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जीवन पर भारी पड़ती राजस्व उगाही

जीवन पर भारी पड़ती राजस्व उगाही

दीपिका अरोड़ा

हाल ही में, 6 मई को हरियाणा सरकार ने 2022-23 के लिए नई आबकारी नीति को मंजूरी दी, जिसके अनुसार अंग्रेज़ी व देसी शराब के मूल्य घटाए गए हैं। मदिरा पर आयात शुल्क घटाकर मूल्य 7 रुपए प्रति बल्क लीटर (बी.एल.) से घटाकर 2 रुपये प्रति बल्क लीटर कर दिया गया है। राज्य में क्लब बार खोलने के लाइसेंस हेतु आवेदन कर सकने सहित, अतिरिक्त शुल्क देकर बार खुला रखने की निर्धारित अवधि में भी बढ़ोतरी करवा सकते हैं। एक ज़ोन में शराब-ठेकों की संख्या दो से बढ़ाकर चार कर दी गई है।

भारतीय संविधान के अनुसार मद्यपान मौलिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता। राज्य बिक्री नियंत्रण संबंधी स्वैच्छिक अधिकार रखते हैं। संविधान की धारा 29 किसी भी लाइसेंसधारी विक्रेता को 25 साल से कम आयुवर्ग के व्यक्ति को शराब अथवा नशीली दवा बेचने अथवा वितरित करने से प्रतिबंधित करती थी। संशोधित कानून के अनुसार अब यह आयु सीमा 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष निर्धारित कर दी गई है। धारा 30 के प्रावधान के अनुसार विक्रेता द्वारा लाइसेंसधारक होने पर भी 25 वर्ष से कम आयुवर्ग के महिला-पुरुष को मदिरा अथवा नशीली दवा की बिक्री अथवा वितरण से संबद्ध नौकरी पर नहीं रखा जा सकता था। वर्तमान में संशोधित आयु सीमा घटाकर 21 वर्ष कर दी गई है।

दिसंबर, 2021 को हरियाणा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में, प्रादेशिक आबकारी कानून, 1914 की कुल चार धाराओं को संशोधित किया गया था। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद, 11 फरवरी से उक्त संशोधन के प्रांत सरकार गजट में प्रकाशित होने के उपरांत बदलाव प्रभावी हो गये हैं।

आर्थिक लाभ के आधार पर आकलन करें तो शराब-बिक्री राजस्व उगाही का सबसे बड़ा स्रोत है। प्रतिवर्ष सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था में खरबों रुपये का योगदान करती है। वर्ष 2000 में भारतीय राज्यों ने शराब-बिक्री द्वारा लगभग 1.75 ट्रिलियन रुपये कमाए। औसत भारतीय राज्यों ने शराब बिक्री द्वारा 15,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाई।

हालांकि सरकार का तर्क है कि दिल्ली में शराब सस्ती होने के कारण अवैध शराब की तस्करी बढ़ गई थी, जिससे हरियाणा सरकार को आर्थिक घाटा हो रहा था किंतु यहां प्रश्न यह उठता है कि आर्थिक भरपाई हेतु लोकहित को दांव पर लगा देना कितना तर्कसंगत है? लोकहित एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से विचार करें तो मद्यपान न केवल एक धीमा जहर है, जिसका शारीरिक व मानसिक अवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अपितु नशे की लत निर्धनता के स्तर से ऊपर न उठ पाने का कारण भी बन जाती है।

भारत में मद्यपान का बढ़ता प्रचलन गहन चिंता का विषय है। अल्कोहल का सेवन करने वाले अग्रणी देशों में बेलारूस का नाम शामिल है, वर्ष भर में औसतन एक व्यक्ति 17.5 लीटर शुद्ध अल्कोहल पी जाता है। भारत में यह आंकड़ा भले ही करीब 8.7 लीटर वार्षिक हो लेकिन सेवन-मात्रा अत्यधिक है।

घरेलू प्रताड़ना, परिवार बिखरने, बढ़ते अपराधीकरण, विविध हिंसा प्रकरणों, दुर्घटनाओं आदि में मद्यपान मूल कारण रहा। साल 2012 में शराब पीने के उपरांत, वैश्विक स्तर पर हिंसा या दुर्घटना में 33 लाख लोगों की मृत्यु हुई, अर्थात‍ प्रति 10 सेकेंड में एक मौत। साल 2016 के दौरान दुनिया में शराब के कारण 30 लाख लोगों की मौत हुई। भारत में यह आंकड़ा करीब 2.6 लाख रहा।

बहुत अधिक मात्रा में निरंतर मद्यपान से निराशा भाव, चिड़चिड़ापन, क्रोध, एकाग्रिक अक्षमता जैसी समस्याएं पनपने लगती हैं। वेर्निके-कोर्साकॉफ सिंड्रोम, डिमेंशिया, ब्रेस्ट या आंत कैंसर जैसे रोगों सहित, यह अनेक आनुवंशिक बीमारियों का जनक भी है। जर्मनी में प्रतिवर्ष लीवर सिरोसिस से मरने वाले लोगों की संख्या हजारों में है। शराब के दुष्प्रभावों को देखते हुए महात्मा गांधी ने पराधीनता के युग में घोषणा की थी, ‘यदि भारत का शासन आधे घंटे के लिए मेरे हाथ में आ जाए तो मैं शराब की सभी डिस्टलरियों और दुकानों को बिना मुआवजा दिए ही बंद कर दूंगा।’

विडंबना है कि आज स्वतंत्र भारत में सर्वाधिक राजस्व उगाही शराब बिक्री द्वारा ही संभव मानी जाती है। शायद यही कारण है कि पेट्रोल, डीजल, गैस सिलेंडर, खाद्य पदार्थों आदि मूलभूत उपभोक्ता वस्तुओं के अनियंत्रित दामों पर लगाम लगाने की अपेक्षा, शराब सस्ती करना अथवा सेवन अवधि बढ़ाना सरकारों को अधिक तर्कशील लगता है।

यूं तो हमारे नेतागणों द्वारा आयोजित ज्यादातर सभाएं लोकहित को समर्पित एवं सामाजिक समस्या निराकरण पर ही केंद्रित होती हैं, किंतु यह बात समझ से परे है कि इस नई आबकारी नीति द्वारा कौन-सा लोकहित संभव होगा और किस सामाजिक समस्या का समाधान होगा? ‘नशा उन्मूलन’ के जोशीले नारों में, सुरापान को सर्वसुलभता प्रदान करना; यह बात कुछ हजम नहीं हुई।

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