Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Grand Independence Day Sale
search-icon-img
Advertisement

जंतर-मंतर पर सुरक्षा तैयारी में चूक के सबक

किसी विरोध-प्रदर्शन से निपटने के लिए प्रशासन व पुलिस एक तय प्रक्रिया के मुताबिक योजना बनाते हैं। गत 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में भीड़ के आकार और प्रतिक्रिया का आकलन करने में चूक हुई, जिससे कानून-व्यवस्था की...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

किसी विरोध-प्रदर्शन से निपटने के लिए प्रशासन व पुलिस एक तय प्रक्रिया के मुताबिक योजना बनाते हैं। गत 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में भीड़ के आकार और प्रतिक्रिया का आकलन करने में चूक हुई, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी। दरअसल, पुलिस व्यवस्था में प्रशिक्षण, अनुशासन और स्थापित नियमों की अनदेखी ऐसी घटनाओं को जन्म देती है।

मैंने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हो रही कुछ गतिविधियों को देखा। प्रदर्शनकारियों की भीड़ बहुत बड़ी थी और उसकी तुलना में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिस बल नाकाफी लग रहे थे। एक विशाल और अराजक भीड़ और कम संख्या में पुलिसवाले होना स्थिति बेकाबू बनने में आवश्यक घटक होते हैं। जब मैं इस बारे में विचार करता हूं, तो यह स्पष्ट है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बुलावे पर लोगों की प्रतिक्रिया का अंदाज़ा लगाने में भारी गलती हुई, नतीजन सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया भी पर्याप्त नहीं थी।

विगत में पीछे मुड़कर देखें तो चर्चा में ‘कॉकरोच’ शब्द की आमद के बाद स्थिति तेजी से बदली। बोस्टन से आए एक व्यक्ति ने संसद तक मार्च का आह्वान कर नई दिल्ली में अपने किस्म की ‘टी पार्टी’(चाय पार्टी) बनाने की कोशिश की। किसी सभा या विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त देने या न देने का फैसला मात्र पुलिस का न होकर शहर अथवा राज्य के नागरिक प्रशासन का भी होता है।

Advertisement

पुलिस बल राजसत्ता का एक औजार है और उसका पेशेवर व्यवहार तय कर सकता है कि स्थिति बिगड़ेगी या काबू में रहेगी। मौजूदा मामले में, अधिकारियों ने तैयारी और योजना बनाने का वक्त गंवा दिया क्योंकि उन्होंने लोगों की प्रतिक्रिया के पैमाने का सही अंदाज़ा नहीं लगाया व स्थिति एक असमान टकराव में बदल गई।

Advertisement

आमतौर पर, जब भी ऐसे किसी मार्च की घोषणा होती है, तो ज़मीनी स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी अतिरिक्त सक्रिय हो जाती है। ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक तथा खुफिया एजेंसियों के अधिकारी मिलकर बैठक करते हैं, खतरे के स्तर का आकलन किया जाता है व उससे निबटने के लिए आपातकालीन योजनाएं बनाई जाती हैं। बलों की ज़रूरत का आकलन किया जाता है और लाठीचार्ज दस्ता, आंसू गैस, हथियारबंद टुकड़ियों आदि की उपलब्धता का अनुमान लगाया जाता है। अगर और ज़्यादा कर्मियों एवं सामग्री की ज़रूरत दिखे, तो जरूरी मांग की जाती है।

सूचीबद्ध किए गए इंतज़ामों की देखरेख के लिए अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं और सिर्फ़ उन्हीं को चुना जाता है जिनका अनुभव विगत में ऐसी स्थितियों को संभालने का साबित हो चुका हो। इसके साथ ही, कार्यकारी मजिस्ट्रेट नामित किए जाते हैं और उन्हें पुलिस अधिकारियों से संलग्न कर दिया जाता है। इलाके को सेक्टरों में बांटा जाता है और इन अधिकारियों को काम करने के निर्दिष्ट इलाके सौंप दिए जाते हैं। सभी इंतज़ामों की कुल मिलाकर निगरानी के लिए एक बहुत वरिष्ठ अधिकारी को तैनात किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ऊपर बताए गए सभी उपायों का ध्यान रखा गया है। वह सभी विभागों के अधिकारियों को उद्देश्य के बारे में निर्देश देता है और आगे वे अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी वाले इलाकों के अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देश देते हैं।

स्थिति क्या है यह बताना और समझाना सबसे ज़रूरी है ताकि आखिरी व्यक्ति तक को खतरे और उस पर क्या प्रतिक्रिया देनी है, इसकी समझ बन जाए। बल का इस्तेमाल इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए कि वांछित अधिकतम परिणाम पाने के लिए न्यूनतम बल का प्रयोग करना पड़े। अधिकारियों और जवानों को यह याद रखना चाहिए कि ये हमारे ही भाई-बंधु हैं और हमें उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार नहीं करना है। ज्यादा से ज्यादा परिणाम पाने के लिए कम-से-कम बल का इस्तेमाल किया जाए। पूरे अभियान की बारीकी से निगरानी की जानी चाहिए।

आंसू गैस दस्ते को एक रणनीतिक जगह पर एक राजपत्रित अधिकारीकी देखरेख में अलग से तैनात किया जाना चाहिए और वह केवल उनके आदेश पर ही काम करेगा। इसी प्रकार, हथियारबंद दस्ता भी एक राजपत्रित अधिकारी की देखरेख में सुरक्षित जगह पर उपलब्ध रहे और वह केवल उनके आदेश पर ही कार्रवाई करेगा। आंसू गैस के गोले और अन्य हथियार सामान्य बलों को नहीं दिए जाएं; नियम के अनुसार उनके पास केवल लाठियां होनी चाहिए।

इंतज़ाम का एक और बहुत ज़रूरी हिस्सा कंट्रोल रूम है, जिसे ऑपरेशन वाली जगह के पास स्थापित किया जाना चाहिए और वहां चौबीसों घंटे वरिष्ठ अफ़सर मौजूद रहें। कंट्रोल रूम और सेक्टर इंचार्ज अफ़सरों के पास नवीनतम संचार उपकरण होने चाहिए और संवाद का एक असरदार चैनल बनाया जाना चाहिए।

सीनियर अफ़सरों को इस कंट्रोल रूम में मौजूद होना चाहिए- पुलिस और एग्जिक्यूटिव अफसर ,दोनों केवल अपने दफ्तरों तक ही सीमित नहीं रहें। एक बार जब इंतज़ाम पूरे हो जाएं, अफ़सरों और जवानों को स्थिति संबंधी निर्देश और जानकारी दी जाए और पूर्वाभ्यास किया जाए, वरिष्ठ अधिकारी भीड़ की संख्या और इरादों के बारे में ताज़ा जानकारी के लिए खुफिया एंजेसियों के संपर्क में रहें। अगर हो सके, तो वरिष्ठ सिविल और पुलिस अफ़सरों को आयोजकों से मिलना चाहिए और वे उन्हें शांतिपूर्ण एवं व्यवस्थित तरीके से विरोध करने की अहमियत समझाएं। यह कोशिश अलग-अलग स्तरों पर की जानी चाहिए, और आमतौर पर इसके अच्छे नतीजे मिलते हैं। उस दिन, मैंने टीवी पर एक अकेले पुलिसवाले को स्पष्ट तौर पर दिशा अथवा उद्देश्य की पूरी तरह समझ के बिना आंसू गैस के गोले छोड़ते देखा। इसी तरह, प्रदर्शनकारियों के समूहों का पीछा करते हुए पुलिसवाले तरह-तरह की लाठियों और डंडों से लैस होकर दौड़ रहे थे। वे एक या दो प्रदर्शनकारियों को पकड़ लेते और उनकी पिटाई करने लगते।

वर्दीधारी फ़ोर्स की कार्रवाई एक व्यवस्थित प्रयास होना चाहिए; लाठीचार्ज जवानों के एक दस्ते द्वारा होना चाहिए और इस प्रकार कि भीड़ को तितर-बितर करने में असरदार हो सके। बिना सोचे-समझे, अव्यवस्थित तरीके से लाठियां भांजने से कोई सकरात्मक नतीजा नहीं मिलता- इससे केवल निर्मम बल प्रयोग के आरोप लगते हैं या सिर में चोट जैसे परिणाम रहते हैं। बल का इस्तेमाल निगरानी में किया जाना चाहिए — नियंत्रित, नपा-तुला और भीड़ को तितर-बितर करने के मकसद को पूरा करने योग्य पर्याप्त। उद्देश्य किसी भी कीमत पर ‘दुश्मन’ को हराना नहीं है, क्योंकि इससे और ज़्यादा प्रतिरोध बनेगा, लोग और अधिक भड़क जाएंगे। एक बार उद्देश्य पूरा हो जाने के बाद, जवानों और सामान को व्यवस्थित तरीके से वापस बुलाया जाए। हर व्यक्ति, लाठी, आंसू गैस के गोले और गोली का हिसाब रखा जाए। घायल अफ़सरों और प्रदर्शनकारियों की देखभाल करें, और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें चिन्हित अस्पतालों में ले जाया जाए।

यह विषय बहुत बड़ा है, और मैंने योजना और पहले से तयशुदा प्रक्रियाओं और नियमों का पालन करने की अहमियत को संक्षेप में बताने की कोशिश की है। दिल्ली प्रशासन के लिए यह अच्छा होगा कि वह इस बात की अंदरूनी और गहराई से जांच करे कि क्या हुआ था और आईंदा इसे रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। आज समस्या यह है कि निर्देश प्रक्रिया में बताए तरीकों में ज़्यादातर को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या उन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। पुराने समय में अधिकारियों एवं प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा नियमित प्रशिक्षण और निरीक्षण का महत्व काफी था। सच तो यह है कि आज हमारे पुलिस बलों अौर असल में संपूर्ण आपराधिक न्याय व्यवस्था के आचरण में निहित संस्कृति और कामकाज के तरीके में बहुत कुछ भुला दिया गया है।

लेखक मणिपुर के राज्यपाल एवं जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

Advertisement
×