आज भारत और बांग्लादेश का युवा कहीं अधिक आकांक्षी और महत्वाकांक्षी हैं। इसीलिए क्रिकेट नई शुरुआत करने का एक माध्यम बन सकता है। दोनों पक्षों के बीच तनाव को खत्म कर सकता है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों के मौजूदा संकट में रोचक पहलू यह कि समाधान हेतु उपयुक्त तमाम घटक उसमें ही मौजूद हैं। भारत के लिए अवसर है कि नकारात्मक सोच वाले उन सभी विरोधियों की बाजी पलट दें जो 1971 के बाद से दो मुल्कों के बीच बेहद खास रिश्तों का पराभव चाहते हैं।
समाधान हेतु मुद्दों की सूची में शीर्ष पर क्रिकेट संकट है, जो एक पखवाड़े पहले हिंदू संगठनों द्वारा इंडियन प्रीमियर लीग में बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान के खेलने पर रोक लगाने की मांग से पैदा हुई। बीसीसीआई इस मांग पर झुक गई और युवा मुस्तफिजुर को हटाया गया। इससे क्रोधित हुए बांग्लादेशियों का गुस्सा थम नहीं रहा है। उन्होंने टी-20 विश्व कप में भारत के साथ मैच खेलने से इनकार कर दिया है, जिसमें कोलकाता के प्रतिष्ठित ईडन गार्डंस स्टेडियम में होने वाला मैच भी एक है। उनकी मांग थी कि उनसे संबंधित क्रिकेट मैच, ठीक पाकिस्तान की तरह, तटस्थ देश श्रीलंका स्थानांतरित किया जाए।
फिर, यहां एक विचार है। संभवतः बांग्लादेश संबंधित मैचों को दक्षिण भारत में स्थानांतरित कर दिया जाता, जहां पर बंगाली दर्शक कम होते हैं। संभव है उन्हें अमिताव घोष द्वारा पिछले दशकों में, बहुत डूबकर लिखे तीन नॉवेल (द शैडो लाइन्स, द हंग्री टाइड, गन आइलैंड) के झकझोर देने वाले विषय-वस्तु का इतनी गहराई से अहसास न हो। अब शीर्ष भाजपा नेतृत्व के लिए समय आ गया है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से राब्ता बनाएं -और बीएनपी भी यही करे– हालांकि बीएनपी प्रमुख, तारिक रहमान, इन दिनों 12 फरवरी को होने वाले चुनावों की तैयारी के लिए रैलियों-बैठकों के साथ देश का तूफानी दौरा कर रहे हैं। आख़िरकार, यदि आरएसएस चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से बात कर सकती है, तो शेष कुछ भी संभव है।
यह विचार दोनों पक्षों के लिए है कि अपना चेहरा बचाएं, ठंडे दिमाग वालों को वार्ता करने दें ताकि गर्म दल वाले अवसर हथिया न सकें। हमारे द्विपक्षीय इतिहास में इससे भी बदतर घटित हुआ है। वास्तव में, 1971 में बना उत्साह लंबे समय तक टिका नहीं; चार साल से भी कम अवधि में, 15 अगस्त, 1975 को, बांग्लादेशी फिर से बांग्लादेशियों का कत्ल कर रहे थे। वर्तमान में लौटते हुए। आज की कहानी अब मुस्तफिजुर रहमान और यहां तक कि उन शेख हसीना के बारे में और अधिक नहीं रही, जिन्होंने द प्रिंट को दिए अपने साक्षात्कार में आगामी बांग्लादेशी चुनावों में आवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने को ‘बदलाव का रूप धरा अधिनायकवाद’ बताया है। यह तथ्य कि उन्होंने दिल्ली स्थित विदेशी संवाददाता क्लब को एक वॉयस मैसेज जारी किया है, उसमें भी मूल रूप से वही संदेश था। (ऐसा कहा जा रहा है कि उनका क्लब में खुद मौजूद न रहना या वीडियो संदेश जारी न करना, उनसे बनी सहमति का एक हिस्सा है)।
निस्संदेह, भारत-बांग्लादेश के बीच संबंध -अगस्त 2024 में हसीना के तख्ता पलट और हाल ही में बांग्लादेश में निर्दोष हिंदुओं की प्रतिशोध की भावना से की गई हत्याओं से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं- क्षति नियंत्रण तुरंत शुरू न करना बहुत नुकसानदायक होगा। एक शुरुआत हो चुकी है, खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत की ओर से अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ढाका गए थे। पिछले नवंबर में बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान भारत में अपने समकक्ष अजीत डोभाल से मिलने दिल्ली आए थे।
दोनों तरफ दांव बहुत बड़ा लगा है। भारत को न केवल विभिन्न जनजातियों, धर्मों, कुलों और राजनीतिक दलों के मिश्रण वाले संवेदनशील उत्तर-पूर्व अंचल की सुरक्षा के लिए बल्कि पूर्वी दिशा के मुल्कों के साथ रिश्तों में हो रहे तेजी से बदलाव के बीच बांग्लादेश के साथ की जरूरत है। सिर्फ इसलिए नहीं कि अगले कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल और असम में चुनाव होने हैं। दोनों राज्यों की सीमा बांग्लादेश से लगती है। कई लोग हसीना के अहंकार-कुशासन का हवाला देते हुए कहते कि उन्हें इसलिए उखाड़ फेंका गया। यह भी उतना ही सच है कि भारत ने बहुत कुछ नजरअंदाज किया, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि शेख हसीना और बीएनपी का आपस में हमेशा बैर रहा है। बीएनपी ने दो बार राष्ट्रीय चुनाव का बहिष्कार किया, जिससे घरेलू राजनीतिक कलह बढ़ गई।
लेकिन सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बीजेपी की, शेख हसीना भारत की पसंदीदा क्यों बनी रहीं, इसका कारण यह है कि वे वास्तव में धर्मनिरपेक्ष रहीं। वे हिंदू अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रखने को महत्वपूर्ण समझती थीं, खुली वार्ता के अलावा सीमापारीय व्यापार के पक्ष में थीं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने पाकिस्तान की आईएसआई के नेतृत्व वाले घातक लोगों को घुसने नहीं दिया। वे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में किस कदर नुकसान पहुंचा सकते थे कि उसके सामने धुरंधर फिल्म में दिखाया गया कथानक दार्जिलिंग चाय और वॉटरक्रेस सैंडविच परोसने वाली किटी पार्टी की तरह लगता। उस विशाल हथियार जखीरे को कौन भूल सकता है जो संयोगवश तब मिला था जब तारिक की मां, दिवंगत खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं और जिसका उद्देश्य भारत के सात उत्तर-पूर्वी राज्यों में समस्या पैदा करना था?
आज की तारीख में शेख हसीना दिल्ली में हैं और भारत उन्हें कभी नहीं सौंपेगा –इतनी बात बांग्लादेश को समझनी होगी। बल्कि सराहना भी करनी होगी कि भारत अपने मित्रों का साथ नहीं छोड़ता, चाहे दांव पर कुछ भी क्यों न हो। चाहे न्यायाधिकरण उन्हें सौंपने करने की मांग ‘मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी’ ठहराकर करें।
सबसे महत्वपूर्ण, दोनों देशों के कुलीन वर्ग को यह अहसास होना चाहिए कि आज का भारत और बांग्लादेश कहीं अधिक युवा, कहीं अधिक आकांक्षी और महत्वाकांक्षी हैं। करीब 63 प्रतिशत बांग्लादेशी और 52 प्रतिशत भारतीय 30 वर्ष से कम उम्र के हैं। वे अतीत का कटु बोझ ढोना पसंद नहीं करेंगे। जब बांग्लादेश आजाद हुआ था, उस वक्त तो वे पैदा भी नहीं हुए थे। वे जीवन में आगे बढ़ना और तरक्की करना चाहेंगे – न कि माथापच्ची में उलझे रहना।
तो फिर, आगे का रास्ता यह है कि हसीना के मामले को इतर रखा जाए। भारत में उनकी मौजूदगी से द्विपक्षीय संबंधों को दूषित न होने दिया जाए। नए बांग्लादेश को समझना चाहिए कि भारत का विशाल आकार और उपस्थिति उसको वह असाधारण फायदा पहुंचाती है, जिसका मध्य स्तर की शक्तियां केवल सपना देख सकती हैं। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो बेगम खालिदा के पुत्र तारिक एक महीने से भी कम समय में बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री होंगे। कुल मिलाकर जयशंकर के साथ उनकी मुलाकात अच्छी रही। अब दोनों पक्षों के लिए लकीर पार करने का समय आ गया है।
सही मायने में आज बांग्लादेश को भारत की जरूरत कहीं ज्यादा है। हो सकता है शी जिनपिंग का चीन तारिक के लिए आर्थिक मदद का बड़ा चेक काटकर दे, जैसा कि जिनपिंग ने 2016 में शेख हसीना के वक्त भी किया था और पाकिस्तान बंगाल की खाड़ी में मछली पकड़ना शुरू कर दे। लेकिन सभी जानते हैं कि पाकिस्तान 2,000 किलोमीटर से भी अधिक दूर है। उसकी अर्थव्यवस्था इतनी खस्ताहाल है कि उसने देश को चीन के हवाले कर रखा है। नैसर्गिक पड़ोसी भारत है। प्राकृतिक बाज़ार भारत है। स्वाभाविक साझेदार भी भारत है।
इसीलिए क्रिकेट नई शुरुआत करने का एक माध्यम बन सकता है। दोनों पक्षों के बीच तनाव को खत्म कर सकता है। लिट्टन दास का मिलन सूर्यकुमार यादव से होने दें। नागरिकों को खेलने दें।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

