देशभर में त्योहारों के मौसम में मावे, पनीर और मिठाइयों में जहरीली मिलावट का धंधा चलता है। इससे जनस्वास्थ्य का गंभीर संकट पैदा होता है। इस संगीन अपराध को रोकने को कानून मौजूद हैं लेकिन उन पर अमल नहीं होता। दांव-पेच से अपराधी बच जाते हैं। ऐसे में कड़े दंड, त्वरित न्याय व तकनीकी निगरानी जरूरी है।
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही भारतवर्ष विजयादशमी, करवाचौथ, धनतेरस, दीपावली और छठ पूजा जैसे पर्वों के उल्लास में डूब जाता है। इन दिनों में बाजार रंग-बिरंगी मिठाइयों, खोया, पनीर, देशी घी और मसालों की दुकानों से पट जाते हैं। परंतु उत्सवों की ओट में एक भयावह खेल चल रहा होता है। त्योहारों के दौरान मांग और आपूर्ति के बीच पैदा होने वाले भारी अंतर का अनुचित लाभ उठाकर एक आपराधिक सिंडिकेट हमारी थाली में धीमा ज़हर परोसने का धंधा शुरू कर देता है।
जिस मावे और पनीर की मिठाइयों को हम अपनों में प्रेम और शुभकामनाओं के रूप में बांटते हैं, उनमें यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, स्टार्च, सिंथेटिक पेंट और रिफाइंड तेल जैसे जानलेवा रसायनों की मिलावट होती है। यह केवल व्यापारिक धोखाधड़ी या उपभोक्ता के साथ छल नहीं है, बल्कि करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार पर किया जाने वाला सीधा और संगठित हमला है।
भारत में एफएसएसएआई तथा खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 जैसा कानूनी ढांचा मौजूद तो है, लेकिन इसका व्यवहार में इसका निष्प्रभावी होना चिंता का विषय है।
त्योहारों पर विभागीय छापों और सैंपलिंग के बाद प्रयोगशालाओं से महीनों तक रिपोर्ट न आना एक वार्षिक रस्म बन चुका है। जब तक लैब रिपोर्ट आती है, तब तक मिलावटी उत्पाद नागरिकों के पेट में जाकर उनके लीवर और गुर्दों को स्थायी क्षति पहुंचा चुके होते हैं। मुकदमों की धीमी गति का लाभ उठाकर दोषी आसानी से बच निकलते हैं, जिससे इस आपराधिक गिरोह का हौसला हर त्योहार पर दोगुना हो जाता है।
न्यायपालिका ने इस स्थिति पर बार-बार सख्त रुख अपनाया है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार को विस्तारित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इसमें ‘सुरक्षित और शुद्ध भोजन पाने के अधिकार’ को समाहित माना है। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ (2013) के मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि नागरिकों को शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना राज्य का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। इसी कड़ी में दूध में मिलावट से संबंधित स्वामी अच्युतानंद तीर्थ बनाम भारत संघ (2016) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़े निर्देश जारी किए। न्यायालय ने सुझाव दिया कि यदि दूध या खाद्य पदार्थों में डिटर्जेंट या घातक रसायनों की मिलावट पाई जाए, जिससे मानव जीवन को गंभीर खतरा हो, तो ऐसे दोषियों को आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए।
विकसित देशों में मिलावट के खिलाफ बेहद कठोर कानूनी व्यवस्था है। वैश्विक परिदृश्य के विपरीत भारत में सबसे बड़ी कानूनी चूक यह है कि जानबूझकर की गई जहरीली मिलावट को भी प्रायः सामान्य नियामकीय उल्लंघन माना जाता है। जब कोई व्यक्ति मावे या पनीर में कास्टिक सोडा, यूरिया या डिटर्जेंट मिलाता है, तो उसे भली-भांति पता होता है कि यह रसायन शरीर को धीरे-धीरे नष्ट कर देगा। यह केवल मिलावट या व्यापारिक छल नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ के लिए किया जाने वाला ‘धीमी हत्या का प्रयास’ यानी अटेंप्ट टू कल्पेबल होमीसाइड (भारतीय न्याय संहिता की धारा 110 के तहत) है। जिस प्रकार हथियार से हमला करना अपराध है, उसी प्रकार खाद्य पदार्थों के माध्यम से मानव शरीर में विष पहुंचाना एक प्रकार का ‘जैव-रासायनिक अपराध’ है। जब तक हमारी न्याय प्रणाली मिलावट को ‘स्लो पॉइज़निंग’ के समकक्ष रखकर आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं करेगी, तब तक इस सिंडिकेट पर नकेल कसना असंभव है।
इस विकट परिस्थिति से निपटने के लिए खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम में तत्काल संशोधन करके जहरीली मिलावट को गैर-जमानती और गैर-शमनीय अपराध घोषित किया जाना चाहिए। इसमें न्यूनतम 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और अपराधियों की अवैध संपत्ति की कुर्की का स्पष्ट प्रावधान हो। प्रत्येक जिले में विशेष ‘फास्ट-ट्रैक फूड कोर्ट्स’ स्थापित किए जाएं, जहां अधिकतम छह महीने के भीतर फैसला अनिवार्य हो। तकनीकी स्तर पर, केवल अंतिम उत्पाद की सैंपलिंग के बजाय सप्लाई चेन के शुरुआती बिंदु पर निगरानी रखी जाए। डेयरी उद्योग और मावा मंडियों में ‘ब्लॉकचेन तकनीक’ और ‘क्यूआर कोड’ प्रणाली लागू की जाए, जिससे उत्पाद की उत्पत्ति की पूरी जानकारी मिल सके। साथ ही, हर जिले में एनएबीएल मान्यता प्राप्त मोबाइल टेस्टिंग लैब की व्यवस्था हो और व्हिसलब्लोअर्स को प्रोत्साहन व सुरक्षा दी जाए।
त्योहार हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक हैं, उन्हें किसी के लालच की बलि नहीं चढ़ने दिया जा सकता। दीपावली का प्रकाश तब तक अधूरा रहेगा जब तक हमारी थाली में घुला मिलावट का अंधकार समाप्त नहीं होता। सरकारों, प्रशासन और एफएसएसएआई को अब अपनी शिथिलता त्याग कर संदेश देना होगा कि नागरिकों की सेहत से खिलवाड़ करने वालों के लिए कोई कानूनी रियायत नहीं होगी। जब कठोर कानून, त्वरित न्याय प्रणाली, आधुनिक तकनीक और नागरिक सतर्कता साथ मिलकर कार्य करेंगे, तभी हम अपने पर्वों की वास्तविक पवित्रता और मिठास को अक्षुण्ण रख पाएंगे।
लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

