए बड़ा उत्साहवर्धक रहा। जब मैंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एम.फिल-पीएचडी के लिए दाखिला लिया तो कुछ समय पश्चात ये दोनों भी बतौर अध्यापक वहां आ गए थे। 

पंजाब यूनिवर्सिटी के कार्यकाल के दौरान भल्ला दंपति को एक बहुत बड़ा मौका मिला, जब हरियाणा सरकार ने सूबे में हरित क्रांति के विकास के लिए अनुसंधान-अध्ययन योजना के तहत एक बड़ा वजीफा दिया था। इस अध्ययन से उपजा इनका पहला मुख्य प्रकाशित कार्य थाः ‘चेंजिंग एग्रेरियन स्ट्रक्चर इन इंडिया-ए स्टडी ऑफ इम्पैक्ट ऑफ ग्रीन रेवोल्युशन इन हरियाणा’ (1974)। इस अध्ययन की एक बड़ी खोज थी, खेत के आकार और उत्पादन में व्युत-संबंध यानी जब खेत बड़ा होता है तो प्रति एकड़ उपज कम हो जाती है। इस अध्ययन की प्रासंगिकता अर्थात छोटे किसान ज्यादा पैदावार करते हैं, इसकी प्रतिध्वनि आज भारत में चल रहे किसान आंदोलन के संदर्भ में एकदम मौजू है, जो कि छोटे और हाशिए पर बैठे किसान को बड़े कृषि-व्यापारिक कंपनियों के चंगुल में जा फंसने से बचाने के मकसद से चल रहा है। इस अध्ययन के बाद और खासकर जेएनयू में आने के उपरांत, दोनों के अकादमिक शोध ने अलग राह पकड़ी, जहां शीला ने हरियाणा और देश के अन्य राज्यों जैसे कि आंध्र प्रदेश की कृषि-आर्थिकी में विशेषज्ञता हासिल की वहीं प्रो. भल्ला ने पंजाब और भारत के कुछ भागों मसलन गुजरात पर ध्यान केंद्रित किया। हरियाणा के कृषि क्षेत्र पर अध्ययन में शीला ने अग्रणी जगह बना ली और इस विषय पर बेहतरीन शोध-पत्र प्रकाशित किए।

अखिल भारतीय किसान सभा ने प्रो. शीला के बौद्धिक एवं राजनीतिक काम के प्रति श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘उन्होंने गरीबों और श्रमिकों के हित के लिए जीवन-पर्यंत कार्य किया।’ उनके विविध कार्यों ने हमें यह समझने में मदद की है कि पूंजीवादी विकास का भारत की कृषि, गरीब, भूमिहीन कृषि मजदूर, पट्टे पर जमीन लेकर खेती करने वाले और गरीबों के विभिन्न तबकों पर क्या असर पड़ेगा। सेवानिवृत्ति उपरांत भी इस महान कृषि-अर्थशास्त्री ने बदलते कृषि परिदृश्य और नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का क्या असर होगा, इसको लेकर समर्पित अध्ययन वाली सक्रिय जिंदगी जारी रखी। 

दरसल उन्होंने भारतीय किसान सभा के प्रदर्शनों में भी शिरकत की। यहां तक कि काफी उम्र होने के बावजूद भी। उन्होंने आखिरी मर्तबा वर्ष 2013 में कुड्डालोर में हुए अखिल भारतीय सम्मेलन में भाग लिया था। वह सभा के दस्तावेजों को बारीकी से पढ़कर, इनमें सुधार या बदलाव करने का सुझाव देती थी। अपने विचारों को बेलाग शब्दों में व्यक्त करने में कभी न झिझकने वाली प्रो. शीला भल्ला ने शिक्षा क्षेत्र और जेएनयू में छात्रों और अध्यापकों पर भाजपा-आरएसएस समर्थक तत्वों के हमलों के खिलाफ डटकर आवाज उठाई। 

शीला के परिवार में बेटी शरण रस्तोगी, बेटा उपिंदर सिंह भल्ला, रविंदर सिंह भल्ला (तीनों ने अपने-अपने क्षेत्र में डॉक्टरेट डिग्री हासिल की है) और योगिंदर सिंह भल्ला (जो कनाडा में रहते हैं) और आठ पोते-पोतियां-नाती-नातिन हैं। 

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

‘राइट टू रिकॉल’ की प्रासंगिकता का प्रश्न

‘राइट टू रिकॉल’ की प्रासंगिकता का प्रश्न

शाश्वत जीवन मूल्य हों शिक्षा के मूलाधार

शाश्वत जीवन मूल्य हों शिक्षा के मूलाधार

कानूनी चुनौती के साथ सामाजिक समस्या भी

कानूनी चुनौती के साथ सामाजिक समस्या भी

देने की कला में निहित है सुख-सुकून

देने की कला में निहित है सुख-सुकून