आंख मूंदकर हर क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने और कुछ कंपनियों का दबदबा कायम होने के घातक परिणाम होते हैं। यदि निजीकरण जरूरी है तो निगरानी, नियमन व प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों ने सार्वजनिक क्षेत्र के एकाधिकार को तोड़ा और निजी कंपनियों को आमंत्रित किया। शुरू में रफ्तार धीमी रही, लेकिन 2000 के बाद इसमें तेजी आई। समस्या तब पैदा हुई जब सरकारों ने सभी समस्याओं का हल निजीकरण मान लिया। इससे दक्षता वृद्धि और राजस्व में बढ़ोतरी जैसे फायदे तो हुए, लेकिन नुकसान भी कम नहीं हुआ। एकाधिकार-मनमानी जैसी समस्याएं पैदा हुईं, जनता तो परेशान हो ही रही है, सरकार भी इन कंपनियों की ब्लैकमेलिंग का शिकार हो रही है। ताजा उदाहरण भारत के विमानन क्षेत्र का है।
पिछले दिनों विमानन क्षेत्र में इंडिगो एयरलाइन की मोनोपॉली के कारण देश के विभिन्न एयरपोर्ट्स पर बस और रेलवे स्टेशनों से भी बदतर हालात दिखे। इससे साफ है कि निजी कंपनियों पर आंख बंद करके भरोसा करने से देश कभी भी बड़ी मुश्किल में फंस सकता है। साल 2006 में दिल्ली-मुंबई के बीच उड़ान से शुरू हुई इंडिगो आज भारत के विमानन बाजार में सबसे बड़ी खिलाड़ी है और इसके पास करीब 64 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। उसकी विकास यात्रा जितनी हैरत में डालने वाली है, उतनी ही निराशाजनक और चिंता की बात यह है कि उसके कारण लाखों यात्रियों को भारी परेशानी हुई। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि भी प्रभावित हुई। जिससे इंडिगो के एकाधिकार पर सवाल उठे ।
साल 1991 से पहले आसमान पर सरकारी एयरलाइन का ही राज था। एयर इंडिया विदेशों के लिए उड़ती थी और इंडियन एयरलाइंस घरेलू बाजार पर काबिज थी। उदारीकरण का दौर आया तो निजी एयरलाइंस के लिए रास्ते खुले और नई एयरलाइंस की बाढ़—सी आ गई। सवाल यह है कि अब कुछ चुनिंदा एयरलाइंस ही क्यों रह गईं और इस क्षेत्र पर इंडिगो का ही एकाधिकार कैसे हो गया। भारत के घरेलू विमानन बाजार में इंडिगो का वर्चस्व वैश्विक स्तर पर असामान्य है। अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, ब्राजील, जापान, थाईलैंड या फ्रांस जैसे बाजारों में किसी कंपनी का ऐसा एकछत्र राज दिखाई नहीं देता। भारतीय बाजार दो प्रमुख कंपनियों—इंडिगो और एयर इंडिया के कब्जे में है, जिनके पास संयुक्त रूप से करीब 90 फीसदी हिस्सा है।
इंडिगो की नाकामी या यूं कहें मनमानी के कारण पूरे भारत के एयरपोर्ट्स पर अफरा-तफरी का माहौल बना। मामले की जांच भी शुरू हो गई, लेकिन एयरलाइन को वह राहत दे दी गई जो वह चाहती थी। भारत के एविएशन रेगुलेटर डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) ने इंडिगो को अपने पायलटों के लिए नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफडीटीएल) नियमों में अस्थायी छूट दे दी। विशेषज्ञों का कहना है कि जो कुछ हुआ है, उससे यह संदेश गया है कि कोई एक बड़ी कंपनी नियमों में बदलाव करा सकती है, जिससे पूरे भारत की साख प्रभावित हुई है।
किसी एक कंपनी के एकाधिकार की समस्या विमानन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह मोनोपॉली हर सेक्टर में खड़ी हो गई है। स्टील, माइनिंग, पावर, दूरसंचार, ट्रांसपोर्ट, पेट्रोलियम– हर जगह धीरे-धीरे कुछ कंपनियों का एकाधिकार कायम हो रहा है। दूसरी ओर निजीकरण के चलते सरकारी कंपनी बीएसएनएल और एमटीएनएल को हाशिए पर धकेल दिया गया। अब दूसरी छोटी कंपनियों को रौंदते हुए एक-दो कंपनियों का ही यहां राज चल रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि निजीकरण के चलते डेटा क्रांति हुई। वर्तमान में भारतीय दूरसंचार बाजार तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है, जिसमें 1.2 बिलियन से अधिक ग्राहक हैं। डिजिटल इंडिया के विस्तार, स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल और नई तकनीकों में निवेश के कारण यह बाजार फल-फूल रहा है। इस सुनहरी तस्वीर से इतर देखें तो यहां रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसे गिने-चुने ऑपरेटर ही रह गए हैं। रिलायंस जियो की दूरसंचार बाजार में 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है। जिससे एकाधिकार ने नई समस्या पैदा की।
बैंकिंग क्षेत्र भी इसी राह पर है। बड़े निजी बैंकों पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। सरकारी बैंकों का भी निजीकरण हो रहा है। निजी बैंक संपन्न वर्ग के लिए ही काम करने के इच्छुक होते हैं। इनके न्यूनतम बैलेंस भी बहुत ज्यादा रखे गए हैं, जिससे सामान्य व्यक्ति तो इनमें खाता ही नहीं खुलवा पाता। अच्छी सेवा का दावा करने वाले निजी बैंकों की शिकायतें भी खूब आ रही हैं। हालत यह है कि वित्त वर्ष 2024-25 में निजी क्षेत्र के बैंकों के खिलाफ शिकायतें सरकारी बैंकों से अधिक रहीं।
रेलवे के निजीकरण को लेकर भी अटकलें लगाई जाती हैं। यह अलग बात है कि सरकार ने साफ कर दिया है कि इसका निजीकरण नहीं होगा, लेकिन इसकी कई सेवाओं को निजी क्षेत्र में दे दिया गया है। विमानन क्षेत्र में निजी कंपनी के खेल के बाद रेलवे जैसे राष्ट्रीय महत्व और सुरक्षा से जुड़े उपक्रम को निजीकरण के किसी भी षड्यंत्र से दूर रखा जाना आवश्यक हो गया है। वहीं सड़क परिवहन के निजीकरण के प्रयोग भी घातक साबित हुए हैं। मध्यप्रदेश इसका उदाहरण है। वहां निजी बसों की मनमानी के बाद अब सरकारी रोडवेज बसें पुनः शुरू की जा रही हैं। जिन राज्यों में सरकारी रोडवेज बसें चल रही हैं, वहां निजी बसों की मनमानी पर अंकुश लगा हुआ है। साफ है कि आंख मूंदकर हर क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने और कुछ कंपनियों का दबदबा कायम होने के घातक परिणाम होते हैं। यदि निजीकरण जरूरी है तो निगरानी, नियमन व प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। बिना नियंत्रण के यह ‘मोनोपॉली मॉडल’ अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा, देश को नुकसान पहुंचाएगा और जनता की मुश्किल बढ़ाएगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

