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अपनी सीमा को ताकत बनाना सीखें गणेश जी से

अंतर्मन

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गणेश जी ने सिद्ध किया कि समस्याओं का समाधान चमत्कार से नहीं, बल्कि कर्म और बुद्धि से होता है। उनके व्यक्तित्व से सीख है कि अनुशासन, अनुकूलन और समय प्रबंधन ही सफलता निर्धारित करते हैं।

हमारी भारतीय संस्कृति में हर शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गणेश जी का सर्वप्रथम स्मरण करने और उन्हें आमंत्रित करने से कार्य में विघ्न नहीं आते तथा सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। गणेश जी आज की युवा पीढ़ी के लिए ऐसे प्रबंधन गुरु हैं, जो अपने व्यक्तित्व और गुणों से यह बताते हैं कि बुद्धि, विवेक और चातुर्य सब पर भारी पड़ता है। बेडौल व्यक्तित्व भी गुणों के आगे मिसाल बन जाता है।

आजकल अधिकतर युवा संसाधनों और व्यक्तित्व की छोटी-बड़ी कमियों के कारण तनावग्रस्त हो रहे हैं और कई बार घातक कदम तक उठा लेते हैं। उनके भीतर निराशा इस कदर छा जाती है कि वे उससे बाहर निकलने का प्रयास ही नहीं करते। यदि वे निराशा के भंवर से बाहर निकलकर देखें, तो समझ पाएंगे कि देवताओं ने भी अनेक बाधाओं को पार किया था। बाधाओं को सफलतापूर्वक पार करने के कारण ही वे देव कहलाए। जीवन में कुछ भी सहजता से नहीं मिलता। जो सरलता से मिल जाता है, उसमें वह आनंद नहीं आता, जो संघर्ष के बाद प्राप्त वस्तु में मिलता है। संघर्ष के साथ-साथ व्यक्ति के भीतर विवेक और बुद्धि का होना भी अनिवार्य है। कई बार जो कार्य बल से नहीं होते, वे बुद्धि से संपन्न हो जाते हैं।

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गणेश जी ने अनेक अवसरों पर अपने कार्यों से सिद्ध किया कि समस्याओं का समाधान चमत्कार से नहीं, बल्कि कर्म और बुद्धि से होता है। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि अनुशासन, अनुकूलन और समय प्रबंधन ही सफलता की नींव तैयार करते हैं।

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अक्सर युवा शिकायत करते हैं कि उनके पास सीमित संसाधन थे, इसलिए वे परीक्षा अथवा नौकरी में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। गणेश जी को जब प्रथम पूज्य बनने की चुनौती दी गई और कहा गया कि उन्हें पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करनी होगी, तब उन्होंने अपने धीमे वाहन मूषक को लेकर कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने तुरंत बुद्धि का प्रयोग किया और अपनी सीमा को ही ताकत बना लिया। गणेश जी ने मूषक के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की तीन बार परिक्रमा की और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही पूरे ब्रह्मांड से बढ़कर हैं। उनकी बुद्धिमत्ता देखकर सभी ने उन्हें प्रथम पूज्य स्वीकार कर लिया।

जब गणेश जी महाकाव्य लिख रहे थे, तब अचानक उनकी कलम टूट गई। उन्होंने न तो कलम टूटने का बहाना बनाया और न ही लेखन कार्य रोका। उन्होंने तत्काल निर्णय लेते हुए अपना एक दांत तोड़ लिया और उसे कलम की तरह प्रयोग करके महाकाव्य लिखना जारी रखा। इसी त्याग के कारण उनका नाम ‘एकदंत’ पड़ा। यदि ऐसी स्थिति हमारे सामने आ जाए, तो हममें से अनेक लोग समस्या का समाधान खोजने के बजाय समय बर्बाद करने लगेंगे।

आजकल कई युवा जीतने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं और कभी-कभी षड्यंत्र करने से भी नहीं चूकते। इसके विपरीत, गणेश जी ने एक बार अपने बड़े भाई कार्तिकेय के सम्मान और भाईचारे के लिए जान-बूझकर हार स्वीकार की। माता पार्वती ने जब इसका कारण पूछा, तो उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘जहां अपनों का सम्मान और भाईचारा दांव पर लगा हो, वहां जीतकर भी हार हो जाती है। संबंधों की मिठास हर जीत से बड़ी होती है।’ यह विचार आज के युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सीख है।

गणेश जी के आंतरिक गुणों के अतिरिक्त उनका बाहरी व्यक्तित्व भी प्रबंधन का अद्भुत पाठ पढ़ाता है। उनका मस्तक अत्यंत विशाल है, जो प्रत्येक विद्यार्थी और व्यक्ति को बड़ी सोच रखने की प्रेरणा देता है। बड़ी सोच दूरदर्शिता का परिचायक होती है और व्यक्ति को अनेक संकटों से बचाती है। उनके छोटे नेत्र जीवन में लक्ष्य के प्रति सूक्ष्म दृष्टि रखने की सीख देते हैं। सूक्ष्म दृष्टि से व्यक्ति अपने निर्णयों को अधिक सकारात्मक और प्रभावी बना सकता है।

गणेश जी के कान बहुत बड़े और मुख छोटा है। उनके ये दोनों अंग प्रत्येक व्यक्ति को कम बोलने और अधिक सुनने की प्रेरणा देते हैं। आज अधिकतर लोग दूसरों को सुनाने के लिए तो तैयार रहते हैं, लेकिन जब दूसरों की सुनने की बात आती है, तो पीछे हट जाते हैं। दूसरों की बातें सुनने से व्यक्ति का ज्ञान बढ़ता है, जबकि अपनी ही धुन में बोलते रहने से ज्ञान सीमित रह जाता है। सुनना किसी जादू से कम नहीं है। जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स के अनुसार, ‘दूसरों की बातें सुनना ही वह सबसे असरदार तरीका है, जिससे कोई व्यक्ति संसार में लोगों को साथ लेकर चल सकता है और उन्हें अपना मित्र बना सकता है।’

गणेश जी का संपूर्ण व्यक्तित्व जीवन प्रबंधन का ऐसा सूत्र है, जिसके माध्यम से हर व्यक्ति सुख, स्वास्थ्य, प्रसन्नता, समृद्धि और प्रेम को अपने जीवन का हिस्सा बना सकता है।

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