हमें ऐसा परिवार बनाना होगा, जहां बच्चा असफल होने पर भी घर लौट सके। ऐसा विद्यालय बनाना होगा, जहां विद्यार्थी अपनी समस्या कह सके। ऐसा समाज बनाना होगा, जहां किसी युवा की कीमत उसकी नौकरी, पैकेज या परीक्षा की रैंक से तय न हो।
हर वर्ष 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जीवन की शुरुआत की उम्र में हमारे युवा जीवन से ही हार मानने लगे हैं? भारत आज दुनिया के सबसे युवा आबादी देशों में है। हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारी युवा आबादी है, लेकिन यही युवा वर्ग यदि शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगिता, पारिवारिक अपेक्षाओं और भविष्य की अनिश्चितता के दबाव में मानसिक रूप से टूटने लगे, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
एनसीआरबी की ‘क्राइम इन इंडिया 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। यह संख्या अपने आप में अत्यंत गंभीर है। एनसीआरबी के अनुसार, आत्महत्या की राष्ट्रीय दर लगभग 12.4 प्रति एक लाख आबादी रही। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आत्महत्या के कारणों में पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, वैवाहिक समस्याएं, नशा, आर्थिक कठिनाइयां तथा परीक्षा में असफलता और करिअर से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं।
नि:संदेह, आत्महत्या सामान्यतः किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती। इसके पीछे अनेक परिस्थितियां, लंबे समय तक बना तनाव, निराशा, अकेलापन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और व्यक्ति द्वारा अपनी परिस्थितियों को लेकर अनुभव की गई असहायता हो सकती है। आज विद्यार्थी के सामने सफलता की परिभाषा अत्यधिक संकीर्ण होती जा रही है। अच्छे अंक चाहिए। प्रतियोगी परीक्षा में चयन चाहिए। प्रतिष्ठित कॉलेज चाहिए। अच्छी नौकरी चाहिए और फिर दूसरों से बेहतर पैकेज चाहिए। यही सोच सबसे खतरनाक है। एक परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है। एक प्रतियोगी परीक्षा में चयन न होना व्यक्ति की प्रतिभा का अंतिम मूल्यांकन नहीं है। लेकिन जब विद्यार्थी को परिवार, समाज और स्वयं की अपेक्षाओं से लगातार यह अनुभव होने लगे कि उसके पास सफलता के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है, तब तनाव गंभीर रूप ले सकता है।
राजस्थान का कोटा लंबे समय से आईआईटी-जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का प्रमुख केंद्र रहा है। देशभर से हजारों विद्यार्थी वहां पहुंचते हैं। कठोर प्रतिस्पर्धा, लंबे अध्ययन घंटे, टेस्ट सीरीज़, रैंक और लगातार होने वाले मूल्यांकन के बीच अनेक विद्यार्थी मानसिक दबाव का सामना करते हैं।
कोटा वास्तव में उस व्यापक राष्ट्रीय समस्या का प्रतीक बन गया है, जिसमें शिक्षा और करिअर की प्रतिस्पर्धा कई बार विद्यार्थी के संपूर्ण व्यक्तित्व पर भारी पड़ जाती है। यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि समस्या केवल कोचिंग संस्थानों या छोटे शहरों तक सीमित है। देश के प्रतिष्ठित आईआईटी, नीट, विश्वविद्यालयों और मेडिकल संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी मानसिक दबाव से गुजरते हैं।
देश के विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक दबाव के चलते विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसी घटनाएं सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि केवल उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। वहां विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित और संवेदनशील मानसिक वातावरण भी आवश्यक है। ऐसी घटनाएं उच्च शिक्षा व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को संस्थागत बनाने की आवश्यकता अवश्य रेखांकित करती हैं।
माता-पिता की अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन तुलना और निरंतर दबाव विद्यार्थी के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकते हैं। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए हमें शिक्षा व्यवस्था को भी बदलना होगा।
हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अधिकारी नहीं बन सकता। देश को हजारों अन्य क्षेत्रों में प्रतिभाशाली युवाओं की आवश्यकता है। देश में करिअर के विकल्प बढ़ने चाहिए। इससे करिअर का दबाव घटेगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नियमित काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की उपलब्धता, हेल्पलाइन और संकट की स्थिति में त्वरित सहायता प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए। बच्चों को सिखाना होगा कि जीवन कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है, जिसमें केवल एक रैंक मिलती है।
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हमें अपने आसपास के लोगों को देखने की संवेदनशील दृष्टि देता है। यदि कोई विद्यार्थी अचानक बहुत चुप रहने लगे, सामाजिक संपर्क से कटने लगे, पढ़ाई या सामान्य गतिविधियों में रुचि खो दे, अत्यधिक निराशा व्यक्त करे अथवा अपने जीवन को लेकर निरर्थकता की बातें करे, तो उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। किसी व्यक्ति को आत्महत्या के विचार आ रहे हों या तत्काल खतरा महसूस हो, तो उसे अकेला न छोड़ें और तत्काल परिवार, स्थानीय आपातकालीन सेवा या मानसिक स्वास्थ्य सहायता से संपर्क करें।
हमें ऐसा परिवार बनाना होगा, जहां बच्चा असफल होने पर भी घर लौट सके। ऐसा विद्यालय बनाना होगा, जहां विद्यार्थी अपनी समस्या कह सके। ऐसा समाज बनाना होगा, जहां किसी युवा की कीमत उसकी नौकरी, पैकेज या परीक्षा की रैंक से तय न हो।

