कोरोना से जंग के लिए लैब निर्मित वायरस

कोरोना से जंग के लिए लैब निर्मित वायरस

मुकुल व्यास

मुकुल व्यास

कोरोना वायरस पर रिसर्च करना भी वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस अत्यंत खतरनाक वायरस के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय जैविक सुरक्षा बेहद जरूरी है। रिसर्चरों को हरदम प्रोटेक्टिव सूट पहनने पड़ते हैं। प्रयोगशालाओं में काम करने वालों के लिए इस तरह के सुरक्षा उपाय आवश्यक होते हैं लेकिन इनसे कोविड-19 के लिए वैक्सीन और दवाओं पर रिसर्च का काम धीमा पड़ रहा है क्योंकि उच्च जैविक सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में बहुत से वैज्ञानिकों की पहुंच नहीं है।

इस समस्या को दूर करने के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन के रिसर्चरों ने एक संकर (हाइब्रिड) वायरस तैयार किया है जो ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिकों को वायरस के खिलाफ जंग में शामिल होने का मौका देगा। रिसर्चरों ने एक हल्के किस्म के वायरस को आनुवंशिक रूप से संशोधित करने के बाद यह वायरस तैयार किया है। इसके लिए उन्होंने इस वायरस के एक जीन को हटाकर उसकी जगह कोरोना वायरस के एक जीन को रख दिया। इस तरह तैयार हाइब्रिड वायरस सार्स कोव-2 की तरह कोशिकाओं को संक्रमित कर सकता है और शरीर की एंटीबॉडीज उसे आसानी से पहचान सकती हैं। सामान्य सुरक्षा वाली प्रयोगशलाओं में इस वायरस का अध्ययन किया जा सकता है। सार्स-कोव-2 का सुरक्षित मॉडल तैयार करने के लिए रिसर्चरों ने ‘वेसिकुलर स्टोमेटाइटिस वायरस’ (वीएसवी) को चुना। यह वायरस मवेशियों, घोड़ों और सूअरों को प्रभावित करता है। वायरस वैज्ञानिक इसे रिसर्च के लिए सुरक्षित मानते हैं। दूसरी बात यह है कि इसमें आसानी से आनुवंशिक फेरबदल किया जा सकता है। यह वायरस कभी-कभार मनुष्यों को संक्रमित करके साधारण फ्लू जैसी बीमारी उत्पन्न करता है जो तीन से पांच दिन तक रहती है।

वायरसों की सतह पर खास किस्म के प्रोटीन होते हैं, जिनकी मदद से वायरस कोशिकाओं को जकड़ कर उन्हें संक्रमित करता है। रिसर्चरों ने वीएसवी वायरस की सतह से प्रोटीन का जीन हटाकर उसकी जगह सार्स-कोव-2 की सतह के स्पाइक प्रोटीन का जीन लगा दिया। इस फेरबदल के बाद एक नया वायरस बना जो सार्स-कोव-2 की तरह कोशिकाओं को संक्रमित करता है। लेकिन उसके पास दूसरे जीन नहीं होते जो गंभीर बीमारी उत्पन्न करने के लिए जरूरी होते हैं। रिसर्चरों ने कोविड-19 से ठीक हो चुके मरीजों के सीरम और शुद्ध की गई एंटीबॉडीज के जरिए यह दर्शाया कि एंटीबॉडीज ने हाइब्रिड वायरस को ठीक उसी तरह पहचान लिया, जिस तरह वे कोविड-19 के मरीज के सार्स-कोव-2 वायरस को पहचान लेती हैं।

जिन एंटीबॉडीज ने हाइब्रिड वायरस को कोशिकाओं को संक्रमित करने से रोका, उन्होंने सार्स-कोव-2 वायरस को भी ऐसा करने से रोक दिया। जो एंटीबॉडीज हाइब्रिड वायरस को रोकने में नाकाम रहीं, वे असली वायरस को भी नहीं रोक सकीं। हाइब्रिड वायरस से वैज्ञानिकों को कोविड-19 के इलाज के लिए बन रही एंटीबॉडी आधारित दवाओं का आकलन करने में मदद मिल सकती है। हाइब्रिड वायरस के इस्तेमाल से यह पता लगाया जा सकता है कि प्रायोगिक वैक्सीन एंटीबॉडीज उत्पन्न करने में कितनी कारगर है। इससे यह भी पता लगाया जा सकता है कि कोविड से ठीक होने वाले मरीज द्वारा डोनेट किए गए प्लाज्मा में वायरस को निष्प्रभावी करने वाली एंटीबॉडीज समुचित मात्रा में है या नहीं। इस वायरस से उन एंटीबॉडीज की भी पहचान की जा सकती है, जिनका उपयोग एंटीवायरल दवाएं बनाने के लिए किया जा सके।

एक अन्य अध्ययन के जरिए वैज्ञानिकों ने बताया है कि कोरोना वायरस किस तरह हमारे शरीर में दाखिल होता है। जरा सोचिए कोई आपके घर में घुस आए और आपको पता भी न चले। कोरोना वायरस भी कुछ इसी अंदाज में हमारे शरीर में दाखिल होता है। वह कुछ ऐसी युक्ति लगाता है कि शरीर की कोशिकाएं उसे पहचान नहीं पातीं। अमेरिका में टेक्सास यूनिवर्सिटी के हैल्थ साइंस सेंटर के रिसर्चरों ने यह पता लगा लिया है कि वायरस किस तरह से शरीर की कोशिकाओं को चकमा देता है। इस अध्ययन के प्रमुख लेखक योगेश गुप्ता ने बताया कि वायरस एनएसपी-16 नामक एंजाइम उत्पन्न करता है। इस एंजाइम की मदद से वह अपने मैसेंजर आरएनए में परिवर्तन कर देता है। इस परिवर्तन के बाद कोशिकाएं मैसेंजर आरएनए को अपने ही आनुवंशिक कोड का हिस्सा समझती हैं। यह एक तरह से वायरस का छद्म आवरण है।

उल्लेखनीय है कि मैसेंजर आरएनए का काम शरीर में उन स्थलों पर आनुवंशिक कोड पहुंचाना है जहां प्रोटीनों का उत्पादन होता है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि एनएसपी 16 एंजाइम की त्रिआयामी संरचना के विश्लेषण से सफलता मिलने के बाद कोविड 19 और अन्य वायरसजनित बीमारियों से बचाव के लिए ज्यादा कारगर दवाएं विकसित करने में मदद मिलेगी। ये दवाएं एनएसपी 16 एंजाइम को परिवर्तन करने से रोकेंगी। इससे शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली के लिए आक्रामक वायरस को पहचानना आसान हो जाएगा।

इस बीच, वैज्ञानिकों की अंतर्राष्ट्रीय टीम ने पता लगाया है कि मनुष्य की प्रतिरोधी प्रणाली द्वारा उत्पन्न एक खास प्रोटीन कोरोना वायरस सहित विभिन्न रोगाणुओं को रोक सकता है। जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने बताया कि एलवाई 6ई प्रोटीन सभी प्रकार के कोरोना वायरसों को संक्रमण उत्पन्न करने से रोकता है। इस अध्ययन की प्रमुख लेखक, जर्मनी की स्टेफनी फांडर ने कहा कि इस खोज से कोरोना के खिलाफ नई थेरैपी विकसित करने में मदद मिलेगी। अमेरिकी रिसर्चरों, प्रो. जॉन शोगिंस और प्रो. चार्ल्स राइस ने बताया कि विभिन्न रोगों में एलवाई 6ई प्रोटीन की भूमिका होती है। हैरानी की बात यह है कि यह प्रोटीन इंफ्लुएंजा के वायरसों की संक्रामकता को बढ़ाता है जबकि कोरोना वायरसों को संक्रमण नहीं फैलाने देता। स्टेफनी फांडर पिछले कुछ समय से उन जीनो का पता लगाने की कोशिश कर रही थीं जो कोरोना वायरसों के संक्रमण को रोकते हैं।

रिसर्च के दौरान यह भी पता चला कि एलवाई 6ई प्रोटीन कोरोना वायरसों और इंफ्लुएंजा के वायरसों के प्रति अलग-अलग ढंग से व्यवहार करता है। परीक्षणों के दौरान पता चला कि यह प्रोटीन मेजबान कोशिकाओं के साथ जुड़ने की वायरस की क्षमता को प्रभावित करता है। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्न के प्रोफेसर फॉल्कर थिएल ने बताया कि यह वायरस यदि मेजबान कोशिकाओं के साथ जुड़ने में असमर्थ रहता है तो वह संक्रमण नहीं उत्पन्न कर सकता। इस अध्ययन से पता चलता है कि वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एंटीवायरल जीन कितने महत्वपूर्ण हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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