इस्राइल में अब उदारवादियों की सरकार

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पुष्परंजन

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मात्र पैंतीस मिनट बाक़ी थे, बुधवार से गुरुवार बदलने में। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बुधवार 12 बजे रात्रि तक बहुमत सिद्ध करना था। उनकी सारी तदबीरें उल्टी हो चुकी थीं। अंततः याइर लापिड ने राष्ट्रपति रिवन रिवलिन को सूचित किया कि उनके पास आठ दलों के गठबंधन का बहुमत है, जो सरकार बना सकने की स्थिति में है। नयी सरकार में यामिना पार्टी के प्रमुख, नेफ्ताली बेनेट को सितंबर 2023 तक प्रधानमंत्री पद संभालना है, उसके बाद याइर लापिड नवंबर, 2025 तक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी देखेंगे। याइर लापिड ने 2012 में इस्राइल की मध्यमार्गी पार्टी ‘यश आतिद’ का गठन किया था। इसे सेक्युलर मिडिल क्लास की पार्टी के रूप में पहचान मिली है।

सहमति से पहले सबकी नज़रें इस्राइल में अरब आबादी के समर्थन से जीती ‘राम’ पार्टी के नेता मंसूर अब्बास पर टिकी थी। इस्राइल के राजनीतिक इतिहास में यह पहली घटना है, जब किसी अरब पार्टी के समर्थन से सरकार का गठन हो रहा है। राम के नेता मंसूर अब्बास, अरब सोसायटी को 53 बिलियन के पैकेज और मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो के बाद समर्थन को राजी हुए। 120 सदस्यीय इस्राइली संसद ‘क्नेसेट’ में जो गठबंधन की सरकार बनने वाली है, उसके कुल सदस्य 61 हैं। मात्र एक सदस्य की बहुमत वाली सरकार 2025 तक खिंच पाती है, तो इसे भी इतिहास रचना कहेंगे।

संसद की पहली बैठक संभवतः 7 जून को होगी, 12 दिनों के भीतर नयी सरकार को बहुमत सिद्ध करना होगा। नेतन्याहू की पूरी कोशिश होगी कि सरकार भरभरा कर गिर जाए। संसद (क्नेसेट) के स्पीकर यारिव लेविन, नेतन्याहू की लीकुड पार्टी के सदस्य रहे हैं। इस गठबंधन में शामिल यामिना पार्टी के कुल सात सांसद चुनाव जीत कर आये थे, जिसमें से एक सांसद सरकार में शामिल होने के पक्ष में नहीं है। यामिना के एक सांसद अमचाई चिकली ने ऐलान किया है कि मैं गठबंधन के विरोध में मतदान करूंगा।

23 मार्च, 2021 के चुनाव परिणाम में जो 13 पार्टियां जीती थीं, उनमें से आठ पार्टियों के नेताओं ने सरकार बनाने की सहमति दी है। यह भी दिलचस्प है कि यश आतिद पार्टी के 17 सांसद हैं। गठबंधन के लिए सर्वाधिक सक्रिय यश आतिद के नेता याइर लापिड पहले राउंड में प्रधानमंत्री नहीं बन रहे हैं। इसके बाद ब्लू एंड व्हाइट के 8, यिशराइल बेतेनू के 7, लेबर के 7, यामिना के 6 सांसद, न्यू होप के 6, मेरेज़ के 6 और राम के 4 सांसद यानी कुल मिलाकर 61 सांसद इस महागठबंधन में हैं। गठबंधन में जो पार्टियां शामिल हुई हैं, उन्होंने पोर्टफोलियो का बंटवारा भी मोटा-मोटा कर लिया है। उदाहरण के लिए, याइर लापिड सत्ता के पहले दो साल विदेशमंत्री होंगे, ब्लू एंड व्हाइट के नेता बेन्नी गांज़ प्रतिरक्षा मंत्री बनेंगे, यिशराइल बेतेनू के नेता एविग्डोर लिबरमैन वित्त मंत्री बनेंगे, न्यू होप के नेता गिडोन सार न्याय मंत्री बनेंगे, यामीना पार्टी के नेता आयलेट शाकेद गृह मंत्री बनेंगे, लेबर की नेता मिशेली ने परिवहन मंत्री की हामी भरी है, उनके साथी ओमर बारलेव पब्लिक सिक्योरिटी मंत्री बनेंगे। इनके अलावा कई और सांसद मंत्रियों की सूची में हैं।

इस्राइल के संसदीय इतिहास में काफी कुछ विचित्र हुआ है। अप्रैल, 2019 के बाद से मार्च, 2021 तक चार बार संसद के चुनाव हो चुके हैं। दिसंबर, 2018 में क्नेसेट के विघटित हो जाने के बाद से ऐसा ग्रहण लगा है कि किसी बात की निश्चितता की गारंटी नहीं दी जा सकती। मार्च, 2021 में चुनाव परिणाम के बाद, नेतन्याहू साम-दाम-दंड-भेद के साथ यामीना पार्टी के नेता आयलेट शाकेद और उनके हममिज़ाज न्यू होप के नेता गिडोन सार पर निरंतर दबाव बनाते रहे कि वो याइर लापिड के साथ गठबंधन में शामिल न हों।

71 साल के नेतन्याहू ने 31 मार्च, 2009 को प्रधानमंत्री पद संभाला था। पांच बार पीएम की कुर्सी बचाये रखना भी नेतन्याहू के लिए बड़ी चुनौती थी। राष्ट्रवाद की वजह से नेतन्याहू ने 12 साल देश के लोगों का ध्यान एकतरफा केंद्रित कर रखा था। इस बार भी ‘बीबी’ के नाम से मशहूर बेंजामिन नेतन्याहू ने पूरे चुनाव में राष्ट्रवाद का अलख जगा रखा था। उनके आक्रामक तेवर को गाज़ा पट्टी में हमास की गतिविधियां मज़बूत कर रही थीं। 11 दिनों के युद्ध में लोगों का एकतरफा ध्यान वहीं केंद्रित था, दूसरी ओर नेतन्याहू सत्ता समीकरण में सक्रिय थे। नेतन्याहू जर्मन पनडुब्बी डील में हुए भ्रष्टाचार में फंसे हैं। ‘थायसन क्रूप’, जिसके माध्यम से जर्मन पनडुब्बी की सप्लाई मिस्र को की गई थी, उस कंपनी में बेंजामिन नेतन्याहू के भी शेयर हैं। पनडुब्बी भ्रष्टाचार वाले सवाल पर 42 फीसद लोगों ने ‘बीबी’ को बेईमान माना था। मगर 27 प्रतिशत लोग यह कहते हैं, ‘पीएम ने जो कुछ किया, देश के वास्ते किया।’ यह भी अजब है कि देशहित के बहाने सभी तरह के घपले ढके जा सकते हैं।

नेतन्याहू की लीकुड पार्टी का राष्ट्रवाद देखने लायक होता है। नेतन्याहू की पत्नी सारा पर प्रधानमंत्री निवास के फर्नीचर की ख़रीद-फरोख्त और उसे सजाने के मामले में पैसे खाने का आरोप है। सारा से दिसंबर, 2016 से लेकर 24 अप्रैल, 2017 तक कई बार पूछताछ हो चुकी है। नेतन्याहू ख़ुद आस्ट्रेलियाई अरबपति जेम्स पैकर से महंगे गिफ्ट लेने के कारण विवाद में फंसे हुए हैं। नेतन्याहू ने एक यहूदी मीडिया मुगल आर्नोन मोज़ेस के अखबार के प्रसार को विज्ञापन और दूसरे तरीके से मदद के ज़रिये आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, इस तरह के गंभीर आरोप भी उन पर लगे हैं। गठबंधन सरकार इन तीनों मामलों की जांच में तेज़ी लाएगी, ऐसा संभव है। उसकी वजह यही समझ में आती है कि नेतन्याहू कमज़ोर होते हैं तो उनके कैंप के सभासद टूटकर गठबंधन में शामिल हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अहद किया था कि चुनाव जीता, और उधर भारत में भी पीएम मोदी दोबारा से सत्ता में आते हैं, तो मैं तुरंत भारत का दौरा करूंगा। अफसोस, यह अरमान परवान नहीं चढ़ पाया। यों, 14 जनवरी 2018 को छह दिनों की यात्रा पर नेतन्याहू दिल्ली आये थे। 2003 के बाद किसी इस्राइली प्रधानमंत्री की यह पहली भारत यात्रा थी। प्रधानमंत्री मोदी से नेतन्याहू के संबंध जगजाहिर हैं। पिछले सात वर्षों में दोनों देशों के बीच दक्षिणपंथी विचारधारा के स्तर पर ‘पीपुल टू पीपुल कान्टेक्ट’ काफी हुआ, उभयपक्षीय रणनीतिक हिस्सेदारी में तेज़ी आई थी। अब सवाल है कि इस्राइल में नयी विचारधारा की सरकार के साथ किस तरह के समीकरण बैठेंगे? उस गठबंधन सरकार में मध्यमार्गी भी हैं, और अरब हितों को सोचने वाली ‘राम’ पार्टी भी।

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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